दिवाली पर बंदी छोड़ दिवस के उपलक्ष्य में निहंग सिखों ने मोहल्ला निकाला और घोड़ों के साथ ऐसे-ऐसे करतब दिखाए, देखकर लोगों के मुंह खुले रह गए, देखिए तस्वीरें।
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बंदी छोड़ दिवस
दिवाली के दिन सिख धर्म के अनुयायी ‘बंदी छोड़ दिवस’ के नाम से त्यौहार मनाते हैं। पंजाब के अमृतसर में वीरवार को बुर्ज फूला सिंह से लेकर गुरुद्वारा बी ब्लाक रेलवे कॉलोनी तक नगर कीर्तन निकाला गया। इसमें बड़ी संख्या में निहंग सिख घोड़ों व हाथियों पर सवार होकर शामिल हुए। बी ब्लाक खेल मैदान में पहुंच कर सभी ने करबत दिखाए गए। कार्यक्रम के दौरान घुड़सवारी, गतका आदि भी प्रतियोगिताएं आयोजित की गई।
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बंदी छोड़ दिवस
इस त्योहार को मनाने के पीछे का इतिहास बड़ा रोचक है। जानकारी के मुताबिक, सिख धर्म के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए बादशाह जहांगीर ने सिखों के छठवें गुरू हरगोबिंद साहिब जी को बंदी बना लिया। उसने हरगोबिंद साहिब जी को ग्वालियर के किले में कैद कर दिया जहां पहले से ही 52 हिन्दू राजा कैद थे। लेकिन संयोग से जब जहांगीर ने गुरू हरगोबिंद साहिब जी को कैद किया, वह बहुत बीमार पड़ गया।
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बंदी छोड़ दिवस
काफी इलाज के बाद भी वह ठीक नहीं हो रहा था। तब बादशाह के काजी ने उसे सलाह दिया कि वह इसलिए बीमार पड़ गया है क्योंकि उसने एक सच्चे गुरु को कैद कर लिया है। अगर वह स्वस्थ होना चाहता है तो उसे गुरु हरगोबिंद सिंह को तुरंत छोड़ देना चाहिए। कहते हैं कि अपने काजी की सलाह पर काम करते हुए जहांगीर ने तुरंत गुरु को छोड़ने का आदेश जारी कर दिया। लेकिन गुरु हरगोबिंद सिंह जी ने अकेले रिहा होने से इनकार कर दिया।
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बंदी छोड़ दिवस
उन्होंने कहा कि वे जेल से बाहर तभी जायेंगे जब उनके साथ कैद सभी 52 हिन्दू राजाओं को भी रिहा किया जायेगा। गुरू जी का हठ देखते हुए उसे सभी राजाओं को छोड़ने का आदेश जारी करना पड़ा। लेकिन यह आदेश जारी करते समय भी जहांगीर ने एक शर्त रख दी। उसकी शर्त थी कि कैद से गुरू जी के साथ सिर्फ वही राजा बाहर जा सकेंगे जो सीधे गुरू जी का कोई अंग या कपड़ा पकड़े हुए होंगे। उसकी सोच थी कि एक साथ ज्यादा राजा गुरू जी को छू नहीं पायेंगे और इस तरह बहुत से राजा उसकी कैद में ही रह जायेंगे।
जहांगीर की चालाकी देखते हुए गुरू जी ने एक विशेष कुरता सिलवाया जिसमें 52 कलियां बनी हुई थीं। इस तरह एक-एक कली को पकड़े हुए सभी 52 राजा जहांगीर की कैद से आजाद हो गये। जहांगीर की कैद से आज़ाद होने के बाद जब गुरू हरगोविंद सिंह जी वापस अमृतसर पहुंचे तब पूरे गुरुद्वारे में दीप जलाकर गुरू जी का स्वागत किया गया। कुछ समय पश्चात् इस दिन को बंदी छोड़ दिवस के रूप में मनाये जाने का फैसला लिया गया।