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जानिए उस शख्स के बारे में, कहा जाता है इनकी वजह से हुआ था ऑपरेशन ब्लू स्टार

Thu, 06 Jun 2019 05:24 PM IST
खुशबू गोयल न्यूज डेस्क/अमर उजाला, चंडीगढ़
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ऑपरेशन ब्लू स्टार - फोटो : फाइल फोटो
जानिए उस शख्स के बारे में, कहा जाता है कि अगर वो जरनैल सिंह भिंडरावाले के साथ न होता तो स्वर्ण मंदिर में ऑपरेशन ब्लू स्टार न होता।
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ऑपरेशन ब्लू स्टार - फोटो : फाइल फोटो
कहा जाता है कि जरनैल सिंह भिंडरावाले की असली ताकत भारतीय सेना से बर्खास्त किए गए मेजर जनरल सुबेग सिंह थे। अगर सुबेग सिंह का साथ भिंडरावाले को नहीं मिलता तो पंजाब के हालात ऐसे नहीं होते और 1984 में 3 से 6 जून तक तक वो ऑपरेशन न चलता। कहा जाता है कि सुबेग सिंह को रिटायरमेंट से एक दिन पहले बर्खास्त कर दिया गया था।
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ऑपरेशन ब्लू स्टार - फोटो : बीबीसी
बर्खास्तगी को उसने अपना अपमान समझा और इसी का बदला लेने के लिए वह भिंडरावाले के साथ मिल गया। सुबेग सिंह ने भिंडरावाले से जुड़े लोगों को सैन्य प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। हथियार जुटाने में सुबेग ने बड़ी भूमिका निभाई। भारतीय सेना के इस अभियान की भनक भी उन्हें पहले से ही थी, इसलिए वे सब कई महीनों से तैयारी कर रहे थे, लेकिन सेना ने उन्हें मार गिराया।

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ऑपरेशन ब्लू स्टार
6 जून 1984 को जरनैल सिंह भिंडरावाले की मौत के साथ ऑपरेशन ब्लूस्टार खत्म हुआ था। इस ऑपरेशन में 83 सैनिक मारे गए थे जिसमें 3 सेना के अफसर थे। इसके साथ ही कुल 248 लोग घायल हुए और 492 लोग मारे गए थे। दरअसल उस समय पंजाब को भारत से अलग करके अलग से खालिस्तान राष्ट्र बनाने की मांग जोर पकड़ने लगी थी इसलिए इस ऑपरेशन को अंजाम दिया गया था।
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operation blue star
जरनैल सिंह भिंडरावाले सिखों की धार्मिक संस्था दमदमी टकसाल का लीडर था। उसकी कट्टर विचारधारा ने लोगों पर गहरा असर डालना शुरू कर दिया था इसलिए उसे संस्था की कमान सौंपी गई थी। भिंडरावाले ने गोल्डन टैम्पल परिसर में बने अकाल तख्त में अपना मुख्यालय बना लिया और अकाल तख्त पर कब्जा कर लिया था। अकाल तख्त पर कब्जे करने का विरोध भी हुआ, लेकिन भिंडरावाले ने इसकी चिंता नहीं की और हिंसा का दौर जारी रहा।
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भिंडरावाले की इच्छा थी कि हिन्दू पंजाब छोड़ कर चले जाएं जो कि दिल्ली सरकार को चुनौती थी। इंदिरा गांधी को भी जल्द से जल्द किसी फैसले पर पहुंचना था, क्योंकि उनकी मुश्किलें बढ़ती जा रही थीं। आखिरकार इंदिरा गांधी ने 1 जून 1984 के दिन अमृतसर को सेना के हवाले कर दिया और ऑपरेशन ब्लू स्टार शुरू किया। इस ऑपरेशन को मेजर जनरल कुलदीप सिंह बरार को सौंपी गई थी। ऑपरेशन के दौरान मंदिर परिसर में रह रहे लोगों को बाहर आने के लिए कहा गया, लेकिन 5 जून तक तक सिर्फ 129 लोग ही बाहर आए।
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5 जून, 1984 को शाम 7 बजे सेना की कार्यवाई शुरू हुई और रात भर दोनों तरफ से गोलीबारी हुई। 6 जून की सुबह अकालतख्त में छिपे आतंकियों को बाहर निकालने के लिए टैंकों को गोल्डन टेंपल में ले जाया गया। शाम तक गोलीबारी होती रही। अकालतख्त को काफी नुकसान हुआ और फिर देर रात मिली जरनैल सिंह भिंडरावाले की लाश। इस कार्रवाई से सिख समुदाय की भावनाओं को बहुत ठेस पहुंची। कई प्रमुख सिख बुद्धिजीवियों ने सवाल उठाए कि स्थिति को इतना ख़राब क्यों होने दिया गया कि ऐसी कार्रवाई करने की ज़रूरत पड़ी?
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सरकार की इस बर्बर कार्रवाई से खफा कई प्रमुख सिखों ने या तो अपने पदों से इस्तीफ़ा दे दिया या फिर सरकार द्वारा दिए गए सम्मान लौटा दिए। सिखों और कांग्रेस पार्टी के बीच दरार उस समय और गहरा गई जब दो सिख सुरक्षाकर्मियों ने कुछ ही महीने बाद 31 अक्तूबर को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी। इसके बाद भड़के सिख विरोधी दंगों से कांग्रेस और सिखों की बीच की खाई और गहरा गई।
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