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ई-उपकरण और गैजेट दे सकते हैं बीमारी, जलाना और मिट्टी में दबाना घातक...12 क्लिक में पढ़ें डिटेल

Mon, 04 Feb 2019 12:47 PM IST
Priyesh Mishra नवनीत छिब्बर, अमर उजाला, मोहाली
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ई-उपकरण यूजर्स
ई-उपकरण जैसे स्मार्टफोन, गैजेट, लैपटॉप, डेस्कटॉप आदि खतरनाक और जानलेवा हैं। इन्हें जलाना घातक और मिट्टी में दबाना भी, बीमारियां हो सकती हैं। 12 क्लिक में पढ़ें पूरी डिटेल, सोच में पड़ जाएंगे।
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ई-उपकरण यूजर्स
डिजिटल होते इंडिया में एक दानव दबे पांव पैर पसार रहा है। जो हमारे पानी, मिट्टी और हवा तीनों में जहर घोल रहा है। इस दानव का नाम है ई-वेस्ट यानि इलेक्ट्रानिक कचरा। ई-वेस्ट के साथ खास बात यह है कि इसे जलाकर नष्ट करना या मिट्टी के नीचे दबा देना दोनों खतरनाक हैं। खुले में कचरे को जलाया जाए तो इससे निकलने वाली विषैली गैसें वायुमंडलीय तापक्रम को असंतुलित करती है और जमींदोज किया जाए तो भूमिगत जल में जहर फैलता है। इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी घटती है। जहां ई-कचरे को जलाकर नष्ट किया जाता है, वहां इस कार्य में लगे मजदूरों को कैंसर, फेफड़े व त्वचा रोग तथा न्यूरोलॉजिकल डिसआर्डर होने का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में काफी ज्यादा होता है।
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ई-उपकरण यूजर्स
तेजी से पैर पसारते इलेक्ट्रॉनिक कचरे के तहत वे तमाम इलेक्ट्रॉनिक उपकरण आते हैं जो हम खराब होने पर फेंक देते हैं। मसलन कंप्यूटर, मदरबोर्ड, रेडियो, टीवी, बल्ब, मोबाइल फोन, चार्जर, बैटरी वगैरह। ये उपकरण खराब होने के साथ ही ई-कचरे में तब्दील हो जाते हैं। यही कचरा अब हमारे समाज और पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बन गया है। ई-वेस्ट को निपटाना पूरी दुनिया के लिए बड़ा सिरदर्द बन चुका है। भारत के अलावा चीन, अमेरिका, जापान और जर्मनी ऐसे देश हैं जहां ई-वेस्ट का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ गया है। भारत में 2018 के अंत तक ई-वेस्ट का आंकड़ा 33 लाख टन तक पहुंचने का अनुमान है।

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ई-उपकरण यूजर्स
ई-वेस्ट में सीसा, पारा, क्त्रसेमियम, ऑर्सेनिक, लेड, मरकरी, कैडमियम और कोबाल्ट जैसे खतरनाक तत्व होते हैं। ई-वेस्टे की रिसाइकलिंग के दौरान निकलने रसायनों और विकिरण से न सिर्फ पर्यावरण बल्कि इंसानों के लिए भी खतरा पैदा होता है। इसके संपर्क में आने से तंत्रिका तंत्र (न्यूरो), सांस, त्वचा, कैंसर, दिल संबंधी बीमारियों का खतरा आम प्रदूषण की अपेक्षा कई गुना बढ़ जाता है। जाहिर है कि भारत के सामने ई-वेस्ट को रिसाइकल करने की बड़ी चुनौती है। देश में अभी मात्र पांच प्रतिशत ई-वेस्ट संगठित क्षेत्र द्वारा रिसाइकल किया जाता है। बचा हुआ 95 प्रतिशत ई-वेस्ट असंगठित क्षेत्र के हवाले है, यानी इसे मजदूर असुरक्षित तरीके से हाथ से ही बटोरते, छांटते और फिर गलाते हैं। इससे उन्हें स्वास्थ्य संबंधी कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
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ई-उपकरण यूजर्स - फोटो : डेमो
भारत में यह समस्या इसलिए भी बड़ी है कि यहां अधिकतर ई-वेस्ट को कबाड़ के साथ ही निपटाया जाता है। ई-वेस्ट से धातुएं निकालने के बाद बचे हुए कचरे को ऐसे ही खुले में फेंक दिया जाता है, जिससे यह हवा, पानी और मिट्टी के लिए गंभीर प्रदूषण का कारण बनता जा रहा है। खुले में फेंके जाने के कारण इस कचरे में मौजूद लेड और मरकरी जैसे जहरीले तत्व हवा और पानी में घुलकर न सिर्फ पर्यावरण बल्कि लोगों के स्वास्थ्य पर भी असर डालते हैं।

