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जानिए उस लड़की के बारे में जो अपने चेहरे पर लगाती है पीरियड्स के खून

Wed, 24 Jul 2019 03:31 PM IST
प्रशांत राय बीबीसी हिंदी, नई दिल्ली
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- फोटो : RENATA CHEBEL PARA DANZAMEDICINA
27 साल की लौरा टेक्सीरिया हर महीने माहवारी के दौरान निकलने वाले खून को इकट्ठा करके वह अपने चेहरे पर लगाती हैं। इसके बाद बचे हुए खून को पानी में मिलाकर अपने पेड़ों में डालती हैं। 'सीडिंग द मून' नाम की ये प्रथा कई पुरानी मान्यताओं से प्रेरित है, जिनमें माहवारी के खून को उर्वरता के प्रतीक के रूप में देखा जाता था। इस प्रथा को मानने वाली महिलाएं अपने पीरियड को अपने ही अंदाज में जीती हैं। लौरा बीबीसी को बताती हैं, "जब मैं अपने पेड़ों में पानी डालती हूं तो मैं एक मंत्र का जाप करती हूं, जिसका मतलब है- मुझे माफ करना, मैं आपसे प्यार करती हूं और आपकी आभारी हूं।" लौरा कहती हैं कि जब वह अपने खून को अपने चेहरे और शरीर पर लगाती हैं तो वह सिर्फ आंखें बंद करती हैं और शुक्रगुजार महसूस करती हैं, और अपने अंदर शक्ति का संचार होते हुए महसूस करती हैं।
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- फोटो : ANA OLIVEIRA
ताकत देने वाली प्रथा
लौरा के लिए ये प्रथा महिलाओं को सशक्त बनाने से भी जुड़ी हुई है। वह कहती हैं, "समाज में सबसे बड़ा भेदभाव मासिक धर्म से जुड़ा हुआ है। समाज इसे ख़राब मानता है। सबसे बड़ा शर्म का विषय भी यही है क्योंकि महिलाएं अपने पीरियड के दौरान सबसे ज्यादा शर्मसार महसूस करती हैं।" साल 2018 में 'वर्ल्ड सीड योर मून डे' इवेंट को शुरू करने वालीं बॉडी-साइकोथेरेपिस्ट, डांसर और लेखक मोरेना कार्डोसो कहती हैं, "महिलाओं के लिए सीडिंग द मून एक बहुत ही सरल और उनके मन को शक्ति देने वाला तरीका है।" बीते साल इस इवेंट के दौरान दो हजार लोगों ने अपनी माहवारी के दौरान निकले खून को पेड़ों में डाला था।
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- फोटो : SOFIA RIBEIRO
महिलाओं का आध्यात्मिक काम
मोरेना कहती हैं, "इस कार्यक्रम के आयोजन का मकसद ये था कि लोग ये समझें कि माहवारी के दौरान निकलने वाला खून शर्म का विषय नहीं है बल्कि ये सम्मान और ताक़त का प्रतीक है।" मोरेना के मुताबिक, उत्तरी अमरीका (मेक्सिको समेत) और पेरू में जमीन पर माहवारी के दौरान निकलने वाले ख़ून को ज़मीन पर फैलाया गया ताकि उसे उर्वर बनाया जा सके। ब्राज़ील की यूनीकैंप यूनिवर्सिटी में 20 साल से इस मुद्दे पर शोध कर रहीं मानवविज्ञानी डानियेला टोनेली मनिका बताती हैं कि दूसरे समाजों में पीरियड के दौरान निकलने वाले ख़ून को लेकर एक बहुत ही नकारात्मक रुख है। वह बताती हैं, "माहवारी को बेकार का खून बहना माना जाता है और इसे मल और मूत्र की श्रेणी में रखा जाता है जिसे लोगों की नज़रों से दूर बाथरूम में बहाना होता है।" 1960 में महिलावादी आंदोलनों ने इस सोच को बदलने की कोशिश की थी और महिलाओं को उनके शरीर के बारे में खुलकर बात करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इसके बाद कई कलाकारों ने माहवारी से निकले खून के प्रतीक का इस्तेमाल अपने राजनीतिक, पर्यावरणीय, सेक्शुअल और लैंगिक विचारों को सामने रखने में किया।

