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सांपों के साथ इस लड़की का है खास कनेक्शन, दुनिया इन्हें कहती है विषकन्या

Wed, 22 Aug 2018 10:55 AM IST
अनंत प्रकाश, बीबीसी हिंदी
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- फोटो : Jyoti Kashyap Facebook
"मुझे बचपन से विषकन्या कहा गया, थोडा अजीब भी लगता था, लेकिन फिर हँसी में उडा देती थी। अक्सर कुछ दोस्त झगडा होने के बाद परिवार के बारे में उल्टी-सीधी बातें करते थे। मैं तब भी हँसी में उडा देती थी और आज भी उडा देती हूं।"

ये कहना है रामनगर में रहने वाली ज्योति कश्यप का, जिनका परिवार साँपों को बचाने की मुहिम में बरसों से लगा हुआ है। अपने पिता और भाई की तरह ज्योति को भी साँपों से डर नहीं लगता है।
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- फोटो : Jyoti Kashyap Facebook
विषकन्या का दंश

ज्योति के पिता चंद्रसेन कश्यप अपनी बेटी को विषकन्या कहे जाने के बारे में बताते हैं, "कुछ बरस पहले जब हमारे पास साँप पकडने के बाद उन्हें रखने के लिए कोई जगह नहीं थी तो साँप घर में डिब्बों में रखे रहते थे। ऐसे में एक दिन एक लंबा अजगर (पायथन) घर में रखा हुआ था और मेरी बिटिया उसे गले में लेकर घूमने लगी। "जब लोगों ने देखा तो वे हैरान रह गए और देखा-देखी किसी ने तस्वीर ले ली। फिर अखबार में छप गया कि मेरी बेटी विषकन्या है। इसके बाद मनोहर कहानियाँ नाम की पत्रिका में भी मेरी बेटी की कहानी छपी।"

इस घटना के बाद ज्योति के घर पर लगे लैंडलाइन फोन पर कई लोगों के फोन आना शुरू हो गए। ये लोग विषकन्या से बात करना चाहते थे और उसके बारे में जानना चाहते थे। चंद्रसेन कश्यप कहते हैं, "ये सब इतना परेशान करने वाला था कि पूछिए मत। मैंने लोगों के हाथ जोडे और मिन्नतें की। मैंने लोगों को समझाने की कोशिश की कि मेरी बेटी कोई विषकन्या या नागकन्या नहीं है।"
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Jyoti Kashyap Facebook - फोटो : Jyoti Kashyap Facebook
विषकन्या वाली खबर का असर
 
अखबारों और पत्रिकाओं में विषकन्या से जुडी खबरों के छपने के बाद लोगों ने सामान्य तौर पर ज्योति को इस उपनाम से बुलाना शुरू कर दिया। जो उपनाम अब तक कश्यप परिवार की गली तक सीमित था वो इन खबरों के बाद दूर-दूर तक फैल चुका था।

बचपन से ही जानवरों से प्यार करने वाली ज्योति की जिंदगी इस खबर ने इस कदर बदली कि उनके पिता चंद्रसेन कश्यप ने उन्हें सांपों से दूर रहने की हिदायत दे दी। ज्योति बताती हैं, "मुझे पापा ने कभी किसी के घर में कोई साँप पकडने नहीं दिया, मुझे इस सब से दूर कर दिया गया। लोगों ने मेरे गले में साँप देखा और नागकन्या कहना शुरू कर दिया। मुझे लोग जानने लगे, लेकिन मेरे व्यक्तित्व में और भी खूबियां थीं जिनकी वजह से मैं पॉपुलर हो सकती थी। लेकिन विषकन्या उपनाम ने कभी मेरा पीछा नहीं छोडा। मैं अब एक स्कूल में पढाती हूँ और बच्चों को ट्यूशन देती हूं। मैं एक टीचर बनना चाहती हूँ, लेकिन इस सबसे पहले मैं एक ऐनिमल लवर (पशुप्रेमी) हूँ।"

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- फोटो : Jyoti Kashyap Facebook
समाज की नजर और पिता का दर्द
 
आर्थिक रूप से बेहद कमजोर और अपनी मुहिम के चलते सामाजिक तिरस्कार झेल चुके चँद्रसेन कश्यप के लिए बेटी को विषकन्या कहा जाना बेहद दुख पहुंचाने वाला था। चँद्रसेन कहते हैं, "मुझे लोग जहरीला कहते आए हैं, वे मेरे साथ चाय पीने और खाना खाने से बचते हैं क्योंकि लोगों का मानना है कि मेरे खून में जहर मिला हुआ है और इसी वजह से मैं साँप के काटने की वजह से मरता नहीं हूँ। जब मैंने ये अपने बारे में सुना तब तो ठीक था, लेकिन जब बेटी के बारे में सुना तो मेरे होश उड गए। हम सामान्य लोग हैं। लोग विषकन्या या नागकन्या कहेंगे तो बिटिया के लिए घरद्वार कैसे देखेंगे? ये सब सोचकर मैंने न चाहते हुए भी बिटिया को इस सबसे दूर कर दिया।"

उत्तराखंड में रहने वाले चँद्रसेन कश्यप का परिवेश वैसा नगरीय नहीं है जहां लोग तथ्यों की जाँच करें और फिर राय बनाएं। उनका कहना है कि लोग सुनी-सुनाई बात को सच मान लेते हैं और उसी आधार पर अपनी राय बना लेते हैं। हालांकि, ऐसी स्थिति में उत्तराखंड वन विभाग चँद्रसेन के परिवार के साथ खडा दिखाई देता है।

पश्चिमी वन प्रभाग के वन संरक्षक डॉक्टर पराग मधुकर बताते हैं, "चँद्रसेन कश्यप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। इसमें सभी लोगों का फायदा है। विशेषत: वन और वनों के आसपास रहने वाले लोग इससे काफी लाभान्वित होते हैं। ऐसे में लोगों को ऐसी अफवाहों से बचना चाहिए।"
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- फोटो : Jyoti Kashyap Facebook
'निगेटिव बातें सुनने का वक्त कहां'

अपने पिता के उलट ज्योति ऐसे उपनामों को लेकर ज्यादा चिंतित नजर नहीं आती हैं। वह सकारात्मक रुख के साथ कहती हैं, "बचपन में जब मेरे स्कूल में साँप निकल आता था तो मुझे लगता था कि मैं पकड लूँ, लेकिन मुझे कोई पकडने नहीं देता था क्योंकि सभी लोग मेरे पापा से डरते थे। लोगों ने मुझे विषकन्या के रूप में प्रचारित कर दिया। मेरे व्यक्तित्व के और भी कई पहलू थे, लेकिन उन्होंने सिर्फ साँप पकडने की खूबी देखी। आज भी घर पर कभी-कभी फोन आते हैं और लोग बोलते हैं - "हलो, सपेरे बोल रहे हो?।।।"

ज्योति कहती हैं, ''ऐसे फोन आने पर भाई को बुरा लगता है क्योंकि लोग उनके काम की गलत व्याख्या कर रहे हैं। लेकिन मैं ऐसी टिप्पणियों पर हँसने लगती हूं, आप इस सब को गंभीरता से कैसे ले सकते हैं। इसलिए हँसी में उडा देती हूँ।"
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