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कहने को 'काला पानी', देखिए तो बिल्कुल जन्नत

Mon, 17 Nov 2014 09:37 AM IST
अनिल भारद्वाज/अमर उजाला, पोर्ट ब्लेयर से लौट कर
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कहने को अंडमान-निकोबार द्वीप समूह को 'काला पानी' कहा जाता है, लेकिन यहां की लोकेशन जन्नत जैसी हैं।
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यूं तो अंडमान वाटर स्पोर्ट्स कांप्लेक्स का नाम सुनकर हमें ऐसे लगा मानो यहां मनोरंजक खेल ही हमारा स्वागत करेंगे। वहां पहुंचे तो जहां फिर से प्रकृति का अद्भुत नजारा दिखाई पड़ा, वहीं सुनामी से हुए नुकसान और 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की यादें भी ताजा हो गईं।
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वहीं, पार्क के एक हिस्से में स्थित 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की याद में खड़ा स्तंभ हमें उन अनगिनत शहीदों को नमन करने पर मजबूर कर गया, जो हंसते-हंसते देश की माटी के लिए शहीदी का जाम पी गए।

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किरणों में नहाई पोर्ट ब्लेयर की हरियाली ने अहसास करवाया कि हम असल में प्रकृति की गोद में आ गए। वैसे दिन में भी हमें प्रकृति के बिल्कुल करीब जाना था। मतलब समंदर का पानी, इसके बीचो-बीच बसे टापुओं की हरियाली, ऊपर नीला आसमान, सभी के खुले दर्शन दिन में होने थे।
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हवा के बहाव के साथ क्रूज का हिचकोले खाना हमें अहसास करवा रहा था कि कुदरत से ऊपर कुछ नहीं है। खैर, करीब तीन घंटे की यात्रा के बाद हमारा दल हैवलॉक पहुंचा और हमारे ठहरने के पड़ाव तक पहुंचने के रास्ते में जो शांति का अहसास हुआ, उसे बयां करने के लिए शब्द कम पड़ रहे हैं।
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पानी इससे ऊपर जाता, हम संभले लेकिन समंदर के पानी में खड़े होकर हरियाली व खुले आसमान का जो नजारा दिखाया पड़ा, उसमें दुनिया की रोज-मर्रा की दौड़-धूप कुछ समय के लिए धूमिल हो गई। सूर्यास्त के साथ समंदर के पानी का स्तर बढ़ता और लहरों का वेग तेज होता दिखाई पड़ा।
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‘काला पानी।’ पंजाब वासियों के सीने में यह शब्द आज भी तीखे तीर की तरह चुभता है, क्योंकि आजादी से पहले देश के अन्य हिस्सों की तरह ही अनेक पंजाबियों ने वहां की जेल में भारत की आजादी के लिए अपनी जान कुर्बान कर दीं।

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आज ‘काला पानी’, यानी अंडमान-निकोबार द्वीप समूह भारत के एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो चुका है। लेकिन वहां की सेल्युलर जेल की दीवारें, तंग कोठरियां, आजादी के उन सैकड़ों परवानों के दर्द को बयां करती हैं, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के इंतहा अत्याचार सहे।

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इस जेल को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया जा चुका है। आजादी के लिए जीवन कुर्बान करने वालों की याद में इस जेल में अखंड ज्योति जल रही है। फोटो गैलरी में प्रदर्शित स्वतंत्रता सेनानियों की तस्वीरें उन्हें सम्मान दे रही हैं।

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हर शाम जेल में होने वाले लाइट एंड साउंड शो में जो दिखता है, वह प्रमाणित करता है कि जो कुछ आजादी के परवानों ने सहा उसका मोल शायद हम भारतवासी, जिंदगी भर न चुका पाएं।

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शाम को सबसे पहले हम जिस स्थान पर गए, वह था अटलांटा प्वाइंट पर स्थित सेल्युलर जेल। कहने को तो यह हमारा अध्ययन दौरा था, लेकिन मन से यह किसी तीर्थ यात्रा से कम नहीं था।

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जेल कोठरियों के बीचो-बीच आगे बढ़े तो सेंट्रल वॉच टॉवर आ गया। इसी से जुड़ी थीं, सभी सात (अब तीन बाकी) जेल पंक्तियां, जिनमें 13.5 गुणा 7 गुणा 10 फुट की 698 एकांत कोठरियां स्थित थीं। इनमें से हरेक के पीछे की तरफ 3 गुना 1 फीट का वेंटिलेटर दिया गया था।

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जेल के द्वार पर पहुंच कर शहीदों को नमन करते हुए अंदर प्रवेश किया और फोटो गैलरी से होते हुए, आगे खुले मैदान में पहुंचे। सामने सेंट्रल वॉच टॉवर और उससे जुड़ी जेल कोठरियों की तीन पंक्तियां। जेल कोठरियों की दो पंक्तियों के बीचो-बीच एक वर्क सेंटर तथा पार्क में एक स्वतंत्रता सेनानी रूपी प्रतिमा।
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‘काला पानी’ की सजा होने के बाद स्वतंत्रता सेनानियों ने इन्हीं में अपनी जिंदगियां बिताईं और जेल के वर्क हाउस में जुल्म सहते हुए आजादी के लिए कुर्बानियां दे दीं। सच कहा जाता है कि ‘काला पानी’ की सजा होने का मतलब होता था, जिंदगी खत्म।
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