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प्रतीकात्मक फोटो
विशालकाय गर्भाशय
इंटरनेट पर इस प्रथा के बारे में जानकारी पाने वालीं रेनेटा रिबेरियो कहती हैं, "सीडिंग माई मून प्रथा ने मुझे पृथ्वी को एक बड़े गर्भाशय के रूप में देखने में मदद की। इस विशाल योनि में भी अंकुरण होता है जिस तरह हमारे गर्भाशय में होता है।"
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प्रतीकात्मक फोटो
आज भी कई जगह वर्जित
दुनिया भर में 14 से 24 साल के बीच की उम्र वाली 1500 महिलाओं पर किए गए सर्वेक्षणों में सामने आया है कि कई समाजों में आज भी ये विषय वर्जनाओं में शामिल है। जॉन्सन एंड जॉन्सन ने ब्राज़ील, भारत, दक्षिण अफ्रीका, अर्जेंटीना और फिलीपींस में ये अध्ययन किया।
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woman in menstrual period
इस अध्ययन में सामने आया कि महिलाएं सेनिटरी नैपकिन खरीदने में शर्म महसूस करती हैं। इसके साथ ही पीरियड के दौरान महिलाएं अपनी सीट से उठने में भी शर्म महसूस करती हैं। फेडरल यूनिवर्सिटी ऑफ बहिया से जुड़ीं 71 साल की समाज मानव विज्ञानी सेसिला सार्डेनबर्ग बताती हैं कि उन्हें अपना पहला पीरियड उस दौर में हुआ था जब लोग मुश्किल से ही इस बारे में बात करते थे। वह कहती हैं कि इस विषय से जुड़ी शर्म को दूर करने के लिए जरूरी है कि महिलाएं इस बारे में बात करें और आजकल की महिलाएं अपनी माहवारी को लेकर शर्मसार नहीं दिखती हैं।
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प्रतीकात्मक फोटो
क्या हुए विवाद
लौरा बताती हैं कि इस प्रथा के लिए सभी लोग तैयार नहीं हैं। अपने अनुभव को साझा करते हुए वह कहती हैं, "इंस्टाग्राम पर सिर्फ 300 लोग मुझे फॉलो करते थे। मैंने इस प्रथा का अनुसरण करने के बाद एक तस्वीर पोस्ट की।" लेकिन चार दिन बाद इंस्टाग्राम पर उनका मज़ाक उड़ाया गया। ब्राजील के एक विवादित कॉमेडियन डेनिलो जेन्टिलि ने इस तस्वीर को अपने 16 मिलियन फॉलोअर्स के साथ साझा किया। लेकिन उन्होंने लिखा, "पीरियड के दौरान निकलने वाला ख़ून सामान्य है लेकिन उसे अपने चेहरे पर लगाना असामान्य है।" लेकिन इस पोस्ट पर 2300 से ज़्यादा कमेंट्स आए जिनमें से ज़्यादातर नकारात्मक थे।
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प्रतीकात्मक फोटो
लौरा कहती हैं कि ये किस्सा सिर्फ बताता है कि ये विषय आज भी कितना वर्जित है। वह कहती हैं, "लोग सोचते हैं कि अगर कोई चीज उनके लिए सामान्य नहीं है तो वह चीज जरूर ही एक गलत होगी। वह सोचते हैं कि वह अपने मोबाइल फोनों के पीछे छिपकर किसी को गालियां दे सकते हैं।" "ये मेरे शरीर से निकला तरल पदार्थ है और ये मैं तय करूंगी कि कौन सी चीज असामान्य है और कौन सी चीज नहीं। मैं किसी अन्य व्यक्ति की जिंदगी में हस्तक्षेप नहीं कर रही हूं।" "लोगों को भद्दी गालियां दिया जाना असामान्य होना चाहिए। मैं उस दिन ये करना बंद करूंगी जब लोग पीरियड के दौरान निकले ख़ून को प्राकृतिक चीज़ की तरह देखना शुरू कर दें।"
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