सेना में रह चुके, पाकिस्तान से तीन लड़ाइयां लड़ चुके शख्स की जुबानी सुनिए, युद्ध के दौरान जवानों की हालत की कहानी। वे कहते हैं, न खाना मिलता है और न पीने को पानी, पूरी रिपोर्ट पढ़ने के लिए क्लिक करें।
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- फोटो : DEMO Pics
युद्ध, एक शब्द नहीं है। अपने आप में पूरी दास्तां है। देश को आर्थिक नुकसान ही नहीं होता, बल्कि अनगिनत लोग मारे जाते हैं। फिर भी अपने देश व जनता की रक्षा के लिए लड़ना पड़ता है। फिर वह भूखे रह कर ही क्यों न लड़ना पड़े। हमने ये दिन देखे नहीं, जिए हैं। पाकिस्तान से वर्ष 1965, 1971 व 1999 में हुई लड़ाई में मैंने न केवल हिस्सा लिया, बल्कि दुश्मन को नाकों चने चबवाए। इस दौरान सात-सात दिन बगैर खाए पीए, लड़े। यह कहना है आईटीबीपी के सेवानिवृत्त असिस्टेंट कमांडेंट राममेहर का।
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पाकिस्तान से लड़ चुका हूं तीन लड़ाई
पूर्व असिस्टेंट कमांडेंट राममेहर ने बताया कि युद्ध लोगों के लिए एक शब्द होगा। सेना के जवानों के लिए पूरी कहानी है। मैंने एक नहीं तीन युद्ध लड़े हैं। पहला 1965 में राजौरी सेक्टर में पाकिस्तान के साथ। यह गोरिल्ला युद्ध था। उस समय मैं 22 साल का था। 19 साल की उम्र में भर्ती हो गया था। उस समय 1962 की चीन के साथ लड़ाई बंद हुई थी। इसके बाद वर्ष 1971 में थानाधार उड़ी सेक्टर व 1999 में कारगिल में बतौर सहायक लड़ाई लड़ी। ये आमने-सामने की लड़ाई थी।
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सात दिन बाद मिली सूखी रोटी पानी में भिगो कर खाई
राममेहर बताते हैं कि युद्ध के दौरान हालात बेहद खस्ता होते हैं। यहां सबसे पहले खाने-पीने की दिक्कत शुरू होती है। तीन लड़ाइयों में यह कड़वा सच बेहद करीब से समझा। वर्ष 1965 की लड़ाई अब भी याद है। हम सात दिन तक भूखे प्यासे लड़ते रहे। युद्ध के दौरान मैस बंद रही। सातवें दिन हैलीकॉप्टर ने आकाश से खाने के पैकेट गिराए। दुश्मन की गोलियों के बीच जमीन पर रेंगते हुए इन्हें किसी तरह इकट्ठा किया। इसमें सूखी रोटी, गुड़ व चने मिले। रोटी पानी में भिगो कर नरम की और गुड़-चने के साथ खाई। इसी खुराक के सहारे दुश्मन से लड़े।
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पहली लाइन में खड़े होते हैं पैरामिलिट्री के जवान
राममेहर बताते हैं कि पैरामिलिट्री देश की सीमाओं की सुरक्षा करती है। यह पहली लाइन में रहती है। दुश्मन की गोली चलती है या हमला होता है, तो पहला वार पैरामिलिट्री ही झेलती है। सेना तो हमसे दो किलोमीटर दूर रहती है। दुश्मन के एकदम सामने खड़े रहकर हम लड़ते हैं। युद्ध शुरू होने के बाद सेना आती है। इस बीच सीमाओं की सुरक्षा बीएसएफ, आईटीबीपी व आसाम राइफल के हवाले रहती है।
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ट्रेनिंग के बाद सीधा सीमा पर गया लड़ने
भारत-पाक के बीच तीन दिसंबर 1971 में लड़ाई हुई थी। यह कभी भूल नहीं सकता। बीएसएफ में नया भर्ती हुआ था। उस समय 20 साल का था। ट्रेनिंग होते ही सीधे सीमा पर लड़ने चला गया था। घर आने का मौका तक नहीं मिला। छुट्टियां रद्द कर दी गई थीं। उस दिन हम ड्यूटी पर थे। शाम के करीब सवा छह बजे थे। सभी जवान खाना खाने की तैयारी में थे। इसी दौरान पाक सैनिकों ने हमला बोल दिया। खाना रखा रह गया। सभी जवान खाना छोड़ कर मोर्चा संभालने दौड़ पड़े। दोनों ओर से सुबह सवा चार बजे तक गोलीबारी होती रही। - प्रेम सिंह मलिक, सेवानिवृत्त कांस्टेबल, बीएसएफ
वायरलेस पर मिला पीछे हटने का संदेश
पूर्व कांस्टेबल प्रेम सिंह ने बताया कि हमें वायरलेस पर पीछे से स्पोर्ट नहीं मिलने की बात कहते हुए वहां से निकलने का निर्देश दिया गया। इसके बाद सभी जवान जमीन पर रेंगते हुए तीन किलोमीटर दूर बने अपने बंकर में पहुंचे। यह दूरी हमें दो घंटे में पूरी करनी थी। इसके बाद ब्रिज उड़ा दिया गया। ऐसा करने का मतलब दुश्मन सेना के टैंकों को आगे बढ़ने से रोकना था। यहां भी दोपहर करीब 12 बजे खाना मिला। यहां से हमें दूसरे मोर्चे पर भेज दिया गया। जाते समय रास्ते में हादसा हो गया। सारे जवान घायल हो गए। हम पांच जवान बचे थे, वह भी लहूलुहान हालत में।