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चांदनी रात में ही क्यों तोड़ी जाती है दुनिया की सबसे महंगी चाय, जितना गहरा राज उतनी ज्यादा कीमत

Wed, 24 Oct 2018 01:05 PM IST
बीबीसी, कल्पना प्रोधन
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silver tips imperial tea - फोटो : KALPANA PRODHAN
हिमालय में स्थित कंचनजंगा दुनिया की तीसरी सबसे ऊंची चोटी है। इसकी ढलानों पर समुद्र तल से करीब 2200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हैं कुछ खास पहाडियां। दार्जिलिंग की ये पहाडियां देखें तो इनका प्राकृतिक सौंदर्य कुछ पलों के लिए आपकी सांसें रोक देगा। इन पहाडियों में जंगली हाथी और बाघ मस्ती में घूमते हैं। पहाडियों की ढलानों पर बौद्ध मठ हैं।

पर दार्जिलिंग जिस बात के लिए सब से ज्यादा मशहूर है, वो हैं यहां के हरे-भरे चाय के बागान। दार्जिलिंग की चाय की वजह से इसे दुनिया 'शैम्पेन ऑफ टी' के नाम से बुलाती है।दार्जिलिंग में चाय के 87 बागान हैं। हर एक बागान में अपने तरह की अनूठी, शानदार खुशबू वाली चाय तैयार की जाती है। दुनिया भर में दार्जिलिंग टी मशहूर है।

अगर आप दार्जिलिंग से 33 किलोमीटर दक्षिण की तरफ जाएं, तो आपको वहां दुनिया की सबसे पुरानी चाय की फैक्ट्रियों में से एक मिलेगी। यहां पर आप को दुर्लभ किस्म की चाय की पत्ती और कली मिलेगी।
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silver tips imperial tea - फोटो : KALPANA PRODHAN
चाय भी खास, तोडने वाले भी खास
 
इसे सिल्वर टिप्स इम्पीरियल के नाम से जाना जाता है। इस चाय की कलियों को कुछ खास लोग ही तोडते हैं जिनका ताल्लुक मकाईबाडी चाय बागान से है। सिल्वर टिप्स इम्पीरियल चाय को पूर्णमासी की रात में ही तोडा जाता है। रहस्य की परतों में लिपटी ये चाय किसी और दुनिया की चीज मालूम होती है। जितना गहरा इसका राज है, उतनी ही ज्यादा इसकी कीमत है।

2014 में सिल्वर टिप्स इम्पीरियल एक लाख 36 हजार रुपए किलो से भी ज्यादा दाम पर बिकी थी। भारत में पैदा हुई ये किसी भी चाय की अब तक की सबसे ज्यादा कीमत का रिकॉर्ड है।दुनिया की सबसे महंगी इस चाय यानी सिल्वर टिप्स इम्पीरियल की कलियों को साल के कुछ खास दिनों में ही, कुल चार या पांच बार तोडा जाता है।
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silver tips imperial tea
पूर्णमासी की रात को हाथ में मशाल लिए हुए मकाईबाडी के बागान मजदूर इसकी कलियां चुनते हैं। स्थानीय लोग कहते हैं इस चाय में धरती का हर जादू, ब्रह्मांड का हर राज और मिट्टी की सारी ताकत समाई हुई है। चटख चांदनी रातों में बागान मजदूरों की हंसती-गाती टोलियां इस चाय की कलियां चुनती हैं। मानो वो चाय नहीं, ब्रह्मांड के रहस्य को जुटा रही हों।

सिल्वर टिप्स इम्पीरियल की बेहद खास चाय पत्ती को भोर होने से पहले ही पैक कर दिया जाता है। माना जाता है की सूरज की किरणें पडने से इसकी आभा, इसकी खुशबू पर असर पडता है। मकाईबाडी चाय बागान के संजय दास कहते हैं कि हर साल सिल्वर टिप्स इंपीरियल चाय केवल 50 से 100 किलो के बीच ही पैदा होती है। इसे ज्यादा जापान, ब्रिटेन और अमरीका के खरीदार ले लेते हैं। संजय दास कहते हैं कि ब्रिटेन का शाही परिवार इस चाय का बहुत शौकीन है।

