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बर्ड फ्लू: इस शहर ने जब अपनी 'मोहब्बत' को उजाड़ा, पहले दी बेहोशी की दवा...फिर गर्दन तोड़ जलाया

Tue, 05 Jan 2021 10:08 PM IST
ajay kumar आशीष वर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
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2014 में चंडीगढ़ में बर्ड फ्लू ने दी दस्तक। - फोटो : अमर उजाला
उत्तर भारत के कई प्रदेशों में बर्ड फ्लू की दस्तक के बाद चंडीगढ़ के जख्म फिर से हरे हो गए हैं। आज से करीब छह साल पहले बर्ड फ्लू ने चंडीगढ़ की रौनक छीन ली थी। सिटी ब्यूटीफुल की लाइफ लाइन मानी जाने वाली सुखना लेक पर 125 से ज्यादा बत्तखों का बसेरा था। इन बत्तखों से चंडीगढ़ को इतनी ज्यादा मोहब्बत थी कि लेक पर आने वाला हर व्यक्ति इनके साथ फोटो खिंचवाए बिना नहीं जाता था। 
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- फोटो : अमर उजाला
बच्चे उनके पीछे भागते रहते थे। सुबह शाम उन्हें दाना देने के लिए लोगों की भीड़ जुटी रहती थी। शहरवासियों के फोटो एलबम इन बत्तखों की यादों से अब भी भरे हैं। 2014 में जब कड़ाके की ठंड पड़ रही थी, उसी दौरान 14 दिसंबर को बत्तखों के मरने का सिलसिला शुरू हो गया था। एक-एक करके 25 बत्तखों की मौत हो गई थी।
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कुछ ऐसे मारी गई थीं बतखें - फोटो : अमर उजाला
स्थानीय प्रशासन हरकत में आया और तुरंत सैंपल जालंधर की लैब में भेजे गए। लेकिन वहां पुष्टि नहीं हो पाई। उसके बाद बत्तखों के सैंपल भोपाल स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाई सिक्योरिटी एनिमल डिजीज (एनआईएचएसएडी) भेजे गए और बर्ड फ्लू की पुष्टि हो गई। लैब में बर्ड फ्लू की पुष्टि होते ही अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए। उसके बाद उन्होंने सभी बत्तखों के मारने का फैसला लिया।

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- फोटो : अमर उजाला
एक में मिला था वायरस, सभी को ऐसे मारा गया था
लैब में छह सैंपल भेजे गए थे। इनमें से एक में वायरस की पुष्टि हुई थी। उसके बाद एहतियात के तौर पर सभी बत्तखों को मार दिया गया। मारने से पहले उनके खाने में बेहोशी की दवा मिलाई गर्ई थी। जब वे बेहोश हो गई थी तो उनकी गर्दन तोड़कर उन्हें जला दिया गया। सर्दी होने की वजह से अंधेरा जल्दी होगया था। 



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- फोटो : अमर उजाला
कर्मचारी टार्च व फ्लड लाइटों की मदद से अपने अभियान में जुटे रहे। बाद में उनकी राख को सुखना लेक के आईलैंड में ही दफना दिया गया था। उसके बाद एक टीम ने रात में ही पूरी सुखना लेक का दौरा किया, ताकि कोई पक्षी जिंदा न रह जाए।
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- फोटो : अमर उजाला
बर्ड फ्लू कैसे पहुंचा, नहीं पता लग पाया था
सुखना पर बर्ड फ्लू कहां से आया अब तक इसकी पुष्टि नहीं हो पाई और न ही कभी प्रशासन ने इस बारे में कुछ बताया। लेकिन जानकारों का कहना था कि लेक पर प्रवासी पक्षी आते हैं। वो ही वायरस लेकर आए होंगे। बाद में प्रवासी पक्षियों के भी सैंपल लिए गए थे लेकिन उनमें बर्ड फ्लू की पुष्टि नहीं हो पाई। हालांकि प्रवासी पक्षी अब भी आते हैं लेकिन बत्तखों के बिना सुखना झील वीरान ही है।
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- फोटो : अमर उजाला
पहली बार एक महीने तक बंद थी सुखना लेक
बर्ड फ्लू की पुष्टि होने के बाद सुखना लेक को सील कर दिया गया था। आने जाने पर पाबंदी लग गई। पूरी सुखना लेक व आसपास के इलाकों को सैनिटाइज किया गया। उसके बाद करीब एक किलोमीटर में सर्च अभियान चलाया गया, ताकि कोई पक्षी जिंदा न बचा हो। तीन किलोमीटर क्षेत्रफल में रहने वाले सभी लोगों के स्वास्थ्य की जांच की गई। प्रशासन की पूरी कोशिश थी कि बर्ड फ्लू इंसानों तक न पहुंच पाए।
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