'नमक आब नदी' उत्तर-पूर्वी अफगानिस्तान के तखार सूबे के नमक के खान वाले इलाके से होकर गुजरती है। इस खान की वजह से नमक अत्यधिक मात्रा में नदी के जल में घुल जाता है। जो इसकी चपेट में आने वाली जमीन और खेतों को नमकीन और ऊसर बना देता है। 'नमक आब' नाम की ये नदी उत्तरी अफगानिस्तान के बगलान सूबे के खोस्त जिले से निकलती है और कुछ सौ किलोमीटर तक बहने के बाद तखार में हजारों हेक्टेयर खेती की जमीन को सींचती है।
नमक के खान वाले इलाके से हो कर बहने के कारण अत्यधिक मात्रा में इसकी पानी में घुले नमक की मार यहां के किसानों पर पड़ रही है। यह बहुत से किसानों की खेती और खड़ी फसल को नमकीन बनाकर सुखा देती है। अफगान किसान हाजी मोहम्मद का खेत इस नदी के बहाव के इलाके में है। हाजी मोहम्मद फ़सलों को बड़े अफसोस भरी निगाह से देखते हैं और इस कोशिश में जुटे हैं कि कैसे उन्हें सूखने से बचाया जाए। वो कहते हैं कि इन तमाम परेशानियों की वजह ये है कि नदी का पानी खारा है।
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मेहनत मिट्टी में मिल गई...
हाजी मोहम्मद अपने खेत की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, "मैं ये उम्मीद लगाए बैठा हूं कि इस खेती से मेरा घर खर्च चल सके, लेकिन हाल ये है कि सभी पेड़ सूख चुके हैं और मैं टैंकर से पानी लाकर इन्हें नहीं बचा सकता क्योंकि ये मेरे बस की बात नहीं है।" 'शोर आब' और आस पास के दूसरे गांव जैसे 'दह बाश' के किसानों और बागवानी करने वाले लोग भी इस मुसीबत को झेल रहे हैं।
मोहम्मद आरिफ नामक एक किसान अपने धान के सूखे खेत में चहलकदमी करते हुए कहते हैं कि थोड़ी सी चूक के कारण लगभग चार जरीब (जमीन नापने की जंजीर, जो करीब साठ गज लंबी होती है) धान के खेत तबाह हो गए। उन्होंने कहा, "मैं घर से बाहर था, मेरे लड़कों ने धान के खेत में पानी पटाया, इन्होंने यह ध्यान नहीं दिया ये पानी खारा है। अब एक साल की तमाम मेहनत मिट्टी में मिल गयी। ये पानी न तो पीने लायक है और न ही सिंचाई के लायका। मैं खुद ही यह खारा पानी पीकर गले की दर्द से परेशान हूं।"
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पेयजल व्यवस्था में लगता आधा दिन
इस नदी के खारा पानी के कारण केवल यहां की खेती ही तबाह नहीं हुई है बल्कि यहां के निवासियों को पीने की पानी की व्यवस्था के लिए बहुत लंबी दूरी तय करनी पड़ता है। गांव के बच्चे और जवान रोज सुबह गधों और खच्चरों की मदद से खींच कर चलने वाली गाड़ी (स्लेज) पर सवार होकर लम्बी दूरी तय करके 'फरखार' नदी तक जाते हैं और ड्रमों में भर-भर कर पानी लाते हैं। यहां पेयजल जुटाना एक गंभीर समस्या है। यहां के एक युवा जाकिरुल्लाह अपने परिवार के लिए पीने के पानी की व्यवस्था में चार पांच घंटा खर्च करना पड़ता है। उन्होंने कहा, "मैं सुबह सात बजे पानी लाने निकल पड़ता हूं। वहां 10 बजे के करीब पहुंचता हूं और वहां से 12 बजे घर वापस आता हूं। इसकी वजह से मेरा स्कूल जाना भी बंद हो गया।" जो लोग साफ पानी की व्यवस्था नहीं कर पाते उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
नदी कैसे खारा हो जाती है?