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silver tips imperial tea - फोटो : KALPANA PRODHAN
दार्जिलिंग के 87 चाय बागानों में हर साल करीब 85 लाख किलो चाय तैयार होती है। ये कई किस्मों में बांटी जाती है। सिल्वर टिप्स इम्पीरियल चाय को तोडने की प्रक्रिया देखने के लिए सैलानी दूर देशों से दार्जिलिंग आते हैं। संजय दास, इस चाय को पूर्णमासी को तोडने की वजह बताते हैं। वो कहते हैं कि समुद्र में इस वक्त ज्वार आता है। जो बहुत ताकतवर होता है।

पूरे ब्रह्मांड की शक्ति धरती पर असर डालती है। ऐसे मौके पर जो चीज भी तैयार की जाती है, वो बहुत ताकतवर होती है। सिल्वर टिप्स इम्पीरियल की खुशबू तो जानदार है ही, इसकी और भी कई खूबियां हैं। ये एंटी-एजिंग है। डिटॉक्स करती है और पीने वाले को आराम का एहसास कराती है। मकाईबाडी चाय बागान दार्जिलिंग का सबसे पुराना टी एस्टेट है। इसकी स्थापना 1859 में हुई थी।
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silver tips imperial tea - फोटो : KALPANA PRODHAN
ये दुनिया का पहला बायोडायनैमिक टी फार्म है। जहां बाकी के चाय बागान मिट्टी और पौधों की मदद से बेहतरीन चाय पैदा करते हैं, वहीं मकाईबाडी इसके लिए जन्नत की तरफ निहारता है। मकाईबाडी में धरती और ब्रह्मांड के दूसरे ग्रहों की चाल के हिसाब से चाय तैयार की जाती है।

ये काम मार्च से अक्टूबर के बीच होता है। मार्च में पडने वाली पूर्णमासी से इसकी शुरुआत होती है। माना जाता है कि जब ज्वार आता है तो पौधों में पानी की मात्रा कम हो जाती है मकाईबाडी के लोग मानते हैं कि हवा में उस वक्त ज्यादा ऑक्सीजन होती है। इस दौरान आबो-हवा में ऊर्जा ज्यादा होती है। इसकी वजह से नरम और चिकनी चाय की पत्तियां तैयार होती हैं।

जब सूरज डूबने लगता है तो चाय बागान के मजदूर एक खास आयोजन की तैयारी करते हैं। ये आयोजन धार्मिक भी है और मनोरंजन का साधन भी। पूरे सीजन में सिल्वर टिप्स इम्पीरियल चाय की पत्तियां केवल चार या पांच बार तोडी जा सकती हैं।

हर फसल के पहले मकाईबाडी के सैकडों कार्यकर्ता सज-धज कर बागान के ढलानों पर जमा होते हैं। नाचते-गाते हैं। अच्छी किस्मत और हिफाजत के लिए वैदिक मंत्र पढे जाते हैं। इस आयोजन को देखने के लिए जमा हुए लोग हाथों में मशाल लिए होते हैं।

मशाल का मकसद सिर्फ बुरी आत्माओं को ही नहीं, आस-पास रहने वाले जंगली जानवरों को भी भगाना होता है। रात आठ बजे के बाद जब पूर्णमासी का चांद सबसे चमकीला होता है, तब कुशल मजदूर बडी तेजी से चाय की केवल दो पत्तियां और कली तोडते हैं।
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सूरज की रोशनी का प्रभाव

माना जाता है कि अगर इस चाय की पत्तियों पर सूरज की रोशनी पडती है, तो उसका स्वाद ही नहीं, रंग-रूप भी बदल जाता है। इसीलिए मजदूरों की कोशिश होती है कि आधी रात से पहले ज्यादा से ज्यादा पत्तियां और चाय की कलियां जमा कर ली जाएं।

