100 साल पहले बैसाखी के दिन जलियांवाला बाग में हुए नरसंहार के बारे में सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। स्वतंत्रता सेनानी जोध सिंह ने इस नरसंहार को अपनी आंखों से देखा था।
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jallianwala bagh
जोध सिंह के बेटे त्रिचोलन सिंह ने बताया कि घटना से तीन दिन पहले 10 अप्रैल 1919 को हिंदुस्तानी क्रांतिकारियों ने कुछ अंग्रेज अधिकारियों को मौत के घाट उतार दिया था। उसके बाद ब्रिटिश सरकार ने अमृतसर की कमान जालंधर बिग्रेड के एक खूंखार कमांडर जनरल डायर को सौंप दी थी। जनरल डायर अमृतसर की गलियों और सड़कों पर मार्च करके अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए घोषणाएं करवा रहा था कि कोई भी शख्स बिना अनुमति शहर से बाहर नहीं जाएगा।
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इस बीच सरदार जोध सिंह व उनके मौसेरे भाई सोहन सिंह ने कुछ लोगों को यह बातचीत करते हुए सुना कि आज शाम 4 बजे अमृतसर के जलियांवाला बाग में आजादी के संघर्ष से जुड़ा एक जलसा होने जा रहा है। उस समय देशभक्तों की बुलंद आवाज में भाषण सुनने का मजा ही कुछ और होता था। यही सोच कर सरदार जोध सिंह व उनके मौसेरे भाई सोहन सिंह जलियांवाला बाग पहुंच गए। शाम के 4 बज चुके थे। लोगों का अच्छा खासा हुजूम वहां एकत्रित हो चुका था।
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जोध सिंह और सोहन सिंह एक जगह खड़े होकर देशभक्तों के भाषण सुनने लगे। ठीक उसी वक्त जनरल डायर अपनी फौज लेकर वहां आ पहुंचा। उसके साथ 50 बंदूकधारी जवान थे। उन्होंने पोजीशन लेकर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। अंग्रेज सिपाहियों के जलसे में विघ्न डालने का अंदेशा तो वहां मौजूद प्रत्येक व्यक्ति को था, लेकिन इस तरह के कत्लेआम की कल्पना किसी ने नहीं की थी।
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जलियांवाला बाग
बिना चेतावनी दिए जब निरीह जनता को घेरकर उस पर इस तरह गोलियां चलाई गईं तो जान बचाने के लिए लोग जिधर भी भाग सकते थे, भाग लिए। जोध सिंह का मौसेरा भाई सोहन सिंह भी गोली लगने से घायल हो गया था। जब वे उसकी मदद को आगे बढ़े तो एक गोली उनके कान के पास से सनसनाती हुई निकल गई। गोलियों से बचने के लिए वे खुद भी सोहन सिंह के साथ नीचे गिर गए। लेकिन दूसरे लोग उनके ऊपर गिरते चले गए।
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जलियांवाला बाग में शहीदी कुआं
- फोटो : PTI
उनमें से कुछ घायल थे और कुछ मरे हुए। चारों ओर चीख पुकार मची हुई थी। अनगिनत लाशें खून से लथपथ इधर-उधर बिखरी पड़ी थीं। तब तक सोहन सिंह की मौत हो चुकी थी। जोध सिंह लाशों के ढेर तले दबकर बच गए, लेकिन उन्होंने इस नरसंहार को आंखों से देखा था। हर तरफ चीख पुकार और खून ही खून। जान बचाने के लिए कुंए में छलांग लगाते लोगों को उन्होंने आंखों से देखा था, लेकिन वह कुछ कर नहीं पाए।
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जलियांवाला बाग हत्याकांड
- फोटो : PTI
लेकिन इस घटना ने जोध सिंह को एक गंभीर आंदोलनकारी में परिवर्तित कर दिया था। उसके बाद वे आजादी की लड़ाई में सक्रिय रूप कूद पड़े। आजादी के लिए लड़ते हुए सरदार जोध सिंह अपने जीवन के दो दशक से ज्यादा का समय तक जेल, गांव और घर में बंदी रहे। आखिर वक्त ने करवट ली और आजादी मिली। केंद्र व हरियाणा सरकार ने ताम्र पत्र व फैमिली पेंशन देकर स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उन्हें सम्मानित किया। 16 नवंबर 2003 को सरदार जोध सिंह का निधन हो गया था।
बंटवारे के बाद सरदार जोध सिंह पाकिस्तान में अपना सब कुछ छोड़कर शरणार्थी के रूप में भारत आ गए और जिला नैनीताल के हल्द्वानी में कुछ समय बिताया। उसके बाद अंबाला शहर के पटेल रोड पर कपड़े की दुकान खोल ली, जो आज भी बाबे दी हट्टी के नाम से उनके बेटे त्रिचोलन सिंह चला रहे हैं। वे अपने पिता स्व. सरदार जोध सिंह की याद में 60 वर्षों से इसे संचालित कर रहे हैं। अब उनका बेटा कंवरजीत सिंह शैली भी उनके पदचिह्नों पर चलते हुए इस काम में उनकी मदद कर रहा है।