मेक्सिको की रेनाटा रोहास को समंदर बचपन से ही बहुत दिलकश लगता था। बचपन में वो अपने पिता के साथ मेक्सिको में कोजुमेल तट के पास तैराकी किया करती थीं। उस वक्त वो केवल पांच बरस की थीं। तब उन्हें समुद्र तट से ज्यादा दूर जाने की इजाजत नहीं थी। अब वक्त बदल गया है। अब रेनाटा दूर तलक जाकर समंदर में गोते लगा लेती हैं। समंदर की तलहटी उन्हें अपनी ओर खींचती मालूम होती है। वहां का मंजर रेनाटा को सपनों सरीखा लगता है। एक नई दुनिया नजर आती है। जो सुकून देने वाली है। दुनिया के शोर-शराबे से दूर ऐसी जगह, जहां वक्त ठहरा हुआ है।
ऐसी ही एक जगह है, उत्तर अटलांटिक महासागर में। जहां पर सौ साल से भी ज्यादा पहले विशाल जहाज टाइटैनिक डूबा था। रेनाटा बचपन से ही समंदर में गोता लगाकर टाइटैनिक के मलबे को देखने का ख्वाब पाले हुए हैं। अगले साल उनका सपना पूरा होने वाला है।
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जल्द ही टाइटैनिक नहीं रहेगा...
ये ऐसा सपना है जिसे जल्द पूरा न किया गया, तो ये हकीकत नहीं बन पाएगा। असल में समुद्र के पानी के साथ जंग लड़ते हुए टाइटैनिक का मलबा बडी तेजी से गल रहा है। जानकार कहते हैं कि यही रफ्तार रही तो अगले बीस सालों में टाइटैनिक का मलबा गल कर पूरी तरह से समंदर के पानी में विलीन हो जाएगा। रेनाटा उन गिने-चुने किस्मत वाले लोगों में से हैं, जो 2005 के बाद टाइटैनिक का मलबा देखने वाले पहले इंसान होंगे। रेनाटा के साथ कुछ और लोग भी अटलांटिक की गहराई में उतरकर टाइटैनिक का मलबा देखेंगे। ये लोग शायद वो आखिरी इंसान हों, जो ये मंजर देख पाएं।
टाइटैनिक देखने के लिए करना होगा खर्च
ये एक कॉमर्शियल मिशन होगा। रेनाटा और दूसरे लोगों को टाइटैनिक को देखने के लिए मोटी रकम खर्च करनी होगी। मगर इस दौरान वैज्ञानिक तजुर्बों को भी अंजाम दिया जाएगा। जो लोग समुद्र के भीतर टाइटैनिक का मलबा देखने जाएंगे, वो थ्री-डी मॉडल की मदद से टाइटैनिक की तस्वीर और पूरा मंजर तैयार करेंगे। ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए इसका संरक्षण किया जा सके।
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जब बर्फ के पहाड़ से टकराया टाइटैनिक
आरएमएस टाइटैनिक 14 अप्रैल 1912 को उत्तर अटलांटिक महासागर में एक हिमखंड से टकरा गया था। ये जहाज ब्रिटेन के साउथैम्पटन बंदरगाह से न्यूयॉर्क जा रहा था। हिमखंड से टकराने के बाद टाइटैनिक दो टुकड़ों में टूट गया था। इसका मलबा 3.8 किलोमीटर की गहराई में समा गया था। जहां ये हादसा हुआ, वो कनाडा के न्यूफाउंडलैंड तट से करीब 600 किलोमीटर दूर है। इस हादसे में 1500 लोग मारे गए थे। भयंकर सर्द समंदर में अंधेरे से घिरा टाइटैनिक का मलबा करीब 70 साल तक अनछुआ ही पड़ा रहा था। इस दौरान बैक्टीरिया इसके मेटल के बने ढांचे को कुतरते रहे। नतीजा ये हुआ कि इसके मलबे के ऊपर बर्फ की छोटी-छोटी नरम सी बूंदों जैसी आकृतियां बन गईं।
