मशहूर क्रिकेटर रहे कॉमेडियन नवजोत सिद्धू की निजी जिंदगी का एक ऐसा सच सामने आया है, पत्नी नवजोत कौर भी नहीं जानती होंगी। ये राज उन्होंने खुदा खोला, आप भी जानिए।
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नवजोत सिंह सिद्धू
तीन साल के लिए भारतीय क्रिकेट टीम से बाहर था। घर पर रहता था। सुबह पांच बजे पिता जी उठा देते थे। सेवादारों को कुछ पैसे देकर दूसरे कमरे में सो जाया करता था। दो घंटे बाद उठता... पानी से भीगी टी शर्ट, पगड़ी डालता और बाहर निकलकर ऐसे आता था कि जैसे खूब मेहनत कर रखी हो।
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नवजोत सिद्धू
- फोटो : फाइल फोटो
इसका जिक्र पूर्व भारतीय क्रिकेटर और पंजाब के स्थानीय निकाय मंत्री नवजोत सिंह सिद्ध ने जी मीडिया की ओर से पंजाब, हरियाणा, हिमाचल के खिलाड़ियों के उत्थान के लिए आयोजित एक कानक्लेव में किया। आगे की बातचीत में उन्होंने बताया कि एक दिन की बात है कि जब वाशरूम से निकला तो देखा पिता जी रो रहे थे। इसका कारण पूछा तो पिता जी ने एक न्यूज दिखाई, जिसमें लिखा था...स्ट्रोकलेस प्लेयर।
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navjot singh sidhu
नवजोत सिद्धू ने बताया कि उन्होंने उसी वक्त अपनी अलमारी खोली, सभी रंगीन कपडे़ अपने सेवादारों में बांट दिए, सारी चीजें छोड़ दीं और अंजुली में जल भरकर प्रतिज्ञा ली कि अब खुद को धोखा नहीं दूंगा। उसके बाद मैं रोजाना उठता, अपने सेवादारों के साथ मैदान पर पहुंचता, खुद पिच को पानी देता और रोजाना डेढ़ सौ छक्के लगाता। तीन साल तक लगातार ऐसा करता रहा। मेरे हाथों से खून रिसने लगता था। उसके बाद कपिल देव ने बुलाया।
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नवजोत सिंह सिद्धू
शीशमहल ट्राफी का मौका था, मैंने खेला और मेरे छक्के देखकर सबके छक्के छूटने लगे। मुझ पर कोई प्रभाव नहीं था, मुझे तो खेलते जाना था। उसके बाद दुबई में शारजाह और उसके बाद वर्ल्ड कप में मेरे बल्ले को कई खिलाड़ियों ने देखा कि आखिरकार मैंने बल्ले में क्या फिट किया है। उनको क्या मालूम कि मैं तो रोजाना डेढ़ सौ छक्के लगाता था। एक बडे़ टूर्नामेंट के लिए मैं फ्लाइट पर था और एक अखबार तीन साल बाद मेरे हाथों में पड़ा, मैं उसमें पढ़ रहा था...उसमें लिखा था ‘सिक्सर सिद्धू।
नवजोत सिंह सिद्धू ने कहा कि वास्तव में खिलाड़ी के लिए कुछ मुश्किल नहीं। अड़चन हों या फिर मुश्किलें, खिलाड़ी सब कुछ पार कर लेता है। पंजाब में खिलाड़ियों में दमखम है पर उसको एक दिशा में ले जाना होगा। उन्होंने कहा कि बेशक सरकार के पास फंड की कमी है, पर सरकार इसे आसान करने की कोशिश में लगी है। उन्होंने कहा कि जरूरी नहीं कि स्टेडियम तैयार किए जाएं, गांव में छोटे-छोटे मैदान बनाकर खेलों को बढ़ावा दिया जा सकता है। उन्होंने पहले दिन से ही खिलाड़ियों के लिए प्रयास शुरू कर दिए हैं और नतीजा भी जल्द ही सामने होगा।