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जानिए भारत की इन जगहों पर लंकाधिपति रावण को क्यों नहीं जलाया जाता   

Thu, 18 Oct 2018 02:21 PM IST
फीचर डेस्क, अमर उजाला
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- फोटो : पीटीआई
वैसे तो रावण का नाम आते ही आप कहते हैं राक्षस था इसलिए भगवान ने उसका वध कर दिया। दशहरे के दिन वैसे तो पूरे देश में दशानन लंकेश का दहन किया जाता है, लेकिन क्या आपको पता है कि भारत में ही कई ऐसे स्थान हैं जहां रावण को जलाया नहीं जाता है। ऐसा करने के पीछे भी कई मान्यताएं और अलग-अलग तरह के मिथक प्रचलित हैं। आज हम आप को उन जगहों के बारे में बताने जा रहे हैं जहां विजयादशमी के दिन रावण को जलाया नहीं जाता है।
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कर्नाटक के कोलार जिले में भगवान शिव के साथ रावण का निकाला जाता है जुलूस

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- फोटो : पीटीआई
कर्नाटक के कोलार जिले में यहां की धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक फसल महोत्सव के दौरान भगवान शिव के परम भक्त रावण के लिए लंकेश्वर महोत्वसव मनाया जाता है। इस महोत्सव के अवसर पर भगवान शिव के साथ रावण की प्रतिमा का जुलूस निकाला जाता है। कर्नाटक के मंडया जिले के मालवल्ली तहसील में रावण का मंदिर बना हुआ है। यहां भी दशहरे में रावण का पुतला नहीं जलाया जाता है।
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हिमाचल प्रदेश के बैजनाथ कस्बे में पुतला जलाना महापाप मानते हैं लोग

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- फोटो : पीटीआई
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में शिवनगरी के नाम से मशहूर बैजनाथ कस्बा है। यहां के लोग रावण का पुतला जलाना महापाप मानते है। मान्यता है कि यहां रावण ने कुछ साल बैजनाथ में भगवान शिव की तपस्या कर मोक्ष का वरदान प्राप्त किया था। बैजनाथ कस्बे के लोगों की ये भी मान्यता है कि अगर उन्होंने रावण का दहन किया तो उनकी मौत हो सकती है। इस भय के कारण भी लोग रावण के दहन नहीं करते हैं।

यहां रावण-मंदोदरी का हुआ था विवाह, लोग मानते हैं खुद को रावण का वंशज 

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- फोटो : पीटीआई
राजस्थान के जोधपुर जिले के मंदोदरी नामक क्षेत्र को रावण और मंदोदरी के विवाह का स्थल माना जाता है। जोधपुर में रावण और मंदोदरी के विवाह स्थल पर आज भी रावण की चवरी नामक एक छतरी मौजूद है। शहर के चांदपोल क्षेत्र में रावण का मंदिर बनाया गया है। यही कारण है कि यहां भी दशहरा में रावण का पुतला नहीं जलाया जाता है। यहां के कुछ समाज विशेष के लोग रावण का पूजन करते हैं और खुद को रावण का वंशज मानते हैं।
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यहां रावण के टुकड़े किये जाते हैं

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- फोटो : सोशल मीडिया
परंपरा के मुताबिक उत्तर प्रदेश के बिसरख व जसवंत नगर नामक जगहों में रावण नहीं जलाया जाता है। बिसरख गांव रावण का ननिहाल माना जाता है। बिसरख गांव का जिक्र तो शिवपुराण में भी किया गया है। पुराणों के अनुसार, त्रेता युग में इस गांव में ऋषि विश्रवा का जन्म हुआ था। इस गांव में उन्होंने शिवलिंग की स्थापना की थी। रावण के पिता ऋषि विश्रवा के कारण इसका नाम बिसरख पड़ा। जसवंत नगर में दशहरे के दिन रावण के टुकड़े कर दिये जाते हैं और तेरहवें दिन रावण की तेरहवीं भी की जाती है।  
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यहां गांव जलकर राख होने का है डर, यहां का दामाद था रावण

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- फोटो : सोशल मीडिया
मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के चिखली गांव में भी रावण का दहन नहीं किया जाता है। यहां के बारे में कहा जाता है कि रावण की पूजा नहीं करने पर गांव जलकर राख हो जाएगा, इसलिए इस गांव में दशहरे पर रावण का दहन करने के बजाए पूजा की जाती है। इस गांव में रावण की विशालकाय मूर्ति भी स्थापित है। मध्यप्रदेश के मंदसौर के बारे में कहा जाता है कि मंदसौर का असली नाम दशपुर था और यह रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका था। ऐसे में मंदसौर रावण का ससुराल हुआ, इसलिए यहां दामाद के सम्मान की परंपरा के कारण रावण के पुतले का दहन न करने की परंपरा है।
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आंध्र प्रदेश के काकिनाडा के मछुआरे नहीं जलाते रावण का पुतला

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- फोटो : सोशल मीडिया
कथाओं के अनुसार रावण ने आंध्र प्रदेश के काकिनाडा में एक शिवलिंग की स्थापना की थी। वहां इसी शिवलिंग के निकट रावण की भी प्रतिमा स्थापित है। यहां शिव और रावण दोनों की पूजा मछुआरा समुदाय करता है। रावण को लंका का राजा माना जाता है और श्रीलंका में कहा जाता है कि राजा वलगम्बा ने इला घाटी में रावण के नाम पर गुफा मंदिर का निर्माण कराया था। इसलिए यहां के मछुवारे रावण का पुतला नहीं जलाते हैं। 
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यहां रावण दहन को दुर्गुणों का दहन मानते हैं

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महाराष्ट्र में अमरावती के गढ़चिरौली नामक स्थान पर आदिवासी समुदाय रावण का पूजन करते हैं और पुतले का दहन नहीं करते हैं। कहा जाता है कि यह समुदाय रावण और उसके पुत्र को अपना देवता मानता है। दक्षिण भारत में ऐसा माना जाता है, कि रावण परम ज्ञानी, पंडित, शिवभक्त था, यहां पर रावण दहन को दुर्गुणों का दहन मानते हैं। 
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