इकोलॉजिस्ट लोरी जॉन्सटन कहते हैं कि, 'आज की तारीख में टाइटैनिक के मलबे में उस वक्त से ज्यादा जिंदगी आबाद है, जब वो डूबा था।' असल में बर्फ और जंग के ये छोटे-छोटे बुलबुले बैक्टीरिया की उपज हैं। ये बैक्टीरिया लोहा खाते हैं। इसके एवज में इनसे एसिड निकलता है, जो जंग में तब्दील हो जाता है। जीवों की इस किस्म को समंदर की गहराई में ही देखा जा सकता है। पहली बार टाइटैनिक के मलबे को 1985 में अन्वेषक रॉबर्ट बलार्ड और उनकी टीम ने खोजा था।
उस वक्त तक जंग के ये बुलबुले पूरी तरह से टाइटैनिक के मलबे पर कब्जा जमा चुके थे। जंग पैदा करने वाले ये बैक्टीरिया, रोजाना करीब 180 किलो मलबा चट कर जाते हैं। इसीलिए वैज्ञानिक कह रहे हैं कि टाइटैनिक के मलबे की उम्र अब ज्यादा नहीं बची है। लोरी जॉन्सटन कहते हैं कि अगले 20 से 50 साल में बैक्टीरिया, टाइटैनिक के मलबे को पूरी तरह से खा जाएंगे।
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कैसे नजर आएगा टाइटैनिक का मलबा
यानी घड़ी की सुई टिक-टिक कर रही है। टाइटैनिक को वैज्ञानिक तजुर्बे के लिए देखना हो या फिर यूं ही शानदार मंजर देखने का शौक पूरा करना हो, वक्त बहुत कम बचा है। इस मौके का फायदा उठाने के लिए ओशनगेट नाम की कंपनी ने कदम बढ़ाया है। कंपनी ने एलान किया है कि वो छोटी-छोटी पनडुब्बियों में बैठाकर लोगों को समंदर की तलहटी में ले जाएगी। इस मिशन का मकसद वैज्ञानिक भी होगा और मौज मस्ती भी। लोग ओशनगेट की छोटी पनडुब्बी में सवार होकर टाइटैनिक के मलबे का दीदार कर सकेंगे।
ओशनगेट कंपनी 2009 में बनी थी। अब तक ये समुद्र के भीतर के 13 मिशन को अंजाम दे चुकी है। अब 2019 में ओशनगेट ने कुछ लोगों को टाइटैनिक के मलबे के करीब ले जाने का बीड़ा उठाया है। इसके लिए दुनिया भर से आवेदन मंगाए गए हैं। चुने गए लोगों को 11 दिन के इस खतरनाक मगर बेहद रोमांचक मिशन पर ले जाया जाएगा। एक बार में 9 लोग ओशनगेट की पनडुब्बी में सवार होकर समुद्र के भीतर जा सकेंगे।
इन लोगों को न्यूफाउंडलैंड के सेंट जॉन्स तट से हेलीकॉप्टर से समंदर में एक जहाज पर ले जाया जाएगा। फिर पनडुब्बी में बैठाकर समुद्र की गहराई में उतारा जाएगा। पनडुब्बी में बैठे हुए ही ये लोग सोनार और लेजर की मदद से टाइटैनिक के मलबे का सही थ्री-डी मॉडल बना सकेंगे। 11 दिन के मिशन का टिकट है 1 लाख पांच हजार 129 डॉलर यानी करीब 78 लाख रुपए। ये रकम उतनी ही है, जितने का टिकट टाइटैनिक पर सवार लोगों ने न्यूयॉर्क पहुंचने के लिए खरीदा था।
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टाइटैनिक तक पहुंचना बेहद मुश्किल
समुद्र की गहराई में तापमान एक डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। इतनी गहराई में किसी आम इंसान का जाना और वापस आना अचरज से कम नहीं होगा। लेकिन, ओशनगेट के अध्यक्ष जोएल पेरी कहते हैं कि यात्रियों की सुरक्षा तो कोई मसला ही नहीं है। खतरा उतना है नहीं, जितना लोग दावा करते हैं। फिर, जिन लोगों को चुना जाएगा उन्हें सख्त पैमानों पर कसने के बाद ही समंदर में गोता लगाने का टिकट मिलेगा।
अर्जी लगाने वालों का दिमागी तौर पर दुरुस्त होना उतना ही जरूरी है, जितना सेहतमंद होना। इन लोगों को हेलीकॉप्टर के क्रैश होने पर बचाव की ट्रेनिंग भी दी जाएगी। जिनको तैराकी का तजुर्बा होगा उन्हें तरजीह दी जाएगी। जैसे रेनाटा रोहास। उन्हें जोएल पेरी माइटी माउस यानी ताकतवर चुहिया कह कर बुलाते हैं। रेनाटा इस मिशन के लिए चुनी गई पहली शख्स हैं।
