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अगर मां बनने का फैसला महिला का हुआ तो क्या बदल जाएगी दुनिया?

Sat, 11 Jul 2020 03:00 PM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
दुनिया जब से बनी है यहां हर क्षेत्र में मर्दों का ही दबदबा रहा। औरत को हर लिहाज से कमतर और मर्दों के मातहत ही माना गया। मेडिकल साइंस के क्षेत्र में भी जितनी रिसर्च हुई मर्दों को ही केंद्र में रखकर और उन्हीं के नजरिए से हुई हैं। कहना गलत नहीं होगा कि हमने दुनिया को मर्दों के चश्मे से ही देखा और जाना है। बच्चे की पैदाइश के मामले में भी बहुत समय तक यही माना जाता रहा कि मर्द की वजह से ही महिला बच्चा पैदा करने के लायक हो पाती है। औरत का इसमें कोई रोल नहीं। लेकिन नई रिसर्च ने इन सभी दावों को गलत साबित कर दिया है। इनके मुताबिक बहुत सी प्रजातियों में मादाएं बच्चा पैदा करने के लिए बहुत से तरीके अपनाती हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : पेक्सेल्स
मिसाल के लिए महिला की बच्चेदानी अपनी पसंद के शुक्राणु को ही अंडे तक आने देता है। वो स्पर्म की गति को कम या ज्यादा भी करता है। इसी तरह मादा ड्रोसोफिला मक्खियां शुक्राणु को विशेष अंगों में जमा कर सकती हैं। फिर बाद में पसंदीदा नर के साथ इन शुक्राणु का उपयोग कर सकती हैं। आज महिलाओं के पास भी बच्चे पैदा करने या नहीं करने का निर्णय लेने की आजादी है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
बाजार में बहुत तरह के गर्भनिरोधक मौजूद हैं। इसके अलावा गर्भपात का विकल्प भी खुला है। लेकिन समाज का ताना-बाना ऐसा है कि महिलाएं इन विकल्पों का इस्तेमाल मर्जी से नहीं कर सकतीं। कई बार मर्द भी महिलाओं को इसकी इजाजत नहीं देते। कभी समाज आड़े आ जाता है तो कभी धर्म और संस्कृति। बहुत से देशों में आज भी गर्भपात कराना असंवैधानिक है। अमेरीका और आयरलैंड जैसे विकसित देशों में भी गर्भपात कराने में कई तरह के कानूनी पेंच हैं।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
प्रजनन के नियंत्रण के तरीकों तक पहुंच बनाने का मतलब ये नहीं है कि वो सभी तरीके अचूक होंगे। बहुत बार गर्भनिरोधक भी विफल हो जाते हैं। सेक्स वर्कर्स पर सुरक्षा के लिए दबाव डाला जाता है। महिलाओं को कब और किन परिस्थितियों में सेक्स करना है, इसमें अक्सर महिलाओं की मर्जी पूरी तरह दरकिनार होती है। अक्सर सेक्स वर्करों का बलात्कार होता है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
महिलाओं को मर्जी के मर्द और मर्जी से गर्भधारण का अख्तियार मिल जाए तो इससे समाज और महिलाओं, दोनों का भला होगा। समाज में उनका रोल भी बड़ा हो जाएगा। इस बात की भी पूरी संभावना है कि ऐसी महिलाएं उन लोगों के निशाने पर आ जाएंगी जो इस तरह के नियंत्रण के पक्ष में नहीं हैं। आज हम खुद को सभ्य और विकसित समाज कहते हैं। लेकिन, सच तो ये है कि हम आज भी ऐसी दुनिया में रहते हैं, जहां महिलाओं का अपने ही शरीर पर अधिकार और नियंत्रण नहीं है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
अनचाही प्रेगनेन्सी
2012 के सबसे ताजा आंकड़ों के मुताबिक दुनिया में हर साल करीब 8.5 करोड़ महिलाएं अपनी मर्जी के खिलाफ गर्भधारण करती हैं। अमेरिका जैसे देशों में तो ये अनुपात और भी ज्यादा है। गैर इरादतन प्रेग्नेंसी से बचने के लिए दुनिया में करीब 50 करोड़ महिलाएं गर्भ निरोधक गोलियां खाती हैं और कई परेशानियां मोल ले लेती हैं। इसमें तनाव, माइग्रेन, चिंता, खून के थक्के जमना जैसी परेशानियां आम बात है। बहुत-सी महिलाएं अनचाही प्रेगनेंसी से बचने के लिए नसबंदी का सहारा लेती हैं। लेकिन ये सबसे ज्यादा खतरनाक है। इसमें महिला की मौत तक हो सकती है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
कुछ जानकारों का कहना है कि नियंत्रण अपने हाथ में आ जाने के बाद महिलाओं के सेक्स पार्टनर बढ़ जाएंगे और असुरक्षित सेक्स करने से उन्हें तरह-तरह की यौन संक्रमण हो सकते हैं। लेकिन रिसर्च बताती हैं कि ऐसा नहीं है। गर्भनिरोधक तक महिलाओं की पहुंच बन जाने से न सिर्फ अनचाहे गर्भधारण में कमी आई है बल्कि गर्भपात की दर में भी कमी आई है। एक अमरीकी स्टडी से पता चलता है कि गर्भनिरोधक का सबसे ज्यादा फायदा किशोरियों को हुआ है। उनके गर्भपात में भी भारी गिरावट आई है। WHO के मुताबिक हर साल 2.5 करोड़ महिलाओं का असुरक्षित गर्भपात होता है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
अक्सर गर्भपात करने वाले अनाड़ी होते हैं। साफ सफाई का खयाल नहीं रखा जाता जिसकी वजह से कई तरह के संक्रमण हो जाते हैं। और बहुतों की मौत हो जाती है। अमेरिका में ऐसी महिलाओं के इलाज के लिए 5.5 करोड़ डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। जानकारों का कहना है कि पश्चिमी देशों में गर्भपात कराना बहुत सुरक्षित है। लिहाजा यहां किसी की सेहत को कोई खतरा नहीं होता। जबकि लैटिन अमेरिका या सहारा क्षेत्र के अफ्रीकी देशों में गर्भपात का मतलब जान को जोखिम में डालना है।
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