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शेषनाग पर क्यों सोते हैं भगवान विष्णु, क्या सच में उनके फन पर टिकी है धरती!

Tue, 05 Mar 2019 07:19 PM IST
गौरव शुक्ला फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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जब-जब धरती पर पाप बढ़ता है तब-तब किसी ना किसी रूप में भगवान विष्णु अवतार लेते हैं। हर अवतार में अलग सीख देतें हैं। यह बात सच है कि भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ है, परन्तु शेषनाग का साथ उनके हर अवतार में जुड़ा हुआ है। क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान विष्णु शेषनाग पर ही क्यों सोते हैं? और क्या सच में पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी है। आज हम आपको इससे जुड़े कई अनसुने रहस्य के बारे में बताएंगे।  
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- फोटो : Social Media
भगवान श्री हरि विष्णु क्षीर सागर में शेषनाग यानी सर्प पर शयन करते हैं। हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार, भगवान विष्णु जगत का पालन करने वाले देवता हैं। भगवान विष्णु उपयुक्त समय पर मानव जाति का मार्ग दर्शन करते हैं।
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- फोटो : Social Media
शास्त्रों में भगवान विष्णु का स्वरूप सात्विक यानी शांत, आनंदमयी तथा कोमल बताया गया है। वहीं दूसरी ओर भगवान विष्णु के भयानक तथा कालस्वरूप शेषनाग पर आनंद मुद्रा में शयन करते हुए भी दर्शन किए जा सकते हैं। भगवान विष्णु के इसी स्वरूप के लिए शास्त्रों में लिखा गया है 'शान्ताकारं भुजगशयनं' यानी शांत स्वरूप तथा भुजंग यानी शेषनाग पर शयन करने वाले देवता भगवान विष्णु।

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- फोटो : lord vishnu
भगवान विष्णु के इस अनूठे स्वरूप पर गौर करें तो यह प्रश्न अथवा तर्क भी मन में आता है कि आखिर काल के साये में रहकर भी क्या कोई बिना किसी बेचैनी के शयन कर सकता हैं। हिन्दू धर्म के अनुसार शेषनाग भगवान विष्णु की उर्जा का प्रतीक हैं जिस पर वे आराम करते हैं।
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भगवान विष्णु
दरअसल, मानव जीवन का प्रत्येक पल कर्तव्य एवं जिम्मेदारियों से जुड़ा होता है। इनमें पारिवारिक, सामाजिक तथा आर्थिक दायित्व अहम होते हैं। किंतु इन दायित्वों को पूरा करने के साथ-साथ अनेक समस्याओं एवं परेशानियों का सिलसिला भी चलता रहता है, जो कालरूपी नाग की तरह भय, बेचैनी एवं चिंताएं पैदा करता है।
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lord vishnu
कई मौकों पर व्यक्ति टूटकर बिखर भी जाता है। अतः भगवान विष्णु का शांत स्वरूप ऐसे बुरे वक्त में संयम एवं धीरज के साथ जीवन की सभी मुश्किलों पर काबू पाने की प्रेरणा देता है। विपरीत परिस्थितियों में भी शांत, स्थिर, निर्भय तथा निश्चित मन एवं मस्तिष्क के साथ अपने धर्म का पालन करना ही भगवान विष्णु के भुजंग अथवा शेषनाग पर शयन का प्रतीक है।
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हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार माना जाता है कि शेषनाग ने अपनी कुंडली में सभी ग्रहों को पकड़ के रखा है और वे भगवान विष्णु के मन्त्रों का उच्चारण करते हैं। यदि भगवान विष्णु संपूर्ण ब्रह्मांड, ग्रहों और तारों के प्रतीक हैं तो वास्तव में यह महत्व जायज है।

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lord vishnu
भगवान विष्णु और शेषनाग के बीच का संबंध शाश्वत है। पुराणों में तो ऐसा भी कहा गया है कि भगवान विष्णु का यह रूप समय का मार्गदर्शक है। भगवान विष्णु के प्रत्येक अवतार में बुरी शक्तियों का नाश करने के लिए शेषनाग भगवान विष्णु के साथ जुड़े हुए हैं और उन्होंने विश्व को पाप से बचाया है। त्रेता युग में शेषनाग ने लक्ष्मण का रूप लिया था जबकि द्वापर युग में वे बलराम के रूप में थे और दोनों ही जन्मों में उन्होंने राम और कृष्ण की सहायता की थी।