इसकी बड़ी वजह उनका गोताखोरी का लंबा अनुभव है। रेनाटा बताती हैं कि, 'जब मैंने अपने पिता के बगैर पहली बार गोता लगाया था, तो एक हादसा पेश आया। मैं गहराई में एक छेद में घुस गई। मेरे ऑक्सीजन सिलेंडर का एक वॉल्व खुल गया।' रेनाटा जब 60 मीटर की गहराई में थीं, तब ये दुर्घटना हुई थी। वो अपने निर्देशक के पास गईं और उनसे ऑक्सीजन लेकर अपने टैंक में डाली। ऐसे मामलों में अक्सर लोग बेहोश हो जाते हैं। मगर, रेनाटा ने बड़ी सूझ-बूझ से खुद को सुरक्षित निकाल लिया।
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टाइटैनिक देखने का जुनून
रेनाटा रोहास के चुने जाने की दूसरी वजह टाइटैनिक के प्रति उनका जुनून है। जिस भी चीज का नाम टाइटैनिक होता है, उन्हें उससे लगाव हो जाता है। पहली बार उन्होंने 1953 की एक ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म देखी थी, जो टाइटैनिक हादसे पर आधारित थी। तब से ही टाइटैनिक के प्रति रेनाटा के दिल में जुनून पैदा हो गया। उन्होंने टाइटैनिक से जुड़ी सैकड़ों किताबें पढ़ डाली हैं। उस दौर के अखबारों की सुर्खियां जमा की हैं। रेनाटा ने टाइटैनिक पर बनी हर फिल्म देख डाली है।
जब 1985 में टाइटैनिक का मलबा खोजा गया था, तब से ही रेनाटा ने टाइटैनिक की एक झलक देखने के लिए पैसे बचाने शुरू कर दिए थे। रेनाटा ने टाइटैनिक का मलबा खोजने वाले रॉबर्ट बलार्ड से भी मुलाकात की थी। लेकिन बलार्ड ने कहा कि अब कोई भी मिशन टाइटैनिक के मलबे के पास जाने वाला नहीं है। इसके बाद रेनाटा ने समुद्र से जुड़ा करियर छोड़कर वापस बैंकिंग की राह पकड़ ली। दो साल बाद रेनाटा रोहास को पता चला कि अरबपति विलियम एफ बकले अपनी निजी पनडुब्बी में टाइटैनिक के मलबे तक गोता लगाकर आए हैं।
यानी रॉबर्ट बलार्ड की बात गलत साबित हुई थी। रेनाटा को लगा कि सही संस्था से जुड़कर टाइटैनिक को देखने का अपना ख्वाब वो पूरा कर सकती हैं। टाइटैनिक का मलबा खोजे जाने के करीब तीस साल बाद यानी 2012 में रेनाटा को इस मिशन पर जाने का टिकट मिला। उन्होंने डीप ओशन एक्सपेडिशन्स के टिकट पर जाने को लेकर जबरदस्त उत्साह था। मगर, बाद में कंपनी ने वो मिशल कैंसिल कर दिया। रेनाटा का सपना फिर टूट गया था। वो बताती हैं कि इसके सदमे से उबरने में उन्हें एक साल लगे थे।
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टाइटैनिक के मलबे पर किसका अधिकार
जब रॉबर्ट बलार्ड ने टाइटैनिक का मलबा खोजा, तो वो उस पर एकाधिकार का दावा करने लगे। लंबी मुकदमेबाजी के बाद तय हुआ कि मलबे से कोई भी छेड़खानी नहीं करेगा। मगर फ्रांस ने इस समझौते की अनदेखी कर दी। तब से ही ब्रिटेन, कनाडा, फ्रांस और अमरीका की सरकारें इसके मलबे को लेकर कानूनी जंग में मुब्तिला हैं। इन देशों की सरकारें नहीं चाहतीं कि ओशनगेट जैसी कंपनियां टाइटैनिक का मलबा दिखाने को कारोबार बनाएं। ओशनगेट के वकील डेविड कॉनकैनन कहते हैं कि, 'पूरा झगड़ा कब्जे का है। किसके हाथ में समुद्र की गहराई में पड़ा वो मलबा होगा। कौन इसके आस-पास शूटिंग की इजाजत देगा। कौन उस जहाज में लदे सामान पर हक जता सकता है। इन सवालों के जवाब पिछले तीस साल से तलाशे जा रहे हैं।'
