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कहानी भारत के एक ऐसे मंदिर की, जिसके निर्माण में 3 हजार हाथियों ने दिया था श्रमदान

Tue, 01 Jun 2021 04:07 PM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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बृहदेश्वर मंदिर - फोटो : सोशल मीडिया
भारत को मंदिरों और तीर्थस्थानों का देश कहा जाता है। यहां लगभग हर इलाके में कोई न कोई मंदिर देखने को मिल जाता है। इसकी वजह ये है कि भारत में लोग भगवान या ईश्वर को इतना मानते हैं कि उनके लिए विशाल से विशाल मंदिर बनवाने से जरा भी नहीं हिचकते। यह कोई आज की बात नहीं हैं, बल्कि ऐसा सदियों से चला आ रहा है। कुछ ऐसा ही एक मंदिर तमिलनाडु के तंजौर में स्थित है, जो अपने वास्तु और शिल्पकला के लिए दुनियाभर में मशहूर है।

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बृहदेश्वर मंदिर, तंजौर - फोटो : सोशल मीडिया
इस मंदिर का नाम है बृहदेश्वर मंदिर। तमिलनाडु के तंजौर में स्थित होने के कारण इसे तंजौर के मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इसका निर्माण 1003-1010 ई. के बीच चोल शासक प्रथम राजराज चोल ने करवाया था। उनके नाम पर ही इसे 'राजराजेश्वर मंदिर' के नाम से भी जाना जाता है। कहते हैं कि इस मंदिर को बनाने को लेकर उन्हें एक सपना आया था, जब वो श्रीलंका की यात्रा पर निकले हुए थे।
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बृहदेश्वर मंदिर, तंजौर - फोटो : सोशल मीडिया
भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर 13 मंजिला है, जिसकी ऊंचाई लगभग 66 मीटर है। वैसे आमतौर पर बिना नींव के तो ना ही कोई मकान बनता है और ना ही किसी प्रकार की अन्य इमारत। लेकिन इस विशालकाय मंदिर की सबसे आश्चर्यजनक बात ये है कि यह बगैर नींव के हजारों साल से खड़ा है। यह एक रहस्य ही है कि बिना नींव के यह कैसे इतने साल से टिका हुआ है।

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बृहदेश्वर मंदिर, तंजौर - फोटो : सोशल मीडिया
यह मंदिर पूरी तरह से ग्रेनाइट से निर्मित है। दुनिया में यह संभवत: अपनी तरह का पहला और एकमात्र मंदिर है, जो ग्रेनाइट का बना हुआ है। बृहदेश्वर मंदिर के निर्माण में करीब 1 लाख 30 हजार टन ग्रेनाइट के पत्थरों को इस्तेमाल में किया गया। इन पत्थरों को अलग-अलग जगह से लाने के लिए 3 हजार हाथियों की मदद ली गई थी। यह मंदिर अपनी भव्यता, वास्तुशिल्प और गुंबद की वजह से दुनियभर में मशहूर है। यह मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों की सूची में शामिल है।
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बृहदेश्वर मंदिर - फोटो : सोशल मीडिया
इस मंदिर की एक और विशेषता ये है कि इसके शिखर पर एक स्वर्णकलश स्थित है और ये स्वर्णकलश जिस पत्थर पर स्थित है, उसका वजन करीब 80 टन बताया जाता है, जो एक ही पत्थर से बना हुआ है। अब इतने वजनदार पत्थर को मंदिर के शिखर पर कैसे ले जाया गया होगा, यह अब तक एक रहस्य ही बना हुआ है, क्योंकि उस समय तो क्रेन तो नहीं होते थे। कहते हैं कि इस गुंबद की परछाई धरती पर नहीं पड़ती। हालांकि, इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है।
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