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जब भारतीय लोगों के मुंह से अचानक निकला 'पंडित माउंटबेटन की जय', पढ़िए 15 अगस्त 1947 की एक दिलचस्प कहानी

Sat, 15 Aug 2020 11:05 AM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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15 अगस्त 1947 - फोटो : सोशल मीडिया
जब 14 अगस्त, 1947 की शाम लॉर्ड माउंटबेटन कराची से दिल्ली लौटे तो वो अपने हवाई जहाज से मध्य पंजाब में आसमान की तरफ जाते हुए काले धुएं को साफ देख सकते थे। इस धुएं ने नेहरू के राजनीतिक जीवन के सबसे बड़े क्षण की चमक को काफी हद तक धुंधला कर दिया था। 14 अगस्त की शाम जैसे ही सूरज डूबा, दो संन्यासी एक कार में जवाहर लाल नेहरू के 17 यॉर्क रोड स्थित घर के सामने रुके। उनके हाथ में सफेद सिल्क का पीतांबरम, तंजौर नदी का पवित्र पानी, भभूत और मद्रास के नटराज मंदिर में सुबह चढ़ाए गए उबले हुए चावल थे।

जैसे ही नेहरू को उनके बारे में पता चला, वो बाहर आए। उन्होंने नेहरू को पीतांबरम पहनाया, उन पर पवित्र पानी का छिड़काव किया और उनके माथे पर पवित्र भभूत लगाई। इस तरह की सारी रस्मों का नेहरू अपने पूरे जीवन विरोध करते आए थे लेकिन उस दिन उन्होंने मुस्कराते हुए संन्यासियों के हर अनुरोध को स्वीकार किया।
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जवाहर लाल नेहरू - फोटो : सोशल मीडिया
लाहौर में हिंदू इलाकों की जल आपूर्ति काटी गई
थोड़ी देर बाद अपने माथे पर लगी भभूत धोकर नेहरू, इंदिरा गांधी, फिरोज गांधी और पद्मजा नायडू के साथ खाने की मेज पर बैठे ही थे कि बगल के कमरे मे फोन की घंटी बजी। ट्रंक कॉल की लाइन इतनी खराब थी कि नेहरू ने फोन कर रहे शख्स से कहा कि उसने जो कुछ कहा उसे वो फिर से दोहराए। जब नेहरू ने फोन रखा तो उनका चेहरा सफेद हो चुका था। उनके मुंह से कुछ नहीं निकला और उन्होंने अपना चेहरा अपने हाथों से ढंक लिया। जब उन्होंने अपना हाथ चेहरे से हटाया तो उनकी आंखें आंसुओं से भरी हुई थीं। उन्होंने इंदिरा को बताया कि वो फोन लाहौर से आया था। वहां के नए प्रशासन ने हिंदू और सिख इलाकों की पानी की आपूर्ति काट दी थी। लोग प्यास से पागल हो रहे थे। जो औरतें और बच्चे पानी की तलाश में बाहर निकल रहे थे, उन्हें चुन-चुन कर मारा जा रहा था। लोग तलवारें लिए रेलवे स्टेशन पर घूम रहे थे ताकि वहां से भागने वाले सिखों और हिंदुओं को मारा जा सके।

फोन करने वाले ने नेहरू को बताया कि लाहौर की गलियों में आग लगी हुई थी। नेहरू ने लगभग फुसफुसाते हुए कहा, 'मैं आज कैसे देश को संबोधित कर पाऊंगा? मैं कैसे जता पाऊंगा कि मैं देश की आजादी पर खुश हूं, जब मुझे पता है कि मेरा लाहौर, मेरा खूबसूरत लाहौर जल रहा है।' इंदिरा गांधी ने अपने पिता को दिलासा देने की कोशिश की। उन्होंने कहा आप अपने भाषण पर ध्यान दीजिए जो आपको आज रात देश के सामने देना है। लेकिन नेहरू का मूड उखड़ चुका था।
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15 अगस्त 1947 - फोटो : सोशल मीडिया
ट्रिस्ट विद डेस्टिनी
नेहरू के सचिव रहे एम ओ मथाई अपनी किताब 'रेमिनिसेंसेज ऑफ नेहरू एज' में लिखते हैं कि नेहरू कई दिनों से अपने भाषण की तैयारी कर रहे थे। जब उनके पीए ने वो भाषण टाइप करके मथाई को दिया तो उन्होंने देखा कि नेहरू ने एक जगह 'डेट विद डेस्टिनी' मुहावरे का इस्तेमाल किया था। मथाई ने रॉजेट का इंटरनेशनल शब्दकोश देखने के बाद उनसे कहा कि 'डेट' शब्द इस मौके के लिए सही शब्द नहीं है क्योंकि अमरीका में इसका आशय महिलाओं या लड़कियों के साथ घूमने के लिए किया जाता है।

