देखिए ये हैं वो मां, पत्नियां और परिजन, जिन्होंने अमृतसर ट्रेन हादसे में खो दिए अपने, टूट कर बिखर गए सपने। किसी का सुहाग उजड़ गया, तो किसी की कोख। किसी का भाई नहीं रहा, तो किसी के परिवार का इकलौता कमाने वाला। हर आंख नम है, सभी को इंसाफ की आस है। सरकार मुआवजा देकर मरहम तो लगा रही है, लेकिन उन्हें यह तो पता चले कि इन 59 मौतों का जिम्मेदार आखिर कौन है। कहीं मुआवजे की रकम के तले इंसाफ दब तो नहीं जाएगा। अमर उजाला की टीम ने कई पीड़ित परिवारों का दुख बांटा और उनके मौजूदा हालात पर बातचीत की, पढ़ें...
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अमृतसर ट्रेन हादसा
दोनों बेटियों का उजड़ गया सुहाग, दोहते की भी गई जान
90 साल की शिवपति की दो ही बेटियां है। किसी तरह उन्होंने दोनों बेटियों को पाल पोसकर उनकी शादियां कीं। एक बेटी प्रीति अमृतसर में बिल्लेवाला चौक के पास मोहल्ले में रहती हैं। उनका दामाद दिनेश प्लंबर था। मेहनत कर उसने अपना घर बना लिया और तमन्ना थी कि दोनों बेटों अभिषेक और आरुष को पढ़ा लिखाकर अफसर बनाएगा। वहीं उनकी दूसरी बेटी राधा सुल्तानपुर से आई हुई थी। उसके बेटे विशाल का मुंडन था। सबने तय किया था कि वह दशहरा मनाने के बाद वैष्णो देवी जाएंगे। लेकिन उनकी खुशी को पता नहीं किसी नजर लग गई। धड़धड़ाती ट्रेन सारे ख्वाबों को रौंदती चली गई। हादसे में शिवपति की दोनों बेटियां प्रीति और राधा विधवा हो गईं। दोहता अभिषेक भी मौत की आगोश में चला गया। खुद भी घायल हो गई हैं। न बोल पाती है और न ही ढंग से सुन पाती है। आसपास बैठी महिलाएं कहती हैं कि दोनों बेटियों का सुहाग उजड़ गया, क्या अब भी सरकार से इंसाफ मांगना पड़ेगा। घर में खाने के लिए कुछ नहीं है। अगर सरकार ने इंसाफ नहीं दिया तो इसका एक ही मतलब है कि यह देश सिर्फ अमीरों की सुनता है। गरीबों की चीखें तो दबकर रह जाती हैं।
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अमृतसर ट्रेन हादसा
पहाड़ सी जिंदगी कैसी कटेगी...
निर्मला यूपी के जिला बलिया के गांव वरसारिकपुर की रहने वाली है और रविवार को अमृतसर आई। निर्मला के पति 45 वर्षीय दिनेश राजमिस्त्री का काम करते थे। ट्रेन हादसे में दिनेश की जान चली गई। पीछे रह गए हैं 14 साल का बेटा दीपांशु, 20 साल की बेटी नीतू और 16 साल की बेटी निशा। निर्मला की आंखों से लगातार बहते आंसू उसकी सारी हालत बयां कर रहे हैं। निर्मला कहती है कि पति अमृतसर में कमाते थे और गांव में पैसा भेजते थे, उसी से बच्चे पढ़ते थे। घर में दो दिन से खाना नहीं बनाया। आसपास की महिलाएं आकर खाना दे जाती है। जिला प्रशासन की तरफ से अभी जो लिस्ट तैयार की गई है, उसमें उनका नाम तक नहीं है। निर्मला का कहना है कि गांव से आने के बाद सिर्फ आसपास के लोग ही उनका सहारा है। समझ नहीं आ रहा कि आगे क्या होगा। क्या बच्चे पढ़ पाएंगे, क्या उनकी शादियां हो पाएंगी। क्या वे जी भी पाएंगे।
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अमृतसर ट्रेन हादसा
इंसाफ कौन देवेगा, एह ता आपस विच ही डांग सोटा होन नूं फिरदे ने...
