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विनाश की तरफ बढ़ रहा है ये रहस्यमयी गांव, पिघल रही है जमीन फट रही हैं दीवारें, कारण हैरान करने वाले

Fri, 16 Nov 2018 03:46 PM IST
अन्ना फिलिपोवा, बीबीसी हिंदी
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Kanaka Greenland - फोटो : BBC
ग्रीनलैंड का कानाक कस्बा दुनिया के सबसे उत्तरी छोर पर आबाद जगहों में से एक है। जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जंग में ये कस्बा शहीद होने को है। कानाक की आबादी करीब 650 है। यहां के ज्यादातर बाशिंदे बर्फ से भी सर्द माहौल में जीते हैं।

यहां दो साल या इससे भी ज्यादा वक्त तक तापमान जीरो डिग्री सेल्सियस से नीचे बना रहता है। आर्कटिक में पड़ने वाला ये इलाका लगातार जमा रहता है। इसकी बुनियाद पर ही यहां इमारतें और दूसरे निर्माण कार्य किए गए हैं। लेकिन, अब धरती का तापमान बढ़ रहा है। तो कानाक की जमीन पिघलने लगी है। अब ये मकानों का बोझ मुश्किल से उठा पा रही है।

आगे चल कर शायद ऐसा भी न हो पाए। यानी यहां नए मकान बनाना मुमकिन नहीं रह जाएगा। आर्कटिक इलाके में आबाद दूसरे कस्बों का भी यही हाल है। लेकिन दूसरे कस्बे तो बर्फ के बजाय चट्टानों पर टिके हुए हैं। 1950 के दशक में बसाया गया कानाक कस्बा, मिट्टी, बालू और दलदली जमीन पर बसा है।

 
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पिघलने लगी है 'सफेद जमीं'

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Kanaka Greenland - फोटो : BBC
चूंकि यहां 'पर्माफ्रॉस्ट' यानी सब कुछ जम जाने वाले हालात रहते हैं, तो यहां पर बर्फीली जमीन के ऊपर ही मकान बनाए गए। डेनमार्क की कोपेनहेगेन यूनिवर्सिटी के सेबेस्टियन जैस्ट्रज्नी कहते हैं कि, 'चट्टान के मुकाबले मिट्टी और दलदली इलाकों में पानी होता है। ये बड़ी चुनौती होती है। जब पर्माफ्रॉस्ट के हालात होते हैं, तो जमीन जम जाती है। फिर ये पिघल भी जाती है। यानी ये ऊपर-नीचे होती रहती है। इसकी वजह से मकान धंस जाते हैं, लुढ़क जाते हैं या फिर गिर भी जाते हैं।'

जलवायु परिवर्तन की वजह से यहां की जमीन पर जमी बर्फ पिघल रही है। इसकी वजह से स्थानीय निवासी ओर्ला क्लीस्ट के मकान को नुकसान पहुंचा है। उनके मकान के लिविंग रूम और गुसलख़ाने की दीवारों में दरारें पड़ गई हैं। बाथरूम का फर्श इतना ऊबड़-खाबड़ हो गया है कि मकान की टाइलें टूट रही हैं। ओर्ला के रसोईघर की दीवारें तो इतनी फट गई हैं कि उनसे हवा घर के भीतर आती है।

बहुत से लोगों ने अपने मकानों की दीवारों पर टेप चिपका दिए हैं ताकि सर्द हवा घर में न घुसे। बर्फ पिघलने और जमने का जो चक्र लंबे फासले पर चलता था वो बड़ी तेजी से घूमने लगा है। 2018 में ग्रीनलैंड में कई दिन ऐसे रहे, जब तापमान 23 डिग्री सेल्सियस तक दर्ज किया गया। ये 1958-2002 के बीच के औसत तापमान से ज्यादा है। पूरे उत्तरी आर्कटिक इलाके में तापमान में ये उछाल देखा जा रहा है। दुनिया का औसत तापमान करीब एक डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। मगर उत्तरी ध्रुव पर औसत तापमान 3 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है।

 
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Kanaka Greenland - फोटो : BBC
तेजी से गायब हो रही है बर्फ

कानाक में जरूरी सामान की आपूर्ति साल में केवल दो बार होती है। कानाक दुनिया के उन बचे-खुचे ठिकानों में से है, जहां समुद्र में जमी बर्फ के ऊपर शिकार कर के लोग जिंदगी बसर करते हैं। अब ये बर्फ तेजी से पिघल रही है।

1979 से इस इलाके में जमी बर्फ का डेटा सैटेलाइट के जरिए रखा जा रहा है। उसके बाद से बर्फ पिघलने के जो 12 साल सब से ख़राब रहे हैं, वो सभी 2007 के बाद के हैं।

सितंबर 2018 में इस इलाके में 1981-2010 के औसत से 26।6 प्रतिशत कम बर्फ थी। 2014 में ये गिरावट 24।8 प्रतिशत थी। 2016 में औसत से 29।4 फीसद कम बर्फ देखी गई तो 2015 में बर्फ का क्षेत्रफल 28 प्रतिशत कम था। यहां जमी बर्फ की मोटाई भी कम हो रही है। 1980 से 2008 के बीच आर्टकिट सागर की बर्फ की मोटाई 3।64 मीटर से घटकर 1।89 मीटर रह गई है।

 

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Kanaka Greenland - फोटो : BBC
खानपान पर असर डालता जलवायु परिवर्तन

स्थानीय शिकारी योर्गेन उमाक कहते हैं कि, 'हर साल समुद्री बर्फ की तादाद अलग-अलग रहती है क्योंकि गर्म मौसम की वजह से बर्फ की मोटाई कम रहती है। इसकी वजह से शिकारियों को अपने पुराने रास्ते बदलने पड़ते हैं। बर्फ मोटी न रह जाने से पुराने रास्तों से गुजरना ख़तरनाक हो जाता है। हर साल यहां शिकार का सीजन भी सिमटता जा रहा है।'

समुद्र के ऊपर जमी बर्फ में बहुत से लोगों ने जान गंवाई है। फिर भी, ख़तरों के बावजूद कई शिकारी, सीजन में समुद्री बर्फ के ऊपर डेरा जमाते हैं। शिकार के अलावा कानाक के लोगों को पीने के पानी के लिए भी जोखिम उठाना पड़ता है।

 
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Kanaka Greenland - फोटो : BBC
उन्हें पीने का पानी पास की एक नदी से मिलता है। सर्दियों में इतनी ठंड होती है कि नदी जम जाती है। इसके बाद लोग बर्फ की सिल्लियों को ले आते हैं। जहां पर इन्हें पिघलाकर जरूरत का पानी तैयार किया जाता है।यानी पीने के पानी को लाने जैसा साधारण काम भी कानाक में जोखिम भरा हो जाता है। कानाक के रहने वाले इनुकिटसोरसौक और जेनोविरा सदोराना कहते हैं कि यहां ये कोई नई बात नहीं और इससे ज्यादा बात बिगड़ भी क्या सकती है।

ये स्थानीय जोड़ा शिकार पर जिंदगी बसर करता है। मगर जलवायु परिवर्तन को लेकर जो अनुमान हैं, वो इस यकीन को तोड़ने वाली चेतावनी देते हैं। धरती गर्म हो रही है। बर्फ पिघल रही है। इससे कानाक के लोगों के मकान और रोजी के जरियों पर ही खतरा नहीं मंडरा रहा है, बल्कि उनकी सभ्यता, संस्कृति और रिवाजों के साथ-साथ उनकी हस्ती तक मिट जाने का डर करीब आता जा रहा है।
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