मथाई ने उन्हें सुझाव दिया कि वो डेट की जगह रान्डेवू (rendezvous ) या ट्रिस्ट (tryst) शब्द का इस्तेमाल करें। लेकिन उन्होंने उन्हें ये भी बताया कि रूजवेल्ट ने युद्ध के दौरान दिए गए अपने भाषण में 'रान्डेवू' शब्द का इस्तेमाल किया है। नेहरू ने एक क्षण के लिए सोचा और अपने हाथ से टाइप किया हुआ डेट शब्द काट कर 'ट्रिस्ट' लिखा। नेहरू के भाषण का वो आलेख अभी भी नेहरू म्यूजियम लाइब्रेरी में सुरक्षित है।

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जवाहर लाल नेहरू - फोटो : सोशल मीडिया
जब पूरी दुनिया सो रही होगी
संसद के सेंट्रल हॉल में ठीक 11 बजकर 55 मिनट पर नेहरू की आवाज गूंजी, 'बहुत सालों पहले हमने नियति से एक वादा किया था। अब वो समय आ पहुंचा है कि हम उस वादे को निभाएं...शायद पूरी तरह तो नहीं लेकिन बहुत हद तक जरूर। आधी रात के समय जब पूरी दुनिया सो रही है, भारत आजादी की सांस ले रहा है।'

अगले दिन के अखबारों के लिए नेहरू ने अपने भाषण में दो पंक्तियां अलग से जोड़ीं। उन्होंने कहा, 'हमारे ध्यान में वो भाई और बहन भी हैं जो राजनीतिक सीमाओं की वजह से हमसे अलग-थलग पड़ गए हैं और उस आजादी की खुशियां नहीं मना सकते जो आज हमारे पास आई है। वो लोग भी हमारे हिस्से हैं और हमेशा हमारे ही रहेंगे चाहे जो कुछ भी हो।'

जैसे ही घड़ी ने रात के बारह बजाए शंख बजने लगे। वहां मौजूद लोगों की आंखों से आंसू बह निकले और महात्मा गांधी की जय के नारों से सेंट्रल हॉल गूंज गया। सुचेता कृपलानी ने, जो साठ के दशक में उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं, पहले अल्लामा इकबाल का गीत 'सारे जहां से अच्छा' और फिर बंकिम चंद्र चैटर्जी का 'वंदे मातरम' गाया, जो बाद में भारत का राष्ट्रगीत बना। सदन के अंदर सूट पहने हुए एंग्लो - इंडियन नेता फ्रैंक एन्टनी ने दौड़ कर जवाहरलाल नेहरू को गले लगा लिया।

संसद भवन के बाहर मूसलाधार बारिश में हजारों भारतीय इस बेला का इंतजार कर रहे थे। जैसे ही नेहरू संसद भवन से बाहर निकले मानो हर कोई उन्हें घेर लेना चाहता था। 17 साल के इंदर मल्होत्रा भी उस क्षण की नाटकीयता से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके थे। जैसे ही घड़ी ने रात के बारह बजाए उन्हें ये देख कर ताज्जुब हुआ कि दूसरे लोगों की तरह उनकी आंखें भी भर आई थीं। वहां पर मशहूर लेखक खुशवंत सिंह भी मौजूद थे जो अपना सब कुछ छोड़ कर लाहौर से दिल्ली पहुंचे थे। उन्होंने बीबीसी से बात करते हुए कहा था। 'हम सब रो रहे थे और अनजान लोग खुशी से एक दूसरे को गले लगा रहे थे।'
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जवाहर लाल नेहरू - फोटो : सोशल मीडिया
खाली लिफाफा
आधी रात के थोड़ी देर बाद जवाहरलाल नेहरू और राजेंद्र प्रसाद लॉर्ड माउंटबेटन को औपचारिक रूप से भारत के पहले गवर्नर जनरल बनने का न्योता देने आए। माउंटबेटन ने उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया। उन्होंने पोर्टवाइन की एक बोतल निकाली और अपने हाथों से अपने मेहमानों के गिलास भरे। फिर अपना गिलास भर कर उन्होंने अपना हाथ ऊंचा किया,' 'टु इंडिया।'

