खेमकरण सेक्टर में टैंकों के साथ भारत की ओर बढ़ रही पाकिस्तान की सेना भारतीय सेना की रणनीति और रामचंद्र के हुंकार से टैंक छोड़ भाग खड़ी हुई। तस्वीरों में देखिए पूरी कहानी। रिपोर्ट: आशीष वर्मा, चंडीगढ़।
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1965 युद्ध: रामचंद्र की हुंकार से टैंक छोड़ भाग खड़ी हुई पाक सेना
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1965 के युद्ध में खेमकरण सेक्टर में पाकिस्तान ने सबसे बड़ा हमला बोला था। पाक की प्लानिंग थी कि खेमकरण पर कब्जा कर वहां अपना मोर्चा बनाकर व्यास और सतलुज नदी पर बने पुलों को ध्वस्त कर दिया जाए ताकि अमृतसर का इलाका भारत से कट जाए। इस रास्ते के सहारे पाक सैनिक दिल्ली पहुंचना चाहते थे, लेकिन भारतीय जवानों ने उन्हें वहीं पर ध्वस्त कर दिया। इस सेक्टर में पाकिस्तान की कमर तोड़ने वालों में चंडीगढ़ के एक आर्मी अफसर भी शामिल थे।
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चंडीगढ़ के सेक्टर 34 डी में रहने वाले वीर चक्र विजेता लेफ्टिनेंट कर्नल राम स्वरूप शर्मा ने शुक्रवार को अमर उजाला के साथ बातचीत में आठ और 21 सितंबर 1965 को हुए युद्ध के बारे में विस्तार से बताया। राम स्वरूप शर्मा उस समय राजपूताना राइफल्स में मेजर के पद पर तैनात थे। जब भारतीय सेना को जानकारी मिली कि खेमकरण सेक्टर में पाकिस्तान सेना कई टैंकों के साथ भारत की ओर बढ़ रही है तो उन्हें कंपनी के साथ भेजा गया।
1965 युद्ध: रामचंद्र की हुंकार से टैंक छोड़ भाग खड़ी हुई पाक सेना
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उनकी कंपनी में सिर्फ 50 सैनिक थे। उन्होंने देखा कि पाकिस्तान ने पक्के बंकर बना रखे हैं और उनकी तादाद भी काफी ज्यादा है। राम स्वरूप ने बताया कि उनके और पाकिस्तानी टैंकों के बीच एक खेत था, जिसमें बाजरा की फसल थी। फसल काफी लंबी थी। मेजर शर्मा ने अपनी कंपनी के साथ रणनीति बनाई कि खेतों में वे दोनों तरफ से घुसेंगे और राम चंद्र जय के नारे लगाएंगे, ताकि पाक सेना को लगे कि सैकड़ों भारतीय सैनिक मौजूद हैं।
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फिर खेत के दोनों तरफ से सैनिक आगे बढ़े और राम चंद्र की जय के जयकारे लगाने लगे। उनके घुसने से खेतों में हलचल भी दिखने लगी। आवाज से पाकिस्तान की सेना घबरा गई और ताबड़तोड़ एमएमजी से फायरिंग शुरू कर दी। लेकिन पाक सेना की फायरिंग से भारतीय सैनिक घबराए नहीं और आगे बढ़ते हुए मुंहतोड़ जवाब देना शुरू कर दिया। पाकिस्तान के कई टैंक उन्होंने ध्वस्त कर दिए। खुद मेजर कर्नल राम स्वरूप शर्मा ने पाकिस्तान के दो टैंक ध्वस्त किए थे।
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हारते देख पाकिस्तानी सेना अपने हथियार छोड़कर भाग खड़ी हुई और पाकिस्तान के मंसूबे धरे रह गए। डिफेंस एक्सपर्ट बताते हैं कि यह मोर्चा काफी महत्वपूर्ण था। यदि पाक को यहां से लीड मिलती तो वे आसानी से अंदर घुस सकते थे। युद्ध के दौरान भारत को काफी नुकसान पहुंचा। राम स्वरूप के कई साथियों को जान गंवानी पड़ी। उनके प्रिय दोस्त कर्नल पांडे भी युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए।
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कर्नल स्वरूप दिसंबर को 83 साल को हो जाएंगे। उन्होंने 1971 की युद्ध में भी हिस्सा लिया था। वे सांबा सेक्टर में तैनात थे। भारत सरकार ने उनकी वीरता को देखते हुए उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया।