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जानिए, पहाड़ों की दुनिया से जुड़े 10 चौंकाने वाले रहस्य

Mon, 04 May 2015 11:57 AM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, चंडीगढ़
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पहाड़ हजारों वर्षों में बनते हैं। वास्तव में, पहाड़ों का बनना एक लंबी भूवैज्ञानिक प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया हमेशा चलती रहती है। यह प्रक्रिया पृथ्वी के अंदर मौजूद क्रस्ट में तरह-तरह की हलचल होने के कारण चलती है। पहाड़ टेक्टॉनिक या ज्वालामुखी से बनते हैं। ये सारी चीजें मिलकर पहाड़ को 10,000 फीट तक ऊपर उठा देती हैं। उसके बाद नदियां, ग्लेशियर और मौसम इसे घटाकर कम कर देते हैं। साथ ही इंसान इन्हें काटकर रास्ते बना देता है, जो नहीं होना चाहिए।
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देश में कई ऐसे चमत्कारिक पहाड़ हैं, जिनके बारे में कई तरह की किंवदंतियां प्रचलित हैं, जैसे भारत के लेह-लद्दाख में एक चुम्बकीय पहाड़ है, जिसे मैग्नेटिक हिल भी कहा जाता है। यह पहाड़ धातु को अपनी ओर खींचता है। इस पहाड़ के ऊपर से गुजरने वाले विमानों को अपेक्षाकृत अधिक ऊंचाई पर उड़ना होता है अन्यथा पहाड़ उनको खींच सकता है। यहां पर अलग-अलग संरचनाओं और रंगों वाले पहाड़ भी हैं।
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वैदिक काल में ही चारधाम और ज्योतिर्लिंगों की स्थापना करके भव्य मंदिरों का निर्माण किया गया, लेकिन पहाड़ों पर बनाए गए मंदिरों का महत्व ही कुछ और है।
अनेक प्राचीन मंदिर ऐसे पर्वतों पर बनाए गए हैं, जहां से चुंबकीय तरंगें घनी होकर गुजरती हैं। इन मंदिरों में प्रतिमाएं ऐसी जगह रखी जाती थीं, जहां चुंबकत्व का प्रभाव ज्यादा होता था। तांबा बिजली और चुंबकीय तरंगों को अवशोषित करता है। इस प्रकार जो भी व्यक्ति ऐसे मंदिर में जाकर स्‍थापित मूर्ति की घड़ी के चलने की दिशा में परिक्रमा करता है, वह एनर्जी को अवशोषित करता है। इससे उसको मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य लाभ मिलता है। इसके अलावा पहाड़ पर बने मंदिर में जाकर मन्नत मांगी जाए तो वह जल्द पूरी होती है, क्योंकि वहां से लोग ब्रह्मांड के संपर्क में आते हैं और उस वक्त अवचेतन मन भी खुला होता है।

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देश में पहाड़ काट-काट कर रास्ते बनाए जा रहे हैं। पहले पहाड़ के उत्तर में गांव या शहर को बसाया जाता था, ताकि दक्षिण से आने वाले तूफान और तेज हवाओं से शहर की रक्षा हो सके। इसके अलावा सूर्य का ताप सुबह 10 बजे से लेकर अपराह्न 4 बजे तक अधिक होता है। इस दौरान सूर्य दक्षिणावर्त ही रहता है। पहाड़ से दक्षिण से आने वाली हानिकारक अल्ट्रावॉयलेट किरणों से सुरक्षा होती है। अल्ट्रावॉयलेट किरणों से सन बर्न और सन एनर्जी की शिकायत के साथ ही कई तरह के रोग होते हैं, इसीलिए मनुष्य के जीवन में पहाड़ महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शास्त्रों में लिखा है कि मनुष्य को वहां रहना चाहिए, जहां चारों ओर पहाड़ हों और एक नदी बह रही हो। पहाड़ों के कारण दौड़ती रहने वाली हवाएं जहां काबू में रहती हैं, वहीं वह पहाड़ों से घिरकर शुद्ध भी हो जाती है।
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पहाड़ों के देवता को वेदों में मरुतगण कहा गया है, जिनकी संख्या 49 है। पहाड़ों पर ये मरुतगण नजर रखते हैं। मौत के बाद ऐसे लोगों की दुर्गति होना तय है, जो जीते जी पहाड़ों का जीवन नर्क बना देते हैं। वैदिक ऋषियों ने पहाड़ों के लिए कई मंत्रों की रचनाएं की हैं। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक ऐसे कई पहाड़ हैं, जिनका धार्मिक, आध्यात्मिक और पर्यावरण से खास जुड़ाव है। भारत में विश्व के सबसे प्राचीन और सबसे नए पर्वत विद्यमान हैं। इन पहाड़ों की प्राचीनता और भव्यता देखते ही बनती है, लेकिन अब विकास के नाम पर इनका विनाश जारी है।
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अगर किसी शहर के आसपास पहाड़ हैं, तो सबसे बेहतर वातावरण रहेगा। समय पर बारिश, सर्दी, गर्मी होगी और मौसम भी सुहाना होगा। बेहतर वातावरण के कारण स्वास्थ्य भी बेहतर रहेगा। शोधानुसार पता चला है कि हिमालय की वादियों में रहने वालों को कभी दमा, टीबी, गठिया, संधिवात, कुष्ठ, चर्मरोग, आमवात, अस्थिरोग और नेत्र रोग जैसी बीमारी नहीं होती। हिमालय क्षेत्र के राज्य जम्मू-कश्मीर, सिक्किम, हिमाचल, उत्तराखंड, असम, अरुणाचल आदि क्षेत्रों के लोगों का स्वास्थ्य अन्य प्रांतों के लोगों की अपेक्षा बेहतर होता है। इसे ध्यान और योग के माध्यम से और बेहतर करके यहां की औसत आयु सीमा बढ़ाई जा सकती है। तिब्बत के लोग निरोगी रहकर कम से कम 100 वर्ष तो जीवित रहते ही हैं।
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देश में अधिकतर शक्तिपीठ पर्वतों पर बने हैं। पर्वतों पर ध्यान करने का महत्व अधिक है। प्राचीनकाल में शक्तिपीठों में ध्यान और साधना ही की जाती थी। हिमालय श्रेणियों में योगी ध्यान और योग के लिए ही जाते हैं। वहां वे अमरता और मोक्ष ज्ञान प्राप्त करते हैं। हिन्दू धर्म अनुसार व्यक्ति का अंतिम लक्ष्य मोक्ष ही है। धर्म, अर्थ, काम और अंत में मोक्ष। मोक्ष का अर्थ मृत्यु नहीं। मोक्ष का अर्थ मुक्ति, कैवल्य ज्ञान और संबोधी होता है। मोक्ष का अर्थ आत्मा हो जाना। शरीर और प्रकति के बंधनों से मुक्त होकर स्वयं प्रकाश हो जाना है। पर्वतों पर ध्यान करने से समाधि जल्द मिलती है। इसीलिए तो भगवान शंकर ने हिमालय पर डेरा जमाया था।