सबसे ज्यादा ई-वेस्ट पैदा करता है जालंधर
एसोचैम की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पैदा होने वाले ई-कचरे का 20 प्रतिशत हिस्सा महाराष्ट्र से आता है. दूसरे नंबर पर तमिलनाडु है जो कुल 13 प्रतिशत ई-कचरा पैदा करता है. इसके बाद इस सूची में उत्तर प्रदेश (10 प्रतिशत), पश्चिम बंगाल (9.8 प्रतिशत) और दिल्ली (9.5 प्रतिशत) हैं। पंजाब पहले दस राज्यों में एक है। पंजाब का जालंधर शहर सबसे ज्यादा ई-वेस्ट पैदा करने वाला शहर है।
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ई-उपकरण यूजर्स
इलेक्ट्रॉनिक उपकरण में डिस्कार्ड की औसत अवधित
मोबाइल टेलीफोन्स       1 से 3 साल
पर्सनल कंप्यूटर्स        2 से 3 साल
कैमरा                3 से 5 साल
टेलीविजन, एलसीडी     5 से 8 साल
रेफ्रीजरेटर            5 से 10 साल
वाशिंग मशीन         5 से 10 साल
आईटी एसेसिरीज        बहुत जल्द
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ई-उपकरण यूजर्स
किस ई वेस्ट में कौन सा जहरीला पदार्थ और उसका प्रभाव
ई-वेस्ट का प्रकार    विषक्त पदार्थ            इंसानों पर प्रभाव
प्रिंटेड सर्किट बोर्ड    लेड, कैडमियम            कोशिकाएं, लीवर, तंत्रिकातंत्र, सिरदर्द
मदर बोर्ड        बेरिलियम            लंग्स, त्वचा रोग व लांग टर्म डिजिज
कैथोड ट्यूब        लेड, ऑक्साइड, बैरियम, कैडमियम    हार्ट, लीवर, मांसपेशियां, उदरशोथ
स्विच, फ्लैट स्क्रीन, मॉनिटर    मरकरी            दिमाग, कोशिकाएं, भ्रुण का अविकसित होना
कंप्यूटर बैटरी        कैडमियम            कोशिकाएं, लीवर
केबल इंसुलेशन कोटिंग    पॉली विनायल, क्लोराइड        प्रतिरोधक क्षमता की कमी
प्लास्टिक हाउसिंग    ब्रोमीन            हार्मोनल तंत्र पर प्रभाव

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ई-उपकरण यूजर्स - फोटो : अमर उजाला
ई-वेस्ट के लिए सरकार के नए नियम
केंद्र सरकार ने देश में ई-वेस्ट मैनेजमेंट नियमों में संशोधन किया है। यह बदलाव ई-वेस्ट निस्तारण में लगीं इकाइंयों को सुव्यवस्थित कर वैधता प्रदान करने के लिए किया गया है।
- ई-वेस्ट संग्रहण के नए निधार्रित लक्ष्य एक अक्तूबर 2017 से प्रभावी माने जाएंगे। विभिन्न चरणों में ई-वेस्ट का संग्रहण लक्ष्य 2017 18 के दौरान उत्पन्न किए गए कचरे के वजन का 10 फीसदी होगा जो 2023 तक प्रतिवर्ष 10 फीसदी के हिसाब से बढ़ता जाएगा। वर्ष 2023 के बाद यह लक्ष्य कुल उत्पन्न कचरे का 70 फीसदी हो जाएगा।
- यदि किसी उत्पादक के बिकगी वर्ष उसके उत्पादों के औसत आयु से कम होंगे तो ऐसे नए ई उत्पादकों के लिए ई-वेस्ट संग्रहण के लिए अलग लक्ष्य निर्धारित किए जाएंगे। उत्पादों की औसत आयु समय समय पर केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा निर्धारित की जाएगी।
- हानिकारक पदार्थों के जांच का खर्च सरकार वहन करेगी यदि उत्पाद आरओएच की व्यवस्थओं के अनुरूप नहीं हुए तो उस हालत में जांच का खर्च उत्पादक को वहन करना होगा।
- उत्पादक जवाबदेही संगठनों को नए नियमों के तहत कामकाज करने के लिए खुद को पंजीकृत कराने के लिए केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के समक्ष आवेदन करना होगा।