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- फोटो : You Tube
आप सभी को यह तो पता ही होगा कि जब बाल कृष्ण को वासुदेव यमुना नदी पार कर गोकुल के नंदभवन पहुंचा रहे थे तब शेषनाग ने ही अपने फन से बारिश के पानी को रोककर उनकी रक्षा की थी। ऐसा माना जाता है कि शेषनाग भगवान विष्णु के रक्षक के तौर पर काम करते हैं। इसलिए उन्हें सांपों के बिस्तर पर लेटा हुआ दिखाया जाता है।

शेषनाग के फन पर पृथ्वी के टिकने का रहस्य 

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- फोटो : pexels.com

अधो महीं गच्छ भुजंगमॊत्तम; सवयं तवैषा विवरं परदास्यति
इमां धरां धारयता तवया हि मे; महत परियं शेषकृतं भविष्यति (महाभारत आदिपर्व के आस्तिक उपपर्व के 36वें अध्याय का श्लोक)


इसमें ही वर्णन मिलता है कि शेषनाग को ब्रम्हा जी धरती को अपने ऊपर धारण करने को कहते है और क्रमशः आगे के श्लोक में शेषनाग जी आदेश के पालन हेतु पृथ्वी को अपने फन पे धारण कर लेते हैं।इन श्लोकों पे ध्यान दें तो इसमें लिखा है कि धरती के भीतर न कि धरती को बाहर खुद को वायुमंडल में स्थित करके पृथ्वी को अपने ऊपर धारण करना।

अब जरा वैज्ञानिक तथ्यों से इसे समझें

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earth on sheshnag - फोटो : Social Media
पृथ्वी की संरचना- यांत्रिक लक्षणों के आधार पर पृथ्वी को स्थलमण्डल, एस्थेनोस्फीयर, मध्यवर्ती मैंटल, बाह्य क्रोड और आतंरिक क्रोड मे बनाता जाता है। रासायनिक संरचना के आधार पर भूपर्पटी, ऊपरी मैंटल, निचला मैंटल, बाह्य क्रोड और आतंरिक क्रोड में बांटा जाता है।

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- फोटो : Social Media
ऊपर की भूपर्पटी प्लेटों से बनी है और इसके नीचे मैंटल होता है जिसमें मैंटल के इस निचली सीमा पर दाब 140 GPa पाया जाता है। मैंटल में संवहनीय धाराएं चलती हैं जिनके कारण स्थलमंडल की प्लेटों में गति होती है। इन गतियों को रोकने के लिए एक बल काम करता है जिसे भुचुम्बकत्व कहते है इसी भुचुम्बकत्व की वजह से ही टेक्टोनिक प्लेट जिनसे भूपर्पटी का निर्माण हुआ है वो स्थिर रहती है और कही भी कोई गति नही होती

तो क्या भुचुम्बकत्व ही शेषनाग है...

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- फोटो : Social Media
कहा जाता है कि शेषनाग के हजारों फन हैं। भुचुम्बकत्व में हजारों मैग्नेटिक वेब्स हैं शेषनाग के शरीर अंत में एक हो जाता है मतलब एक पूछ है, भुचुम्बकत्व कि उत्पत्ति का केंद्र एक ही है। शेषनाग ने पृथ्वी को अपने फन पे टिका रखा जा भुचुम्बकत्व की वजह से ही पृथ्वी टिकी हुई है।
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sheshnag and earth story - फोटो : mysticpowernews.com
शेषनाग के हिलने से भूकंप आता है भुचुम्बकत्व कि बिगड़ने (हिलने) से भूकंप आता है। वैदिक ग्रंथों में इसी भुचुम्बकत्व को ही शेषनाग कहा गया है। विशेष- क्रोड का विस्तार मैंटल के नीचे है आर्थात 2890 किमी से लेकर पृथ्वी के केंद्र तक। किन्तु यह भी दो परतों में विभक्त है- बाह्य कोर और आतंरिक कोर। बाह्य कोर तरल अवस्था में पाया जाता है क्योंकि यह द्वितीयक भूकंपीय तरंगों (एस-तरंगों) को सोख लेता है। तो ये कह देना की पृथ्वी शेषनाग के फन पे स्थित है मात्र कल्पना नही बल्कि एक सत्य है कि पृथ्वी शेषनाग(भुचुम्बकत्व) की वजह से ही टिकी हुई है या शेषनाग (भुचुम्बकत्व) के फन पे स्थित है।
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