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400 साल पुराना गुरुद्वारा, जहां सबसे पहले स्थापित किया गया था गुरु ग्रंथ साहिब, नींव रखी मुस्लिम ने

Mon, 27 Aug 2018 03:42 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अमृतसर(पंजाब)
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गोल्टन टेंपल में गुरु ग्रंथ साहिब
हम आपको बता रहे हैं 400 साल पुराने उस ऐतिहासिक गुरुद्वारे के बारे में, जिसमें सबसे पहले गुरु ग्रंथ साहिब स्थापित किया गया था। इस धार्मिक स्थल के अंदर खून खराबा हो चुका है, जिसमें 493 लोग मारे गए थे।
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गोल्डन टेंपल - फोटो : PTI
यह पंजाब के अमृतसर में स्थित है। इसका नाम है- गोल्डन टेंपल, स्वर्ण मंदिर, श्री हरिमंदिर साहिब। इसके नाम में मंदिर आता है और इसकी नींव एक मुसलमान ने रखी थी। इस गुरुद्वारे में आज 27 अगस्त के ही दिन सन् 1604 में गुरू ग्रंथ साहिब की स्थापना की गई थी। गुरु ग्रंथ साहिब सिख धर्म को मानने वालों का पूजनीय पवित्र ग्रंथ है। इस ग्रंथ को 'आदिग्रंथ' के नाम से भी जाना जाता है। 6 जून 1984 को हुआ ऑपरेशन ब्लू स्टार याद है, वो इसी गुरुद्वारे में अंजाम दिया गया था, जिससे सिखों की आस्था को गहरी ठेस पहुंची थी।
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गोल्डन टेंपल - फोटो : PTI
क्या है गुरु ग्रंथ साहिब
सिख संप्रदाय का प्रमुख धर्मग्रन्थ है। इसे 'गुरु ग्रंथ साहिब' भी कहते हैं। इसका संपादन सिख धर्म के पांचवें गुरु श्री गुरु अर्जुन देव जी ने किया। गुरु ग्रन्थ साहिब जी का पहला प्रकाश 16 अगस्त 1604 को हरिमंदिर साहिब अमृतसर में हुआ। 1705 में दमदमा साहिब में दशमेश पिता गुरु गोविंद सिंह जी ने गुरु तेगबहादुर जी के 116 शब्द जोड़कर इसको पूर्ण किया, इसमे कुल 1430 पृष्ठ है। इसमें सिख गुरुओं के उपदेश ही नहीं, हिन्दू संतों और मुस्लिम भक्तों की वाणी भी शामिल की गई है। 'आदिग्रंथ' के अंतर्गत सिखों के प्रथम पांच गुरुओं के अतिरिक्त उनके नौंवे गुरु और 14 भगतों की बानियां लिखी हुई हैं।

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स्वर्ण मंदिर
स्वर्ण मंदिर की नींव मुसलमान पीर सूफी संत साईं मिया मीर ने रखी थी। इसका पूरा उल्लेख स्वर्ण मंदिर में लगे शिलालेखों से पता चलता है। सूफी संत साईं मिया मीर का सिख धर्म के प्रति शुरू से ही झुकाव था। वे लाहौर के रहने वाले थे और सिक्खों के पांचवें सिख गुरु अर्जन देव जी के दोस्त थे। जब हरिमंदिर साहिब के निर्माण पर विचार किया गया, तो फैसला हुआ था कि इस मंदिर में सभी धर्मों के लोग आ सकेंगे। इसके बाद सिखों के पांचवें गुरु अर्जन देव जी ने लाहौर के सूफी संत साईं मियां मीर से दिसंबर 1588 में गुरुद्वारे की नींव रखवाई थी। पूरा अमृतसर शहर स्वर्ण मंदिर के चारों तरफ बसा हुआ है।
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Golden Temple, Amritsar
अमृतसर का नाम वास्तव में उस सरोवर के नाम पर रखा गया है जिसका निर्माण गुरु राम दास ने स्वयं अपने हाथों से किया था। लगभग 400 साल पुराने इस गुरुद्वारे का नक्शा खुद गुरु अर्जुन देव जी ने तैयार किया था। यह गुरुद्वारा शिल्प सौंदर्य की अनूठी मिसाल है। इसकी नक्काशी और बाहरी सुंदरता देखते ही बनती है। गुरुद्वारे के चारों ओर दरवाजे हैं, जो चारों दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण) में खुलते हैं। यहां हर धर्म के अनुयायी का स्वागत किया जाता है। श्री हरिमन्दिर साहिब परिसर में दो बड़े और कई छोटे-छोटे तीर्थस्थल हैं। ये सारे तीर्थस्थल जलाशय के चारों तरफ फैले हुए हैं।
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Golden Temple, Amritsar
जलाशय को अमृतसर, अमृत सरोवर और अमृत झील के नाम से जाना जाता है। पूरा स्वर्ण मंदिर सफेद संगमरमर से बना हुआ है और इसकी दीवारों पर सोने की पत्तियों से नक्काशी की गई है। हरिमन्दिर साहिब में पूरे दिन गुरबाणी (गुरुवाणी) की स्वर लहरियां गूंजती रहती हैं। सिक्ख गुरु को ईश्वर तुल्य मानते हैं।  स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करने से पहले वह मंदिर के सामने सर झुकाते हैं, फिर सीढ़ियों से मुख्य मंदिर तक जाते हैं। सीढ़ियों के साथ-साथ स्वर्ण मंदिर से जुड़ी हुई सारी घटनाएं और इसका पूरा इतिहास लिखा हुआ है। श्री हरिमन्दिर साहिब में अनेक तीर्थस्थान हैं। इनमें से बेरी वृक्ष को भी एक तीर्थस्थल माना जाता है। इसे बेर बाबा बुड्ढा के नाम से जाना जाता है।
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स्वर्ण मंदिर अमृतसर
कहा जाता है कि जब स्वर्ण मंदिर बनाया जा रहा था तब बाबा बुड्ढा जी इसी वृक्ष के नीचे बैठे थे और मंदिर के निर्माण कार्य पर नजर रखे हुए थे। यहां चौबीस घंटे लंगर चलता है। स्वर्ण मंदिर सरोवर के बीच में मानव निर्मित झील है, जहां श्रद्धालु स्नान करते हैं। यह झील मछलियों से भरी हुई है। मंदिर से 100 मी. की दूरी पर स्वर्ण जड़ित, अकाल तख्त है। इसमें एक भूमिगत तल है और पांच अन्य तल हैं। इसमें एक संग्रहालय और सभागार है। यहां पर सिख पंथ से जुड़ी हर समस्या का समाधान किया जाता है।
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स्वर्ण मंदिर अमृतसर
गुरुद्वारे के बाहर दाईं ओर अकाल तख्त है। अकाल तख्त का निर्माण सन 1606 में किया गया था। यहां दरबार साहिब स्थित है, जिसमें गुरु ग्रंथ साहिब की स्थापना की गई थी। उस समय यहाँ कई अहम फैसले लिए जाते थे। संगमरमर से बनी यह इमारत देखने योग्य है। इसके पास शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति का कार्यालय है, जहां सिखों से जुड़े कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि 19 वीं शताब्दी में अफगान हमलावरों ने इस मंदिर को पूरी तरह नष्ट कर दिया था। तब महाराजा रणजीत सिंह ने इसकी मुरम्मत कराई। साथ ही इसकी गुंबद को सोने की परत से सजवाया।
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