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पर्वतों के कारण ही भारत में पांच ऋतुएं प्रचलित हैं, जो किसी अन्य देश में शायद ही देखने को मिले। ये ऋतुएं हैं- बसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर। प्रत्येक ऋतु 2 माह की होती है, लेकिन आरावली और विध्यांचल की पर्वत श्रृंखलाओं को काट देने के कारण भारत में अब मौसम परिवर्तन होने लगा है। इस परिवर्तन के कारण भारत की कृषि पर भी असर पड़ा है। विकास के नाम पर काट दी गई कई शहरों की छोटी मोटी पहाड़ियों से भी जलवायु परिवर्तित होने लगा है। हिमालय, आरावली, सतपुड़ा, विंध्याचल, पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट, नीलगिरि पर्वत, अनामलाई पर्वत, काडिमोम पहाडि़यां, गारोखासी पहाडि़यां, नागा पहाड़ियां  भारत की प्रमुख पर्वत श्रेणियां हैं।

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पहाड़ हैं तो पानी है। पहाड़ नहीं होगा तो शहर रेगिस्तान लगेगा। रेगिस्तान में पानी की तलाश व्यर्थ है। पहाड़ पर हरियाली बादलों को बरसने का न्योता होती है। पहाड़ अपने करीब के तापमान को नियन्त्रित करते हैं और अपने भीतर वर्षा का संपूर्ण जल संरक्षित कर लेते हैं। इससे आसपास की भूमि का जल स्तर बढ़ जाता है। कुएं, कुंडियों, तालाबों और नलकूपों में भरपूर पानी रहता है। किसी पहाड़ी कटने के बाद इलाके के भूजल स्तर पर असर पड़ने, कुछ झीलों, तालाबों आदि का पानी पाताल में चले जाने की घटनाओं पर कोई ध्यान नहीं देता। झरने भी पहाड़ से ही गिरते हैं किसी मंजिल से नहीं। पहाड़ हवाएं शुद्ध करता है तो भूमि का जलस्तर भी बढ़ता है। पहाड़ के कारण आसपास चारागाह निर्मित होता है तो वन्य जीवों को भी प्रचूर मात्रा में भोजन मिलता है। पहाड़ है तो जंगल है, जंगल है तो जीवन है।
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पहाड़ कई चमत्कृत करने वाली जड़ी बूटियों और औषधियों का खजाना है। संजीवनी बूटी किसी पहाड़ पर ही पाई जाती है तो भूलनजड़ी भी पहाड़ पर ही पाई जाती है। ऐसी कई जड़ी बूटियां और औषधियां हैं जो पहाड़ों पर ही उगती है। आयुर्वेद की सबसे महान खोज च्यवनप्राश को माना जाता है, पर शायद ही कोई यह जानता होगा कि च्यवनप्राश जैसी आयुर्वेदिक दवा धोसी पहाड़ी की देन है। धोसी पहाड़ी हरियाणा और राजस्थान की सीमा पर स्थित है। उत्तराखंड, सिक्किम, हिमाचल, जम्मू, कश्मीर, लद्दाख, अरुणाचल, नगालैंड आदि मनोरम पहाड़ी क्षेत्रों में विश्‍व की कई दुर्लभ जड़ी बूटियों के साथ ही दुर्लभ वन्य जीव भी पाए जाते हैं।
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