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आखिर क्यों गायब हो जाएगा लाल रंग वाला सेब?

Thu, 09 Jan 2020 10:46 AM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
सेब का रंग लाल होता है, हमें यही पढ़ाया सिखाया जाता रहा है। भले ही बाजार में हरे, पीले गुलाबी, नारंगी और इंद्रधनुषी रंग के सेब भी मिलते हों, मगर एक आदर्श सेब लाल रंग का ही होता है। लोग मिसालें भी लाल रंग की ही देते हैं। मसलन, फलां के गाल तो सेब जैसे लाल हैं। मगर, आज के दौर में सेब का ये लाल रंग खतरे में है। और ये खतरा जलवायु परिवर्तन से पैदा हुआ है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
आज जो सेब हम दुनिया भर के बाजारों में देखते हैं, उनके पुरखे कभी मध्य एशियाई देश कजाखिस्तान के पहाड़ी इलाकों में उगते थे। कजाखिस्तान की चीन से लगी पहाड़ी सीमा की ढलानों पर ही ये जंगली सेब उगा करते थे। और कभी ये वहां के जंगलों में आबाद भालुओं का पेट भरने के काम आते थे। लेकिन, दुनिया भर में जंगली सेबों की आबादी 90 फीसदी तक घट गई है। अब सेब बागानों में ही ज्यादा उगाए जाते हैं। इनके जीन से छेड़छाड़ कर के नई नई किस्में उगाई जाती हैं। इसीलिए जंगली सेबों का भविष्य खतरे में है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
कजाखिस्तान के जंगल में सेब के जो पेड़ खुद से उगते हैं, वो हल्के पीले भी होते हैं और चेरी के रंग के भी। कई बार उनका रंग चटख हरा भी होता है। लेकिन, आम तौर पर जंगली सेब का रंग लाल ही होता है। आज हालत ये है कि कजाखिस्तान में भी अमरीकी रेड डेलीशस और गोल्डेन डेलीशस नस्लों के सेब उगाए जा रहे हैं। सेब का रंग उसके जीन पर निर्भर करता है। ये जीन, सेब के छिलके में पाया जाता है। न्यूज़ीलैंड के वैज्ञानिक डेविड चेग्न कहते हैं कि कई एंजाइम मिल कर किसी सेब का रंग निर्धारित करते हैं। ये वही एंजाइम होते हैं, जो शकरकंद, अंगूर और बेरों का रंग निर्धारित करते हैं।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
किसी सेब के एंजाइम का नियंत्रण एक खास किस्म की प्रोटीन तय करती है। वैज्ञानिकों ने इसे MYB10 नाम दिया है। इसकी जितनी मात्रा सेब में होगी, उतना ही उसका रंग लाल होगा। सेब का रंग तापमान पर भी निर्भर करता है। अगर गर्मी ज्यादा होती है, तो सेब का लाल रंग गुम होने लगता है। यानी लाल सेब पैदा करने के लिए मौसम का सर्द होना एक शर्त है। डेविड और उन के साथियों ने देखा था कि एक बार स्पेन में जुलाई का तापमान बहुत गर्म हो गया था, तो सेबों के रंग धूमिल हो गए थे। भले ही आज तरह तरह के सेब बाजार में मिलते हों। मगर, मांग लाल सेब की ही ज्यादा है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
इंसानों ने जब से सेबों को बागों में उगाना शुरू किया है, तब से ही सेबों की कई नस्लों को विकसित किया गया है। लेकिन, बाजार में हावी लाल सेब ही हैं। अमरीका के मेन राज्य के पालेर्मो मे रहने वाले जॉन बंकर ने कई गुम हो गई क़िस्मों को बचाया है। इन में से कई सेब आज से एक सदी पहले खूब उगाए जाते थे। इन में ब्लैक ऑक्सफोर्ड नाम का एक सेब तो इतना गहरा लाल होता है कि आप इसे काटे नहीं, तो दूर से ये बेर जैसा दिखता है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