इसके बाद इस चाय की प्रॉसेसिंग की जाती है। ये काम भी सुबह होने से पहले पूरा करना होता है। 50 किलो सिल्वर टिप्स इम्पीरियल चाय तैयार करने के लिए 200 किलो ताजा पत्तियों की जरूरत होती है। मजदूर इससे ज्यादा पत्तियां नहीं तोडते।

खरीदार आम तौर पर मार्च से मई के बीच तोडी गई पत्तियों की सबसे ज्यादा कीमत देते हैं। कहते हैं कि इस दौरान तोडी गई चाय में ज्यादा चमक और खुशबू होती है। इतनी कम तादाद में होने की वजह से ही शायद सिल्वर टिप्स इम्पीरियल की कीमत इतनी ज्यादा होती है। मगर इसके जादुई स्वाद का ब्रह्मांड से कनेक्शन खोजना जरा मुश्किल है।

मकाईबाडी के मैनेजर संजय दास कहते हैं कि 'पत्तियों को पूरी तरह से किण्वित नहीं किया जाता। आधी तैयार पत्तियों में आम की खुशबू और और फ्रंगीपाणी फूल का रस मिलाकर ये चाय तैयार होती है। हल्के सुनहरे रंग की चाय जब कोई पीता है, तो उसे एकदम से नई ताजगी का एहसास होता है।'
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महारानी एलिजाबेथ को गिफ्ट

हाल ही में पीएम मोदी ने ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ को इस चाय का एक पैकेट गिफ्ट किया था। सिल्वर टिप्स इम्पीरियल चाय को 2014 के फुटबॉल वर्ल्ड कप के दौरान भी बेचा गया था। इस चाय को तैयार होते ही ब्रिटेन, अमरीका और जापान के खरीदार ले जाते हैं।

वैसे तो दार्जिलिंग के कई चाय बागानों में सिल्वर टिप्स इम्पीरियल चाय तैयार होती है। मगर मकाईबाड़ी में ही इसे पूर्णिमा की रात को तोडा जाता है। मकाईबाड़ी का चाय बागान भारत के उन गिने-चुने टी एस्टेट में से एक है, जो कभी भी अंग्रेजों के कब्जे में नहीं रहा।

इसे 159 साल पहले जीसी बनर्जी ने स्थापित किया था। आज इस बागान को उनके पडपोते राजा बनर्जी चलाते हैं। स्वस्थ मिट्टी से इंसान सेहतमंद रहता है। राजा बनर्जी कहते हैं कि 'हमारे पास ऐसे विकास के तमाम औजार मौजूद हैं, जो धरती की आबो-हवा को नुकसान नहीं पहुंचाते।'

जब उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में अंग्रेजों ने दार्जिलिंग को पहाडी रिजॉर्ट के तौर पर बसाया और चाय के बागान लगवाए, तो उन्होंने इसे पहाडों की रानी का नाम दिया था। मगर, दुनिया की बेहतरीन और महंगी चाय पैदा करने वाले इस इलाके के लोगों की हालत बहुत खराब है। खास तौर से मकाईबाड़ी बागान के इर्द-गिर्द तो गुरबत का बसेरा है।

मकाईबाड़ी बागान के ढलान बडे तीखे हैं। मॉनसून के सीजन में बहुत मिट्टी कट कर बह जाती है। आज इस बागान के केवल 33 फीसद हिस्से पर ही चाय की खेती होती है। बाकी में पेड लगा दिए गए हैं।

159 साल तक एक ही परिवार के पास रहने के बाद मकाईबाड़ी का बागान और इसकी चाय एक नए सफर पर चलने की तैयारी कर रहे हैं। इसी साल राजा बनर्जी ने एलान किया था कि वो 47 साल के कार्यकाल के बाद कंपनी के चेयरमैन का पद छोड देंगे। वो इसके शेयर मकाईबाड़ी में काम करने वाले 600 लोगों में बांट देंगे।

मकाईबाड़ी को सिल्वर टिप्स इम्पीरियल का राज खोलने में कई दशक लग गए थे। अब इस खुशबू को दुनिया तक पहुचाने वाले ही इसके मालिक होंगे।
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