'निगेटिव बातें सुनने का वक्त कहां'
अपने पिता के उलट ज्योति ऐसे उपनामों को लेकर ज्यादा चिंतित नजर नहीं आती हैं। वह सकारात्मक रुख के साथ कहती हैं, "बचपन में जब मेरे स्कूल में साँप निकल आता था तो मुझे लगता था कि मैं पकड लूँ, लेकिन मुझे कोई पकडने नहीं देता था क्योंकि सभी लोग मेरे पापा से डरते थे। लोगों ने मुझे विषकन्या के रूप में प्रचारित कर दिया। मेरे व्यक्तित्व के और भी कई पहलू थे, लेकिन उन्होंने सिर्फ साँप पकडने की खूबी देखी। आज भी घर पर कभी-कभी फोन आते हैं और लोग बोलते हैं - "हलो, सपेरे बोल रहे हो?।।।"
ज्योति कहती हैं, ''ऐसे फोन आने पर भाई को बुरा लगता है क्योंकि लोग उनके काम की गलत व्याख्या कर रहे हैं। लेकिन मैं ऐसी टिप्पणियों पर हँसने लगती हूं, आप इस सब को गंभीरता से कैसे ले सकते हैं। इसलिए हँसी में उडा देती हूँ।"