कई बार कुछ छोटी और बेजान चीजें भी एक क्रांति के रूप में आगे आती हैं। ऐसी ही कहानी है चेक गणराज्य का। चेक गणराज्य में कठपुतलियों का बड़ा महत्व है। यह कठपुतलियां, न सिर्फ चेक गणराज्य की पहचान हैं, बल्कि कई सदियों का इतिहास अंदर समेटे हुए हैं। अहम बात तो यह है कि इन कठपुतलियों की वजह से ही यहां के लोग आज अपनी पारंपरिक जबान बोल पा रहे हैं। इन्होंने चेक गणराज्य की संस्कृति और भाषा को संजोने में अहम किरदार निभाया है।
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17वीं सदी में बोहेमिया राज्य पर ऑस्ट्रिया के हैब्सबर्ग राजवंश का राज था। उसी दौर में चेक जबान पूरी तरह गायब हो गई थी। जिन लोगों को अपनी जबान से खास लगाव था, उन्होंने इसे बचाने के लिए एक जुगत लगाई। उन्होंने अपना विरोध जताने के लिए कठपुतली का इस्तेमाल किया।
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दरअसल, फर्डिनेंड द्वितीय के जमाने में सिर्फ कठपुतलियों को ही चेक भाषा बोलने की इजाजत थी। उस समय वहां के नक्काश, चर्च के लिए कुर्सियों पर नक्काशी करने का काम करते थे, लेकिन वह इंसानी चेहरे उकेरने में माहिर नहीं थे, इसलिए उन्होंने अजीब तरह के चेहरे बनाने शुरू कर दिए और इनके माध्यम से वह अपनी भाषा को व्यक्त करने लगे।
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कुछ लोगों की इस कोशिश से खत्म होती जबान को बचा पाना थोड़ा मुश्किल जरूर था, लेकिन इन लोगों की ये कोशिश कठपुतलियों की डोरियों में ऐसी बंधी कि एक महत्वपूर्ण विरासत बनकर कई नस्लों तक चलती रही। यही वजह है कि इन कठपुतलियों की चेक लोगों के दिलों में खास जगह है। चेक गणराज्य की राजधानी प्राग के बाजारों में लगभग हरेक दुकान में कठपुतलियां लटकी नजर आ जाएंगी।
वहां पर ज्यादातर कठपुतलियां आज भी लकड़ी की बनाई जाती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि एक समय था, जब ये लोगों के जज्बातों का इजहार करती थीं और आज ये महज सजावटी सामान के लिए रह गई हैं। आज भी गली-कूचों में पपेट शो होते हैं। प्राग के नेशनल मैरिओनेट थियेटर में बड़े-बड़े लाइव पपेट शो का आयोजन किया जाता है। इन कठपुतलियों और कलाकारों की वजह से ही चेक गणराज्य की नौजवान पीढ़ी आज भी अपनी जबान बोल पा रही है, जो शायद कभी विलुप्त होने की कगार पर थी।