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भूकंप आया तो 'सिहर' उठेंगे ये क्षेत्र, मच सकती 'तबाही'

Sun, 26 Apr 2015 10:45 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़/हरियाणा
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खुशकिस्मती है कि भूकंप के हल्के झटकों के बाद हरियाणा महफूज रहा। कहीं जिंदगी पर आंच नहीं आई। पर, यहां की भौगोलिक स्थिति ‘सिहरन’ जरूर पैदा करती है। भूकंप के लिहाज से राज्य के 21 में से 15 जिले खतरनाक जोन (हाई डैमेज रिस्क जोन) में हैं। झटके जरा भी तेज हुए तो हरियाणा के इन जिलों में भूकंप भारी तबाही का सबब बन सकता है। रिपोर्टः धर्मेंद्र यादव
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पूर्वी, दक्षिण-पूर्वी और मध्य हरियाणा के 15 जिले सर्वाधिक खतरनाक माने गए हैं। ये सभी जिले जोन चार में आते हैं। बता दें कि हाई डैमेज रिस्क जोन को नंबर चार जोन में रखा गया है। इससे कम रिस्क को जोन तीन और सबसे कम रिस्क के क्षेत्र को जोन चार का नाम दिया गया है।
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हरियाणा के केवल तीन पश्चिमी जिले (सिरसा, फतेहाबाद व हिसार) कुछ सुरक्षित कह सकते हैं। आपदा प्रबंधन संस्थान (हरियाणा लोक प्रशासन संस्थान गुडगांव) के प्रमुख डा. अभय कुमार श्रीवास्तव का कहना है कि भौगोलिक लिहाज से क्षेत्र को तीन जोन में सूचीबद्ध किया गया है। हरियाणा के 15 जिले जोन चार आते हैं।

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वैसे तथ्य यह भी है कि यदि रिएक्टर पैमाने पर भूकंप की तीव्रता छह का आंकड़ा छू जाएगी तो पूरा हरियाणा भूकंप की जद में आ सकता है। छह और इससे ज्यादा तीव्रता वाले भूकंप के झटके अमूमन 150 से लेकर 200 किलोमीटर तक नुकसान पहुंचाते हैं।
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जोन चार: भूकंप में तबाही के लिहाज से इस जोन में फरीदाबाद, गुडगांव, पलवल, मेवात, रेवाड़ी, सोनीपत, रोहतक, झज्जर, पानीपत, करनाल, कुरुक्षेत्र, यमुनानगर, अंबाला व पंचकूला जिले शामिल हैं। इस जोन में नारनौल का आधा हिस्सा भी शामिल है।
जोन तीन: भिवानी, जींद, कैथल और हिसार। इस जोन में नारनौल का आधा और हिसार का 25 प्रतिशत हिस्सा शामिल है।
जोन दो: भूकंप में तबाही के लिहाज से सबसे कम रिस्की इस जोन में सिरसा व फतेहाबाद जिलों के अलावा हिसार का 75 प्रतिशत हिस्सा शामिल हैं।
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हरियाणा में 1960 में भूकंप आया था। रिएक्टर पैमाने पर भूकंप की तीव्रता 6.2 थी। गुड़गांव के साथ-साथ दिल्ली की जमीन कांपी थी। डॉ. अभय कुमार श्रीवास्तव बताते हैं कि भूकंप में दो लोगों की मौत हुई थी और करीब दो सौ घर तबाह हो गए थे। राज्य के इतिहास में यह भूकंप की सर्वाधिक तीव्रता रही। चार-पांच साल पहले भी आए भूकंप की तीव्रता 4.2 रही।
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पंजाब यूनिवर्सिटी के जियोलॉजी विभाग के पूर्व प्रोफेसर एडी आहलूवालिया ने बताया कि चंडीगढ़ भी भूकंप के डेंजर जोन में आता है। यह शहर चंडीगढ़-पिंजौर के फाल्ट जोन में स्थित है, जो काफी एक्टिव है। इस बारे में आईआईटी कानपुर और जापान के भूकंप वैज्ञानिकों की एक लंबी रिसर्च है। ऐसे में शहर और उसके आसपास सेफ बिल्डिंग प्रैक्टिस पर जोर देना होगा। साथ ही पहाड़ों में शहर को खड़ा करने की कवायद को रोकना होगा। अब तक जो भी भूकंप आए हैं, उनमें अधिकतर लोगों की मौत मलबे में दबने से होती है।

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आहलुवालिया ने बताया कि नेपाल में भूकंप का रिएक्टर स्केल 7.9 दर्ज किया गया है। करीब इतनी ही तीव्रता वाला भूकंप साल 1905 में हिमाचल के कांगड़ा में भी आया था। उस दौरान 20 हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे। नेपाल में भी बहुत ज्यादा नुकसान हुआ होगा। उन्होंने बताया कि एक बार भूकंप आने के बाद उसके दोबारा चांस जल्द बनते हैं। इसलिए यहां भी कभी भी भूकंप आ सकता है।
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आहलुवालिया के मुताबिक भारत में भू विज्ञान के बारे में बहुत कम बात होती है। भारत के चार प्रतिशत कालेज में भू विज्ञान पढ़ाया जाता है, जबकि चीन में यह अनुपात 74 प्रतिशत है। इसी का नतीजा है कि साल 1976 में जब चीन में भूकंप आने वाला था तो पहले से ही शहर को खाली करा लिया गया था। इससे करीब डेढ़ लाख लोगों को सुरक्षित बचा लिया गया था।
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