गर्भवती महिलाओं के लिए बड़े काम की खबर है। अगर वे ये एक काम कर लेंगी तो खुद के साथ साथ बच्चे की जान भी बचा सकेंगी।
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गर्भवती महिला
- फोटो : demo pics
पीजीआई के हीम्टोलाजी डिपार्टमेंट के प्रोफेसर दीपक बंसल कहते हैं कि थैलीसीमिया एक गंभीर बीमारी है। इसकी चपेट में आने से पीड़ित का हर माह 4-5 हजार रुपये खर्च बढ़ जाता है। हर तीसरे हफ्ते खून बदलना पड़ता है। बार-बार खून चढ़ने से पीड़ितों के शरीर में आयरन जमा हो जाता है। इसे भी निकलना जरूरी है। आयरन निकालने के लिए दवाई आती है, जो काफी महंगी होती है।
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बीएमओ का कहना है कि महिला का पल्स रेट काफी लो था। इसलिए रिस्क नहीं लिया।
- फोटो : डेमो पिक
दीपक बंसल कहते हैं कि इस बीमार का इलाज बोनमेरो ट्रांसप्लांट है। इसका खर्च काफी ज्यादा है। प्राइवेट में 15 लाख से ज्यादा खरचा आता है, जबकि पीजीआई में आधा खर्च आता है। इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बीमारी को रोका जा सकता है। इसलिए लोगों को जागरूक रहने की जरूरत है। शादी से पहले युवक-युवती को थैलीसीमिया का टेस्ट करवाना चाहिए।
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इस इंजेक्शन से तीन माह तक प्रेगनेंसी रोकने का दावा किया गया है।
दीपक बंसल कहते हैं कि हालांकि भारत में अभी ऐसा संभव नहीं है। लेकिन प्रेग्नेंसी के 10-12 हफ्ते के दौरान एचपीएलसी टेस्ट करवा सकते हैं। यदि पत्नी में माइनर थैलीसीमिया मिलता है तो पति को भी इसका टेस्ट करवाना होगा। यदि दोनों माइनर निकलते हैं तो नवजात का एंटीनेटल टेस्ट कराया जाता है। यदि बच्चे का पॉजिटिव रिजल्ट आता है तो माता-पिता के सामने गर्भपात कराने का विकल्प होता है।
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गर्भवती महिला
दीपक बंसल कहते हैं कि पति-पत्नी के माइनर के होने पर बच्चे में थैलीसीमिया होने के 25 प्रतिशत चांस होते हैं। यदि पत्नी में माइनर नहीं मिला तो आगे टेस्ट करवाने की जरूरत नहीं पड़ती। पीजीआई ने अपनी एक स्टडी में पाया है कि कुछ जातियों में थैलीसीमिया कॉमन है। इसमें मुख्य रूप से खत्री और अरोड़ा जातियां शामिल हैं। इसके पीछे जेनेटिक वजह हैं। पंजाब में हर 100 लोगों में चार लोग इससे पीड़ित है।
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पीजीआई में सुविधा
पीजीआई में हर साल 70 से ज्यादा नए केस सामने आते हैं। ये केस हरियाणा व पंजाब से आते हैं। प्रोफेसर दीपक बंसल ने बताया कि थैलीसीमिया पीड़ितों का इलाज सिर्फ बोनमेरो ट्रांसप्लांट है। इसके बजाए कोई दूसरा इलाज नहीं है। यदि टाइम पर ब्लड बदलवाते हैं और आयरन की दवा खाते हैं तो पीड़ित नार्मल लाइफ जी सकता है। यदि ऐसा नहीं करते हैं तो ज्यादा समय तक बच्चे नहीं जी पाते।
थैलेसीमिक बच्चों को जीने के लिए एक मात्र सहारा ब्लड है। पीड़ितों को हर तीसरे हफ्ते ब्लड की जरूरत पड़ती है। रक्तदान में इकट्ठा किया गया ब्लड का काफी हिस्सा थैलेसीमिक बच्चों को जाता है। इसलिए ब्लड कैंप लगाने वाली एनजीओ लोगों से अपील करती हैं कि ज्यादा से ज्यादा ब्लड डोनेट करें, ताकि इन बच्चों का जीवन चल सके।