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भूतों के रहस्यमयी अस्तित्व से पर्दा उठाने वाली सच्चाई, जानकर रूह कांप जाएगी आपकी

Sat, 10 Nov 2018 11:07 AM IST
टॉक थॉम्पसन, बीबीसी
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Ghost
पश्चिमी देशों में हैलोवीन का त्यौहार ऐसा मौका होता है, जब भूत-प्रेत और अजीबो-गरीब तरह की चीजों की नुमाइश होती है। ये वो मौका होता है, जो गुजर चुके लोगों के धरती पर उतर आने जैसा माहौल देता है। पर, क्या हम भूतों से जिंदगी के कुछ अहम सबक भी सीख सकते हैं? चलिए, इस सवाल का जवाब तलाशते हैं। 
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ghost festival
आज के हैलोवीन त्यौहार की बुनियाद में सेल्टिक परंपरा का पर्व समहैन था। ईसा से बहुत पहले के भूमध्य सागर और यूरोप में रहने वाले लोग सेल्टिक जबानें बोलते थे। उनका यकीन बुतों और देवताओं में हुआ करता था। ये लोग समहैन त्यौहार इसलिए मनाते थे क्योंकि उनका मानना था कि साल के इस हिस्से में इस दुनिया और उस दुनिया का फर्क मिट जाता है। इंसान और प्रेत एक साथ धरती पर आबाद रहते हैं।
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ghost
सातवीं ईस्वी में जब पोप ग्रेगरी, लोगों को ईसाई बनाने की मुहिम में जुटे थे, तो उन्होंने अपने प्रचारकों से अपील की कि वो पगन यानी बुतपरस्ती की परंपरा वाले लोगों की परंपराओं का विरोध न करें बल्कि उनके त्यौहारों का ईसाईकरण कर दें।

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ghost
तभी से समहैन त्यौहार ऑल सेंट्स डे बन गया। इस त्यौहार में मर चुके लोगों की आत्माओं से संवाद अच्छा माना जाने लगा। ऑल सेंट्स डे को ऑल हैलौज डे भी कहते थे। इससे पहले की रात को हैलोज इवनिंग यानी हैलोवीन कहा जाने लगा।

चर्च की शुरुआती परंपराओं में बुतपरस्तों यानी पगन परंपरा की अहम बुनियाद आत्माओं से संवाद भी शामिल हो गया।
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ghost - फोटो : ghost
भूतों पर ये यकीन, प्राचीन कालीन यूरोप में चर्च के लिए बहुत फायदे का सौदा साबित हुआ। पोप ग्रेगरी लोगों से कहा करते थे कि जो लोग भूत देखें, वो उनके लिए दुआएं पढ़ें। क्योंकि जो लोग मर चुके हैं, उन्हें दूसरी दुनिया यानी जन्नत के सफर के लिए ऐसी दुआओं की जरूरत होती है।
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अात्मा
मध्यकाल में भूत-प्रेत और आत्माओं का ये यकीन चर्च के लिए कारोबार बन गया। चर्च के पादरी लोगों से पाप की माफी के बदले में मोटी रकम वसूलने लगे। भूतों पर भरोसा चर्च के लिए कमाई का जरिया बन गया, तो आम जनता इस 'भूत टैक्स' से बेहाल होने लगी।

जर्मनी के धर्म प्रचारक मार्टिन लूथर की अगुवाई में चर्च के ख़िलाफ उठी आवाज बगावत में तब्दील हो गई। लूथर ने धर्म को लेकर अपने जो 95 उपदेश दिए, वो आज भी जर्मनी के विटेनबर्ग स्थित ऑल सेंट्स कैथेड्रल की दीवारों पर 31 अक्टूबर 1517 को दर्ज किये गए। इस सुधारवाद से ही ईसाई धर्म दो-फाड़ हो गया और प्रोटेस्टेंट व कैथोलिक फिरकों में बंट गया।

इस सुधारवादी आंदोलन की वजह से ही प्रोटेस्टेंट शाखा को मानने वाले भूत-प्रेत पर यकीन को कैथोलिक फिरके का अंधविश्वास कहने लगे।
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अात्मा
मगर, भूत होते हैं या नहीं, ये बहस ख़त्म नहीं हुई। इस सवाल का जवाब लोगों ने विज्ञान में तलाशने की कोशिश की। उन्नीसवीं सदी के आते-आते अध्यात्मवाद ने जोर पकड़ा। इसे मानने वाले ये कहते थे कि इस दुनिया से जा चुके लोग, जिंदा लोगों से संवाद कर सकते हैं। इसके लिए मंडलियां बैठने लगीं। आत्माओं की तस्वीरें लेने का चलन इसी दौर में बढ़ा।