दशमेश नगर की सोनिया के परिवार में तीन महिलाएं हादसे की भेंट चढ़ गई। सोनिया की सास निर्मला, ननद रितु और देवरानी कर्मजोत ट्रेन से कट गई। सोनिया कहती हैं कि हमारे यहां चार मौत हुई है, देवरानी छह माह की गर्भवती थी। सास निर्मला का काफी सहारा था। सोनिया के पति पवनदीप कारखाने में काम करते हैं, जबकि देवर रवि टेलर मास्टर हैं। सोनिया कहती है कि हमारा तो घर उजड़ गया। इंसाफ की उम्मीद कहां से होगी, इंसाफ देने वाले खुद डांग सोटा चलाने को फिर रहे हैं। हमारी सुध कौन लेगा।
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अमृतसर ट्रेन हादसा
सारे सपने टूट गए...
21 साल की कुसुम एलपीयू के डिस्टेंस एजुकेशन के माध्यम से बीबीए कर रही थी। उसके पिता रामनाथ चाहते थे कि वह खूब पढ़े। अब सारे सपने टूट गए हैं। बहन संध्या और सुषमा कहती हैं कि चार दिन हो गए, कुसुम का कुछ अता पता नहीं है। सब कुछ धुंधला सा नजर आ रहा है।
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Amritsar train accident
- फोटो : PTI
तीन बहनों का इकलौता भाई था नीरज
धर्मपुरा निवासी नीरज कुमार तीन बहनों का इकलौता भाई था, जो दशहरे के दिन ट्रेन की चपेट में आ गया। उसकी बहनें ज्योति और नेहा शादीशुदा हैं, जबकि नैंसी अभी पढ़ाई कर रही है। नीरज के पिता मुकेश बेटे के गम में खामोश हैं। सिर्फ एक कमरे में गुजारा करने वाले परिवार की रोजी रोटी का सहारा नीरज ही था। सोमवार को परिवार उसकी क्रिया करने के लिए गया हुआ था। आसपास के लोगों का कहना है कि परिवार का गुजारा कैसे चलेगा, कुछ समझ नहीं आ रहा।
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अमृतसर ट्रेन हादसा
बेटा चला गया, कैसे होगा गुजारा
अमरकोट निवासी बलवीर सिंह (45) मां वरिंदर कौर, पत्नी और तीन बच्चों का सहारा था। शुक्रवार शाम को पूरे परिवार के साथ एक छत पर खड़ा होकर दशहरा देख रहा था, ट्रेन को देखते ही छत से कूद कर लोगों को बचाने गया और ट्रेन की चपेट में आ गया। बेटे के गम में वरिंदर कौर के मुंह से सिर्फ एक ही बात निकल रही है कि मेरी जान चली जाती, पर मेरा बेटा तो बच जाता। बलवीर की पत्नी जसवीर कौर घर में रहती है, बड़ा बेटा कर्मजीत बारहवीं, छोटा गुरप्रीत ग्यारहवीं और बेटी मनप्रीत कौर नौवीं क्लास में पढ़ रही है। अब तीनों की पढ़ाई का खर्च कहां से लाएंगे, उम्मीदें खत्म सी हो गई हैं।
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अमृतसर ट्रेन हादसा
कोई आंसू पोंछने तक नहीं आया
अपने 19 साल के बेटे अकाश को खोने वाले अनिल कुमार की आंखों में सिर्फ दर्द है। साथ ही वे रेलवे प्रशासन और जिला प्रशासन पर भी नाराज हैं। जनरल स्टोर पर काम करने वाले अनिल कुमार का घर जौड़ा फाटक के साथ लगते मोहल्ला कृष्णा नगर की गली नंबर पांच में है। अनिल कहते हैं कि जितनी पुलिस फोर्स अब रेलवे ट्रैक पर अब खड़ी हैं, हादसे के दिन उससे आधी भी होती तो यह हादसा न होता। अब पुलिस फोर्स रेलवे लाइनों पर आने वाले लोगों का रास्ता रोक रही है। अब तक कोई भी राजनीतिक व्यक्ति अफसोस जताने घर नहीं आया। आकाश ने अभी बारहवीं पास की थी और सितंबर में ही रेलवे भर्ती का ग्रुप-डी का पेपर दिया था। गमगीन अनिल कहते हैं कि सजा तो दोषियों को मिलनी चाहिए, मगर यहां पर ऐसा होता नहीं है। आरोपियों को जेल भेजने की मांग तो है, लेकिन हमारी आवाज सुनेगा कौन।
