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खुशियां सीमित हैं
2018 में दक्षिण कोरिया में न्यूनतम मजदूरी 16.4 फीसदी बढ़ी। 2019 में इसमें 10.9 फीसदी इजाफा होना तय है। न्यूनतम मजदूरी बढ़ने से नौकरियों पर संकट खड़ा हो गया है। कुछ बस कंपनियों ने सेवाएं बंद करने की धमकी दी है, जबकि कुछ अन्य कंपनियां मजदूरों से कम घंटे काम करा हैं, ताकि लागत घटाई जा सके।
साप्ताहिक काम के घंटे कम करना भी मुश्किल है। दक्षिण कोरियाई लोग तय समय पर काम खत्म करने लिए जाने जाते हैं। काम के घंटे घटाने से उन पर कम समय में उतना ही काम करने का दबाव बढ़ेगा। यानी खुश होना आसान नहीं है। योन्शी यूनिवर्सिटी के हैप्पीनेस एंड कल्चरल साइकॉलजी लैब के डायरेक्टर यून्कुक एम. सुह कहते हैं कि अलग-अलग सभ्यताओं में खुशी के मायने अलग हैं।
अमरीका और ब्रिटेन जैसी व्यक्तिवादी सभ्यताओं में हर व्यक्ति खुशी के अपने पैमाने बनाता है, लेकिन कोरिया जैसी समष्टिवादी सभ्यताओं में खुशी समाज से जुड़ी होती है। "यहां मैं अपनी जिंदगी के बारे में क्या सोचता हूं, यह मायने नहीं रखता। मेरे बारे में दूसरों के खयाल क्या हैं, यह मायने रखता है।"
सुह कहते हैं, "आपको यह दिखाना पड़ता है कि आपकी जिंदगी खुश होने के काबिल है। इसके लिए कुछ सबूत की जरूरत होती है। जैसे किसी अच्छी यूनिवर्सिटी की डिग्री, कोई महंगी कार या फिर बड़ा घर। "दक्षिण कोरिया में यूनिवर्सिटी में दाखिला आसान नहीं है। सरकारी नौकरियां भी सीमित हैं। ऐसे में बहुत कम लोगों को ही वह खुशी मिल पाती है, जिसे आदर्श समझा जाता है।