वो मेरे कलेजे का टुकड़ा था, कितनी बदनसीब हूं आखिरी बार चेहरा भी नहीं देख सकती...और ताबूत देखकर मां बेहोश हो गई।
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धर्मिंदर सिंह का अंतिम संस्कार
इराक में मारे गए 39 भारतीयों में से बटाला के दो लोगों के अवशेष सोमवार को उनके घर लाए गए। अमृतसर से एंबुलेंस के जरिये बटाला के गांव तलवंडी झूरा के रहने वाले धरमिंदर कुमार के घर में उनका अवशेष पहुंचा तो कोहराम मच गया। एसडीएम रोहित गुप्ता की अगुवाई में पारिवारिक सदस्यों को अवशेष सौंपे गए। मां कंवलजीत और बहन डिंपलजीत के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे, मां तो बेहोश ही हो गई थी।
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धर्मिंदर सिंह का अंतिम संस्कार
सोमवार देर शाम करीब 6:30 बजे गांव के शमशान घाट में दाह संस्कार किया गया। बहन डिंपलजीत का कहना था कि उन्हें आस थी कि एक दिन उनका भाई जरूर आएगा, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। वह अपने भाई की कलाई पर राखी बांधने के लिए तरस रही थीं। उसे नहीं पता था कि भाई इस तरह घर आएगा। अगर सरकार को यह सब पता था तो अभिभावकों को अंधेरे में क्यों रखा गया।
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धर्मिंदर सिंह का अंतिम संस्कार
धरमिंदर की मां ने कहा कि सरकार आतंकियों को मारकर बेटे की मौत का बदला ले। उन्होंने कई सपने देखे थे, लेकिन साकार नहीं हो सकते। धरमिंदर की मां ने सरकार से मांग की कि घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। उनकी कोई माली सहायता की जाए ताकि धरमिंदर के बाद उनका जीवन ठीक से व्यतीत हो सके। गौरतलब है कि बटाला के गांव तलवंडी झूरां के रहने वाला 27 वर्षीय धरमिंदर कुमार रोजी रोटी के लिए इराक 2013 में गए थे।
पिता राजकुमार कहते हैं कि इस उम्र में बेटे की चिता को आग देनी पड़ रही है। इससे ज्यादा बदनसीबी और क्या होगी। वह सहारा बनने की बजाय बेसहारा छोड़कर चल गया। अगर सरकार की तरफ से समय रहते कोई ठोस कदम उठाया जाता तो उसके बेटे के साथ बाकी लोगों को भी बचाया सकता था। बेटे को आखिरी बार देखने की हसरत भी रह गई। सारी जिंदगी दिल को यह बात कचोटती रहेगी।