देश में एक ऐसा दुर्लभ केस सामने आया है, देखकर डॉक्टर्स भी हैरान हैं। एक ऐसा बच्चा मिला है, जिसके शरीर को जो देखता है, बस देखता ही रह जाता।
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आस्टियोपोरोसिस की बीमारी
पीजीआई चंडीगढ़ में आस्टियोपोरोसिस का एक दुर्लभ केस सामने आया है। चंडीगढ़ का रहने वाला एक 15 वर्षीय किशोर आस्टियोपोरोसिस से पीड़ित है। उसका इलाज पीजीआई में चल रहा है। डाक्टरों का दावा है कि 45 साल से कम उम्र के लोगों में आस्टियोपोरोसिस की बीमारी बहुत दुर्लभ होती है। इस उम्र के पूरे देश में तीन से चार केस होंगे। हालांकि इसके कारणों का तो पता नहीं चल पाया है। मगर इलाज से बच्चे में काफी सुधार है।
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आस्टियोपोरोसिस की बीमारी
इस केस को पीजीआई की डा. अभिलाषा गर्ग आस्टियोपोरोसिस की कांफ्रेंस में प्रस्तुत किया। वहीं केस के बारे में डा. अभिलाषा ने बताया कि साल 2012 में जब बलजिंदर 12 साल का था तो उसके बाजू में फ्रैक्चर हो गया। अगले ही साल हाथ में। उसके बाद उसके बैक में दर्द शुरू हो गया। परिजन उसे आरथोपीडिक्स डिपार्टमेंट में लेकर आए। कई जांच के बाद उसे पीजीआई के इंडोक्राइनोलाजी डिपार्टमेंट में रेफर कर दिया गया।
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हड्डियों की अनदेखी
डिपार्टमेंट में भी कई जांच हुई तो पता चला कि उसे आस्टियोपोरोसिस है। साल 2015 तक कैल्शियम, विटामिन डी और बिस्फास्पोमेट की दवा चली। हालांकि इसके साइड इफेक्ट भी थे। बाद में उन्हें ग्रोथ हार्मोन की थैरेपी दी गई। इससे काफी बदलाव है। अभी इलाज में लंबा वक्त लगेगा। डाक्टरों के मुताबिक, आस्टियोपोरोसिस से पीड़ित होने के बाद बलजिंदर दूसरों बच्चों के साथ खेल नहीं पाता था। स्कूल बैग उठाने में असमर्थ रहता था।
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हड्डियों को करता है कमजोर
बलजिंदर स्कूल में होने वाली प्रार्थना के वक्त वह ज्यादा देर तक खड़ा नहीं हो पाता था। भीड़भाड़ वाली जगहों में जाने में उसे मुश्किल होती थी। जब वह सिर धोता था तो इससे भी उसके सिर पर दर्द होता था। उसे एक बार नहीं, बल्कि कई बार फ्रैक्चर हुआ। इंडोक्राइनोलाजी डिपार्टमेंट के एचओडी डा. अनिल भंसाली ने बताया कि बच्चों में आस्टियोपोरोसिस के कारणों का अभी तक पता नहीं चल पाया है। इन बच्चों की फैमिली हिस्ट्री भी नहीं मिली है।
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doctor and Patient
डा. अनिल भंसाली कहते हैं कि अगर सही वक्त पर इलाज मिल जाए तो काफी हद तक बीमारी ठीक हो जाती है। लेकिन पूरी जिंदगी विटामिन और कैल्शियम की डोज लेनी पड़ती है। इससे उसकी क्वालिटी आफ लाइफ काफी हद तक ठीक हो जाती है। अगर किसी शख्स की हड्डियां कमजोर हो जाएं तो उसे आस्टियोपोरोसिस कहा जाता है। इसमें हड्डियों का बोन मास कम हो जाता है और वे भुरभुरी हो जाती हैं। इस बीमारी में दर्द के अलावा हड्डियों के फ्रैक्चर का खतरा बढ़ता है।
आस्टियोपोरोसिस को साइलेंट डिजीज भी कहा जाता है। यह धीरे धीरे होता है, धीरे धीरे बढ़ता जाता है और फिर इसका इलाज मुश्किल हो जाता है। ऐसे में इसे आगे बढ़ने से रोकना जरूरी है। पहले इसे बुढ़ापे की बीमारी माना जाता था लेकिन अब बदलते लाइफस्टाइल में फिजिकल एक्टिविटी कम होने की वजह से कम उम्र में भी लोगों को यह समस्या झेलनी पड़ रही है। कुछ बच्चों में ये देखा गया है। फिलहाल इसके कारणों का पता नहीं चल सका।