सेलिब्रिटी या किसी नामचीन हस्ती की जिंदगी पर बनी डॉक्यूमेंट्री देखी होंगी। लेकिन एक ऐसे शख्स के जीवन और संघर्ष की कहानी पर डॉक्यूमेंट्री बनने जा रही है, जो न तो पुरुष है और न ही महिला।
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धनंजय सिंह चौहान
संघर्ष जिंदगी का हिस्सा होते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि हमारी जिंदगी में कुछ ज्यादा हैं। किन्नरों की हालत सुधारने की जो लड़ाई लड़ने की मैंने ठानी है, वह लंबी चलेगी। अभी तो कहानी शुरू हुई है। पंजाब यूनिवर्सिटी की पहली ट्रांसजेंडर छात्र धनंजय चौहान ने यह बातें कहीं। धनंजय अपने जीवन पर बनने वाली डॉक्यूमेंट्री की लांचिंग के सिलसिले में प्रेस क्लब में पत्रकारों से रूबरू थीं।
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धनंजय सिंह चौहान
धनंजय ने बताया कि बचपन में बधाई से मिलने वाले पैसे से उनकी गुरु काजल मंगलमुखी ने उन्हें पढ़ाया। आज वे उसी की बदौलत किन्नरों के हक की लड़ाई लड़ेंगी। किन्नरों के इसी संघर्ष को बायोग्राफिकल फीचर डॉक्यूमेंट्री (एडमिटेड) बयां करेगी। ओजस्वी शर्मा इसके डायरेक्टर हैं। बहुत जल्दी यह डोक्यूमेंट्री लोगों के सामने होगी, तब उन्हें पता चलेगा कि एक किन्नर का जीवन क्या होता है।
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किन्नर स्टूडेंट धनंजय
दो घंटे 40 मिनट की होगी यह फिल्म
धनंजय ने बताया कि फिल्म कई ऐसे सवाल छोड़ती है, जो लोगों को सोचने पर मजबूर कर देंगे। ट्रांसजेंडर्स ने ऐसा क्या गुनाह किया है, जो उन्हें अलग जीवन जीने को मजबूर कर रहे हैं। किस समाज ने किन्नरों को ये जगह दी है। फिल्म में ऐसे ही सवालों का जवाब तलाशा गया है। उन्होंने कहा कि शिक्षा ही एक ऐसा माध्यम है, जो ट्रांसजेंडर्स को मुख्य धारा से जोड़ने का काम कर सकता है। यही वजह है कि उन्होंने अपने हाथों में विद्या का दंड थाम लिया है और वे अपने ही समान दूसरे लोगों को शिक्षा दिलवाने के लिए निकल पड़े हैं। वे जानते हैं कि रास्ता कठिन है, लेकिन वे इस लड़ाई को जीत कर ही समाप्त करेंगे।
कौन हैं धनंजय
धनंजय पंजाब विश्वविद्यालय की पहल्री ट्रांसजेंडर स्टूडेंट हैं और इनके ही प्रयास से पीयू में सबसे पहले ट्रांसजेंडर के लिए अलग से शौचालय बनवाया गया। शिक्षण संस्थाओं के दाखिला फार्म में महिला-पुरुष के साथ तीसरा ऑप्शन ट्रांसजेंडर जुड़वाने का श्रेय भी इन्हें ही जाता है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2014 में ट्रांसजेंडर्स के लिए प्रवेश फॉर्म में ऑप्शन देने का आदेश दिया। एक पुरुष की तरह धनंजय ने अपनी पढ़ाई गवर्नमेंट कालेज सेक्टर-46 से पूरी की और विवाह भी किया। उनके दो बच्चे भी हैं। लेकिन खुद की भावनाओं से जूझ रही धनंजय ने अपने परिवार से अपने व्यक्तित्व के बारे में बात की और समाज में अपने अस्तित्व को बयां किया। इसके बाद से ही उन्होंने किन्नरों के हक की लड़ाई छोटे छोटे स्तर पर शुरू कर दी थी।