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अमृतसर ट्रेन हादसा
ऐथे इंसाफ मिलदा कित्थे है- वीना कुमारी
अब कुछ भी हो मेरा बच्चा नहीं मिलना। 72 साल की वीना कुमारी कहती हैं कि मेरा बेटा मेरा सहारा था। हलवाई का काम करने वाले 38 साल के सुरेश कुमार की दो महीने बाद शादी होने वाली थी। वह भी जौड़ा फाटक पर हादसे का शिकार हो गया। कृष्णा नगर की गली नंबर पांच में रहने वाली वीना ने कहा कि गरीबों को इंसाफ कित्थे मिलदा है। उसे घर से जलेबी लेने भेजा था, लेकिन वह दोस्तों के साथ जौड़ा फाटक पर रावण दहन देखने चला गया और फिर वापस नहीं आया। वीना कहती हैं कि लोग रावण दहन देखने क्यों जाते हैं। अब कुछ भी हो, मेरा बच्चा नहीं मिलना। सुरेश के भाई अनिल कुमार ने कहा कि जिस पटरी पर यह हादसा हुआ, उसके पास ही फाटक था, अगर वहां पर मौजूद गैंगमैन ट्रेन को लाल सिग्नल दिखा देता तो शायद यह हादसा न होता। उनकी यही मांग है कि राज्य सरकार को आरोपियों पर सख्त एक्शन लेना चाहिए। पर ऐथे इंसाफ मिलदा कित्थे है, कौन सुनदा है गरीबां दा।
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अमृतसर ट्रेन हादसा
कौन सुनेगा साडी...परिवार को संभालने वाला ही चला गया
58 साल के मदन लाल पूरे परिवार का सहारा था। मजदूरी कर बेटे को एक निजी कंपनी में नौकरी पर लगवाया तो सोचा था कि अब कुछ दिन आराम से कटेंगे लेकिन शुक्रवार के हादसे ने मदन लाल को मौत ने अपने आगोश में ले लिया। चौधरी हरी सिंह नगर के रहने वाले मदन लाल का बेटा बलविंदर कुमार कहता है कि भाजी मुआवजे के बोझ तले कहीं इंसाफ का तराजू टूट न जाए। पैसों से परिवारों को मरहम तो लग सकती है लेकिन हादसे का जिम्मेदार कौन है, यह सच भी तो सामने आना चाहिए। उनके पड़ोसी दलजीत सिंह कहते हैं कि मदन लाल नेक इंसान थे। हम तो इंसाफ की उम्मीद लगाकर बैठे हैं लेकिन आशा की किरण दिख नहीं रही है।
जवान बेटा गया है, इंसाफ तो चाहिए ही
धर्मपुरा की गली नबंर दो में रहने वाले विजय कुमार का बेटा मनीष कुमार भी इस हादसे का शिकार हुआ है। गम में डूबे पिता विजय कुमार ने कहा कि अपनी आंखों से बेटे का शव देखा तो मेरा दिल ही फट गया, रब ऐसा मंजर किसी दुश्मन को भी न दिखाए। उनके बेटे का सिर अलग हो गया था। बेटे का सिर तो मिल गया, लेकिन उसका धड़ ढूंढने में पूरा परिवार जुटा है। सिविल अस्पताल, गुरुनानक अस्पताल, गुरु रामदास अस्पताल, मिलिट्री अस्पताल सभी के रात भर चक्कर काटे, मगर उसका कुछ पता नहीं चला। शनिवार दोपहर को बेटे के शव का धड़ सिविल अस्पताल में मिला। उनके बेटे ने बारहवीं पास की थी और अब कॉलेज में बीकॉम करनी थी। विजय कुमार कहते हैं कि अगर जौड़ा फाटक पर सिग्नल हरा न होता तो उसके बेटे की जान बच जानी थी। जब सबको पता था कि वहां पर धार्मिक कार्यक्रम हो रहा है, तो वहां पर ट्रेन को धीरे क्यों नहीं किया गया। गलती ट्रेन ड्राइवर और जौड़ा फाटक पर ड्यूटी दे रहे गेटमैन की है। वहीं एलईडी स्क्रीन को रेलवे लाइनों की तरफ क्यों लगाया। आरोपियों पर कानूनी कार्रवाई जरूर होनी चाहिए। इंसाफ मिलना चाहिए ताकि आगे से ऐसा हादसा न हो और मेरे बेटे की शहादत बेकार न जाए...