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आखिर बद्रीनाथ मंदिर में क्यों नहीं बजाया जाता शंख? बड़ी रहस्यमय है कहानी

Tue, 19 May 2020 01:31 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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बद्रीनाथ मंदिर (गोले में शंख की प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media/pixabay
बद्रीनाथ मंदिर का नाम तो आपने सुना ही होगा, जिसे हिंदू धर्म के पवित्र चार धामों में से एक माना जाता है। इस मंदिर में भगवान विष्णु विराजमान हैं। वैसे आमतौर पर किसी भी मंदिर में पूजा के समय शंख बजाना अनिवार्य होता है, लेकिन यह एक ऐसा मंदिर है, जहां शंख बजाया ही नहीं जाता। दरअसल, इसके पीछे एक पौराणिक और बेहद ही रहस्यमय कहानी छुपी हुई है, जिसके बारे में शायद आप भी हैरान हो जाएंगे। तो चलिए जानते हैं आखिर ऐसा क्या है कि इस मंदिर में कभी शंख नहीं बजाया जाता...
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बद्रीनाथ मंदिर - फोटो : Social media
उत्तराखंड के चमोली जनपद में अलकनंदा नदी के तट पर स्थित यह एक प्राचीन मंदिर है, जिसका निर्माण सातवीं-नौवीं सदी में होने के प्रमाण मिलते हैं। इसे भारत के सबसे व्यस्त तीर्थस्थानों में से एक माना जाता है, क्योंकि यहां हर साल लाखों लोग भगवान बद्रीनारायण के दर्शन के लिए आते हैं। 
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आदि शंकराचार्य (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media
इस मंदिर में भगवान बद्रीनारायण की एक मीटर (3.3 फीट) लंबी शालिग्राम से निर्मित मूर्ति है जिसके बारे में मान्यता है कि इसे भगवान शिव के आवतार माने जाने वाले आदि शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में पास ही स्थित नारद कुंड से निकालकर स्थापित किया था। कहा जाता है कि यह मूर्ति अपने आप धरती पर प्रकट हुई थी। 

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शंख (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
इस मंदिर में शंख नहीं बजाने के पीछे ऐसी मान्यता है कि एक समय में हिमालय क्षेत्र में दानवों का बड़ा आतंक था। वो इतना उत्पात मचाते थे कि ऋषि मुनि न तो मंदिर में ही भगवान की पूजा अर्चना तक कर पाते थे और न ही अपने आश्रमों में। यहां तक कि वो उन्हें ही अपना निवाला बना लेते थे। राक्षसों के इस उत्पात को देखकर  ऋषि अगस्त्य ने मां भगवती को मदद के लिए पुकारा, जिसके बाद माता कुष्मांडा देवी के रूप में प्रकट हुईं और अपने त्रिशूल और कटार से सारे राक्षसों का विनाश कर दिया। 
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बद्रीनाथ मंदिर - फोटो : Social media
हालांकि आतापी और वातापी नाम के दो राक्षस मां कुष्मांडा के प्रकोप से बचने के लिए भाग गए। इसमें से आतापी मंदाकिनी नदी में छुप गया जबकि वातापी बद्रीनाथ धाम में जाकर शंख के अंदर घुसकर छुप गया। इसके बाद से ही बद्रीनाथ धाम में शंख बजाना वर्जित हो गया और यह परंपरा आज भी चलती आ रही है। 
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