डेविड कहते हैं कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय नियम बेतुके हैं। जो ये कहते हैं कि टाइटैनिक का मलबा समंदर के भीतर मौजूद एक विरासत है। इससे छेड़खानी नहीं होनी चाहिए। अच्छी बात ये है कि इन नियमों को सख्ती से लागू नहीं किया जाता। ओशनगेट को इसी बात में उम्मीद दिखती है। डेविड कहते हैं कि सख्ती होगी भी तो कोई उसे मानेगा नहीं।
टाइटैनिक की उम्र का आकलन
इसकी बड़ी वजह ये है कि टाइटैनिक का मलबा खुले समंदर की गहराई में है। किसी भी देश की समुद्री सीमा उसके तट से 19 किलोमीटर दूर तक मानी जाती है। आर्थिक अधिकार 160 किलोमीटर दूर तक होते हैं। टाइटैनिक का मलबा कनाडा के तट से 600 किलोमीटर दूर है। ओशनगेट के जोएल पेरी कहते हैं कि 2019 का उनका मिशन टाइटैनिक के मलबे की थ्री-डी मैपिंग करेगा। ऐसा पिछले दस सालों में नहीं हुआ है और उच्च तकनीक से लैस सोनार और लेजर किरणें भी टाइटैनिक के ऊपरी हिस्से का ही नक्शा बना सकेंगी। इसके अंदर का नक्शा बनाने में तो कई बरस और लगेंगे।
मिशन के दौरान ओशनगेट की पनडुब्बी कई बार टाइटैनिक के मलबे के आस-पास से गुजरेगी। इससे ये भी पता चलेगा कि बैक्टीरिया किस रफ्तार से टाइटैनिक का मलबा हजम कर रहे हैं। मिशन से ये भी अंदाजा लग सकेगा कि टाइटैनिक के मलबे के गुम होने में कितने साल और बचे हैं। जोएल पेरी कहते हैं कि ओशनगेट के मिशन से जो भी डेटा इकट्ठा होगा, उसे सब को मुफ्त में मुहैया कराया जाएगा। ओशनगेट का इरादा इस मिशन पर आधारित वीडियो गेम बनाने का भी है। रेनाटा कहती हैं कि वो मिशन के हर पहलू से जुड़ना चाहती हैं। मगर ये संभव नहीं। हालांकि उन्हें उम्मीद है कि इस बार उन्हें किस्मत दगा नहीं देगी। उन्हें लगता है कि इस मिशन पर जाकर वो टिकट की कीमत की पाई-पाई वसूल लेंगी।
गहराई में छलांग
सब कुछ ठीक रहा तो अगले साल जून में रेनाटा रोहास ओशनगेट के जहाज से पनडु्बबी में सवार होकर समुद्र में करीब 4 किलोमीटर की गहराई में उतरेंगी। सोनार की मदद से जब वो मलबे के पास पहुंचेंगी, तो लाइट जल जाएगी। रेनाटा अपने ख्वाब से मुखातिब होंगी। रेनाटा इस बात को सोच-सोचकर ही दीवानी हुई जा रही हैं। वो कहती हैं कि टाइटैनिक हादसा भयानक था, इसलिए वो वहां पहुंचकर जोश में नाचने से बचेंगी।
लोरी जॉन्सटन कहते हैं कि वो एक कब्रगाह है। टाइटैनिक हादसे में मारे गए लोगों के वारिस मानते हैं कि उस जगह पर जाना उनके पुरखों का अपमान है लेकिन लोरी कहते हैं कि इस मिशन से ऐसे आंकड़े इकट्ठे होंगे, जो आने वाली पीढ़ियों के काम आएंगे। खास तौर से उन लोगों के, जिनके पैदा होने तक जहाज का मलबा भी पूरी तरह से मिट चुका होगा। रेनाटा भी मिशन के अपने तजुर्बे को बच्चों से साझा करने का इरादा रखती हैं। वो कहती हैं कि बच्चों को इससे ये सबक मिलेगा कि कोई भी ख्वाब ऐसा नहीं है, जो पहुंच से परे हो। 'मैंने भी टाइटैनिक को देखने का सपना बचपन में ही देखा था। मैं बच्चों को बताऊंगी कि कैसे चाहत होने पर हर ख्वाब पूरा किया जा सकता है।'
गहराई में छलांग