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ई-उपकरण यूजर्स
नियम और लापरवाही
अक्टूबर 2016 में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने ई-कचरा प्रबंधन नियम के तहत इस कचरे के निपटान की जिम्मेदारी का एक बड़ा हिस्सा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने वाली कंपनियों पर डाला था। इसके तहत कंपनियों को कहा गया था कि कि वे एक साल में बेचे गए इलेक्ट्रॉनिक सामान के 20 प्रतिशत तक ई-कचरे का खुद निपटारा करें। इस आंकड़े को हर पांच साल बाद हर साल दस प्रतिशत बढ़ाया जाना है। नियमों के मुताबिक कंपनियों को न सिर्फ ई-वेस्ट को इकट्ठा करना था, बल्कि इसको वैज्ञानिक तरीके से उपचारित करने वाली इकाइयों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी उन्हीं के कंधों पर डाली गई थी। ई-वेस्ट का निस्तारण करने वाली ये इकाइयां केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) से मान्यता प्राप्त होनी चाहिए. नियमों के मुताबिक कंपनियों को हर साल अपने उत्पादन और संग्रहण की रिपोर्ट सीपीसीबी को जमा करनी होगी।

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ई-उपकरण यूजर्स - फोटो : demo pic
कंपनियों के दावों को जांचने के लिए नहीं है कोई तंत्र
इन कंपनियों की मानें तो वे ई-वेस्ट को उपचारित करने के अपने लक्ष्य को पूरा करने का दावा करती हैं, लेकिन यहां झोल यह है कि उनके दावों की जांच करने वाला कोई तंत्र अभी तक मौजूद नहीं है। डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस बारे में सीपीसीबी के पास कोई आंकड़े ही मौजूद नहीं हैं। सीपीसीबी के अनुसार भारत में 214 अधिकृत रीसाइकलर और डिस्मेंटलर्स हैं जिन्होंने 2016-17 में भारत के 20 लाख टन ई-वेस्ट में से केवल 36 हजार टन कचरे को ही रीसाइकल किया है। इसे देखते हुए जाहिर है कि भारत के सामने ई-कचरे को रिसाइकल करने की बड़ी चुनौती है. देश में अभी मात्र पांच प्रतिशत ई-कचरा संगठित क्षेत्र द्वारा रिसाइकल किया जाता है. बचा हुआ 95 प्रतिशत ई-कचरा असंगठित क्षेत्र के हवाले है. यानी इसे मजदूर असुरक्षित तरीके से हाथ से ही बटोरते, छांटते और फिर गलाते हैं. इससे उन्हें स्वास्थ्य संबंधी कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

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ई-उपकरण यूजर्स
सरकारी नियम ही बन रहे हैं रोड़ा
भारत के सामने यह समस्या ई-वेस्ट के आयात से और अधिक बढ़ जाती है। हालांकि, नए कानून के मुताबिक रीसाइक्लिंग ई-वेस्ट के आयात पर सरकार ने भले ही पूरी तरह से रोक लगा दी है, लेकिन यह अब भी बदस्तूर जारी है। इसकी वजह भी है कि भारत ई-वेस्ट को रीसाइकल करने के लिए भले ही इसके आयात की मंजूरी न देता हो, लेकिन वह ई-वेस्ट से नए उत्पाद बनाने यानी नवीनीकरण की मंजूरी जरूर देता है। इसके चलते रोक के बावजूद इसका आयात जारी है। वहीं, ई-वेस्ट को आयात कर नए उत्पाद बनाने वाली कंपनियों पर भी कोई निगरानी तंत्र नहीं है जो यह पता लगाए कि वे सच में नए उत्पाद बना रही हैं या कचरा पहले की तरह ही निपटा रही हैं। विदेशों से कितना ई-वेस्ट आयात हो रहा है, इसके आंकड़े भी सरकार के पास नहीं हैं। कचरा प्रबंधन भारत की प्रमुख समस्याओं में से एक है। ई-वेस्ट ने भारत की इस समस्या को और बढ़ा दिया है। भारत अपने 100 शहरों को स्मार्ट शहरों के रूप विकसित कर रहा है। ऐसे में उसे कचरा प्रबंधन के लिए एक ठोस रणनीति बनाने की जरूरत है। भारत में 80 प्रतिशत कचरे का निपटारा उसे बीनकर किया जाता है। भारत में लोगों को कचरों के प्रकार को लेकर जागरूकता फैलाने की भी आवश्यकता है। इसके साथ ही लोगों को ई-वेस्ट के सही प्रबंधन के बारे में भी बताना होगा।

 
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ई-उपकरण यूजर्स
नए नियमों के बाद ई-वेस्ट एकत्र कर रही पुरानी कंपनियों को आगे मंजूरी नहीं दी गई। नए नियमों के तहत ई-वेस्ट मैनेजमेंट की रूपरेखा तैयार की जा रही है। अभी डेराबस्सी के निंबुआ में एक ई-वेस्ट कलेक्शन सेंटर चल रहा है। सरकार ई-वेस्ट के खतरों से निपटने को जल्द ही ठोस उपाय किए जाएंगे।
- सतविंदर सिंह, चेयरमैन पीपीसीबी
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