शुरुआत में जब इंसानों ने सेब उगाना शुरू किया, तो इसके रंग को उतनी अहमियत नहीं दी जाती थी। तब सेबों का वर्गीकरण उनकी उपयोगिता के आधार पर किया जाता था। जैसे कि कुछ सिरका बनाने के लिए मुफीद थे, तो कुछ सॉस बनाने के लिए और कुछ ऐसे ही खाने में ज्यादा अच्छे लगते थे। उस दौर में लोग ये ध्यान नहीं देते थे कि सेब का रंग कैसा है। क्योंकि उस वक्त किसान अपने लिए सेब उगाया करते थे। या तो ये स्थानीय बाजार में बिकते थे। उस समय रंग से ज्यादा सेब की उपयोगिता पर जोर था।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
जॉन बंकर कहते हैं कि ये सिलसिला आज से एक सदी पहले बदला। जब सेबों को उगा कर पूरी दुनिया में निर्यात करने का सिलसिला शुरू हुआ। तब सेब का रंग ब्रैंडिंग की बुनियाद बन गया। जॉन बंकर कहते हैं कि एकसाथ सेबों की ब्रैंडिंग करना आसान था। और सेबों को हजारों मील दूर भेजने के लिए उन्हें कच्चा ही तोड़ा जाने लगा, ताकि वो सड़ें नहीं। लेकिन, इस में समस्या ये थी कि सेब का असल रंग तो पकने के बाद ही आता था। कच्चे सेबों का रंग लाल होता नहीं था। फिर म्यूटेशन की मदद से कच्चे सेबों के रंग को भी हरा करने में कामयाबी मिली। और इसका नाम रखा गया रेड डेलीशस। सेब की ये नस्ल 1921 में बाजार में उतारी गई थी।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
दूसरे किस्म के सेबों की भी मांग बढ़ने लगी। एक जैसे दिखने वाले सेबों का बाजार बढ़ता गया और अलग-अलग रंगों के सेब अच्छे नहीं माने जाने लगे। सेब की रंगत पर जोर बढ़ा, तो पुरानी किस्मों के वो सेब भी चलन से बाहर हो गए, जो कभी केवल अच्छे स्वाद के लिए उगाए जाते थे। अमरीका की मिनेसोटा यूनिवर्सिटी में सेब उगाने वाले वैज्ञानिक डेविड बेडफोर्ड कहते हैं कि उन्होंने बचपन से रेड डेलीशस सेब ही खाए थे। उन्हें दूसरे सेबों का स्वाद ही नहीं पता था। हालांकि बाद में उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर सेब की एक नई किस्म हनीक्रिस्प को विकसित किया। आज से कुछ साल पहले इसे उगाने के लिए बाजार में उतारा गया। ये पीले रंग का होता है और इस में लाल धारियां बनी होती हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
रेड डेलीशस से अलग किस्म के सेब भले उगाए जा रहे हों, मगर आज भी जोर लाल रंग के सेबों पर ही है। हाल ये है कि हनीक्रिस्प सेब की भी लाल रंग वाली प्रजाति विकसित कर ली गई है। डेविड बेडफोर्ड कहते हैं कि बाजार में आने वाले हर सेब के साथ यही होता है। हम लाल रंग के ही सेब चाहते हैं। लाल रंग के सेब पीले रंग के सेब से बेहतर ही हों, ये ज़रूरी नहीं है। बल्कि कई बार तो लाल रंग के सेबों का स्वाद पीले रंग के सेबों से खराब ही होता है। लेकिन, दिक्कत ये है कि लाल रंग के सेब ही ज्यादा बिकते हैं। इस चुनौती से बचने के लिए मिनेसोटा यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक साथ कई सेबों की नस्लें बाजार में उतारी हैं। इस में किसानों के पास रंग चुनने का विकल्प नहीं है।

जब आप देखते हैं कि जंगली सेबों के कितने सारे रंग होते हैं, तब आप को अंदाजा होता है कि लाल रंग के सेबों के चक्कर में हम अच्छे स्वाद वाले सेबों से कितने दूर होते जा रहे हैं। अब सवाल ये उठता है कि क्या कभी सेब का ये असली रंग, लाल रंग के प्रति हमारे विशेष लगाव पर जीत सकेगा? इतिहास हमें बताता है कि ये बहुत बड़ी चुनौती है। लेकिन, हमें ऐसा वक़्त आने का ख्वाब देखने से भला कौन रोक सकता है?
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