नूर बीबी एक घरेलू महिला हैं और साफ पानी के स्रोत तक नहीं जा सकती हैं इसलिए वो केवल गांव के तालाब का पानी ही इस्तेमाल करती हैं। वो कहती हैं, "मैं यही खारा पानी पीती हूं, जिस के कारण ब्लडप्रेशर और दिल की बीमारी से गुजर रही हूं। अभी इलाज चल रहा है और मैं दवाइयां ले रही हूं। इस पानी से कपड़े भी साफ नहीं होते, चार पांच बार धोने के बाद भी नमकीन पानी का सफेद धब्बा कपड़े पर लगा रहता है।"
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तखार सूबे के 'इदबचाह' 'शोराब' और 'मुसा ख्वाजा' नहरों में भी इसी नदी का खारा पानी बहता है। ये तीनों नहर यहां के 176 गांवों के 48 हजार जरीब खेती की जमीन को सिंचता है। जिन दो पहाड़ों के बीच से ये नदी बहती है उनपर नमक के कई खान हैं। ये नमक नदी के ताजा पानी में घुल जाते हैं और पानी को खारा बना देते हैं।
यहां के बाशिंदों ने कई बार कोशिशें की कि नदी के बहाव के रास्ते को मोड़ कर नमक के खान के दूसरी तरफ कर दें लेकिन इसके लंबे वक्त में कोई खास लाभ नहीं हुआ। नदी का उसके बहाव को मोड़ने के लिए उपयोग किए गए कंकर-पत्थरों को बहा कर ले गई और फिर उसी 'ताकचा' के नमक खदानों से हो कर बहने लगी। सरकार ने भी इस नदी के पानी को खारा होने से बचाने के लिए बहुत प्रयास किए हैं। बीते साल नदी के बहाव के लिए एक कृत्रिम रास्ता बनाया गया था मगर इसके लिए जो दीवार बनाई गई थी वो ध्वस्त हो गई। स्थानीय लोगों ने बताया कि सरकार ने एशिया विकास बैंक के सहयोग से लाखों डॉलर खर्च कर जो दीवार बनाई गई थी वो छह महीने भी नहीं टिक सकी।
मिट्टी लोहे और कंक्रीट को गला देती है...
तालकान जिले के नदी विभाग के अध्यक्ष मोहम्मद सालिम अकबर ने बताया कि बीते वर्ष बांध का एक हिस्सा पानी की बहाव से टूट फूट गया था मगर ये फैसला लिया गया कि केवल मिट्टी की दीवार से ही नदी की धारा को मोड़ा जा सकता है और नमक को इसकी पानी में घुलने से बचाया जा सकता है।
अकबर ने ये भी कहा, "ऊपरी इलाके में इसी नदी का पानी साफ और नमक रहित है। मगर जैसे ही यह खदानों से होकर गुजरती है, इसका पानी खारा हो जाता है क्योंकि पहाड़ पर हर तरफ नमक की चट्टानें हैं।" उन्होंने यह भी कहा, "नदी के इस भाग में किसी प्रकार के लोहे या कंक्रीट से बांध बनाने का कोई लाभ नहीं है। नमकीन मिट्टी लोहे और कंक्रीट को गला देती है, इसलिए बालू और मिट्टी का बांध ही काम आएगा। इसके अलावा कोई उपाय नहीं है।"
पीने का पानी जमीन के अंदर से निकालने की व्यवस्था की जा सकती है लेकिन यहां 140 मीटर की गहराई तक भी पानी खारा हो गया है। स्थानीय किसानों और लोगों का कहना है कि अगर सरकार ने जल्द ही कोई उपाय नहीं किया तो 180 से अधिक गांव के लोगों की जिंदगी खतरे में पड़ जाएगी। सवाल यह उठता है कि क्या यहां के लोग पर्यावरण की एक बड़ी समस्या का सामना करने वाले हैं?