पहली आलमी जंग के बाद अध्यात्मवाद का कमोबेश ख़ात्मा हो गया। लेकिन, इसका असर अब भी देखा जा सकता है। आज भी 'घोस्ट हंटर्स' वैज्ञानिक तरीकों से भूतों के अस्तित्व को साबित करने की कोशिश करते देखे जाते हैं।

भूत-प्रेत और जिन्नों का सवाल सिर्फ ईसाई धर्म का नहीं। दूसरे मजहबों में भी इन्हें लेकर तर्क-वितर्क होते रहे हैं। हिंदू धर्म में तो बाकायदा गुजरी हुई आत्माओं का आह्वान किया जाता है। तंत्र-मंत्र में यकीन करने वाले अक्सर ये काम करते हैं। अघोरी संप्रदाय के लोग इसके लिए मशहूर हैं। पित्र पक्ष में हिंदू धर्म के लोग अपने गुजर चुके पितरों को तर्पण देते हैं। माना जाता है कि आत्माएं वापस इस दुनिया में आती हैं। उनका स्वागत-सत्कार होता है।

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'भूत' का डर ऐसा फैला, बंद हो गया स्कूल - फोटो : BBC
ताइवान में 90 फीसदी लोग भूत देखने का दावा करते हैं। ताइवान के अलावा जापान, कोरिया, चीन और वियतनाम भूतों का महीना मनाते हैं। इनमें एक ख़ास दिन प्रेत दिवस के तौर पर मनाया जाता है। इस दिन के बारे में ये मान्यता है कि 'घोस्ट डे' पर आत्माएं धरती पर मुक्त रूप से विचरण करती हैं।

इन मान्यताओं का संबंध बौद्ध धर्म की कहानी उराबोन सूत्र से बताया जाता है। इस कहानी में विवरण है कि बुद्ध एक युवा भिक्षु को अपनी गुजर चुकी मां की मदद का तरीका बताते हैं। वो युवा भिक्षु अपनी मां को 'भूखे प्रेत' के तौर पर बार-बार देखता है।

दूसरे धर्मों की ही तरह ताइवान में भी भूतों को अच्छे और बुरे के दर्जे में बांट कर देखा जाता है। दोस्ताना भूत वो होते हैं, जो पुश्तैनी या पारिवारिक रूप से जुड़े होते हैं। भूतोत्सव के दौरान इनका घर में स्वागत किया जाता है। वहीं, जो प्रेत दोस्ताना नहीं माने जाते, वो क्रोधित होते हैं या फिर भूखे। ऐसे भूत, इंसानों को डराते हैं।

भूत-प्रेतों के बारे में जो समझ रखते हैं, उनके मुताबिक भूत यूं ही नहीं डराते। इसकी ख़ास वजह होती है। जैसे कि कत्ल की अनसुलझी गुत्थी, मजबूर कर के ख़ुदकुशी कराना, ऐसे हादसे जो रोके जा सकते थे और नैतिक पतन के सबक।
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भूत प्रेत की दुनिया
ऐसे मामलों मे देखा जाता है कि भूत कब्र से इंसाफ की गुहार लगाते हैं। वो किसी इंसान से इंसाफ मांग सकते हैं या फिर पूरे समाज से। जैसे कि अमरीका में लोगों ने अफ्रीकी मूल के मारे गए लोगों के प्रेत देखे या फिर अमरीका के मूल निवासियों के भूत देखे। न्यूयॉर्क की बिंगैमटन स्टेट यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाली एलिजाबेथ टकर ने ऐसे तमाम किस्सों को इकट्ठा किया है। वो कहती हैं कि प्रेतों की ऐसी भयावाह कहानियों का ताल्लुक आम-तौर पर किसी बुरी घटना से पाया गया है।

इस नजरिए से देखें, तो, प्रेत हमें नैतिकता के दागदार पहलू की याद दिलाते हैं। वो ये बताते हैं कि किन मामलों में इंसानों ने या समाज ने नैतिक पैमानों का पालन नहीं किया। ये करतूतें आत्मा पर बोझ की तरह महसूस होती हैं।

पर प्रेतों की कहानियां सिर्फ बुरे सबक नहीं देतीं। वो उम्मीदें भी जगाती हैं। वो ये एहसास दिलाती हैं कि मौत के बाद आप दूसरी दुनिया में जाकर भी इस दुनिया से ताल्लुक बनाए रख सकते हैं। अगर आपने कुछ बुरा काम किया है, तो आप के पास मौका होगा कि आप पछतावा कर लें। पुराने पापों का प्रायश्चित कर लें। तो, अगली बार किसी हैलोवीन पार्टी में जाएं, तो अपने दोस्तों के साथ हमारी जिंदगी में भूतों की अहमियत पर गौर फरमाएं। ये भी सोचें कि किस तरह वो हमें बुरे रास्ते से सही रास्ते पर लाने का काम करते हैं।
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