एक घूंट लेने के बाद नेहरू ने माउंटबेटन की तरफ अपना गिलास कर कहा 'किंग जॉर्ज षष्टम के लिए।' नेहरू ने उन्हें एक लिफाफा दिया और कहा कि इसमें उन मंत्रियों के नाम हैं जिन्हें कल शपथ दिलाई जाएगी। नेहरू और राजेंद्र प्रसाद के जाने के बाद जब माउंटबेटन ने लिफाफा खोला तो उनकी हंसी निकल गई क्योंकि वो खाली था। जल्दबाजी में नेहरू उसमें मंत्रियों के नाम वाला कागज रखना भूल गए थे।
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15 अगस्त 1947 - फोटो : सोशल मीडिया
प्रिंसेज पार्क पर लाखों लोगों का मजमा
अगले दिन दिल्ली की सड़कों पर लोगों का सैलाब उमड़ा पड़ा था। शाम पांच बजे इंडिया गेट के पास प्रिंसेज पार्क में माउंटबेटन को भारत का तिरंगा झंडा फहराना था। उनके सलाहकारों का मानना था कि वहां करीब तीस हजार लोग आएंगे लेकिन वहां पांच लाख लोग इकट्ठा थे। भारत के इतिहास में तब तक कुंभ स्नान को छोड़ कर एक जगह पर इतने लोग कभी नहीं एकत्रित हुए थे। बीबीसी के संवाददाता और कमेंटेटर विनफर्ड वॉन टामस ने अपनी पूरी जिदगी में इतनी बड़ी भीड़ नहीं देखी थी।

माउंटबेटन की बग्घी के चारों ओर लोगों का इतना हुजूम था कि वो उससे नीचे उतरने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। चारों ओर फैले हुए इस अपार जन समूह की लहरों ने झंडे के खंबे के पास बनाए गए छोटे से मंच को अपनी लपेट में ले लिया था। भीड़ को रोकने के लिए लगाई गई बल्लियां, बैंड वालों के लिए बनाया गया मंच, बड़ी मेहनत से बनाई गई विशिष्ट अतिथियों की दर्शक दीर्घा और रास्ते के दोनों ओर बांधी गई रस्सियां- हर चीज लोगों की इस प्रबल धारा में बह गईं थीं। लोग एक दूसरे से इतना सट कर बैठे हुए थे कि उनके बीच से हवा का गुजरना भी मुश्किल था। फिलिप टालबोट अपनी किताब 'एन अमेरिकन विटनेस' में लिखते हैं, 'भीड़ का दवाब इतना था कि उससे पिस कर माउंटबेटन के एक अंगरक्षक का घोड़ा जमीन पर गिर गया। सब की उस समय जान में जान आई जब वो थोड़ी देर बाद खुद उठ कर चलने लगा।'
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पामेला माउंटबेटन - फोटो : सोशल मीडिया
पामेला की ऊंची हील की सैंडिल
माउंटबेटन की 17 वर्षीय बेटी पामेला भी दो लोगों के साथ उस समारोह को देखने पहुंचीं थीं। नेहरू ने पामेला को देखा और चिल्ला कर कहा लोगों के ऊपर से फांदती हुई मंच पर आ जाओ। पामेला भी चिल्लाई, 'मैं ऐसा कैसे कर सकती हूं। मैंने ऊंची एड़ी की सैंडल पहनी हुई है।' नेहरू ने कहा सैंडल को हाथ में ले लो। पामेला इतने ऐतिहासिक मौके पर ये सब करने के बारे में सपने में भी नहीं सोच सकती थीं।

अपनी किताब 'इंडिया रिमेंबर्ड' में पामेला लिखती हैं, 'मैंने अपने हाथ खड़े कर दिए। मैं सैंडल नहीं उतार सकती थी। नेहरू ने मेरा हाथ पकड़ा और कहा तुम सैंडल पहने-पहने ही लोगों के सिर के ऊपर पैर रखते हुए आगे बढ़ो। वो विल्कुल भी बुरा नहीं मानेंगे। मैंने कहा मेरी हील उन्हें चुभेगी। नेहरू फिर बोले बेवकूफ लड़की सैंडल को हाथ में लो और आगे बढ़ो।'

पहले नेहरू लोगों के सिरों पर पैर रखते हुए मंच पर पहुंचे और फिर उनकी देखा देखी भारत के अंतिम वॉयसराय की लड़की ने भी अपने सेंडिल को उतार कर हाथों में लिया और इंसानों के सिरों की कालीन पर पैर रखते हुए मंच तक पहुंच गईं, जहां सरदार पटेल की बेटी मणिबेन पटेल पहले से मौजूद थीं।

डोमिनीक लापिएर और लैरी कॉलिंस इपनी किताब 'फ्रीडम एट मिडनाइट' में लिखते हैं, 'मंच के चारों ओर उमड़ते हुए इंसानों के उस सैलाब में हजारों ऐसी औरतें भी थीं जो अपने दूध पीते बच्चों को सीने से लगाए हुए थीं। इस डर से कि कहीं उनके बच्चे बढ़ती हुई भीड़ में पिस न जाएं, जान पर खेल कर वो उन्हें रबड़ की गेंद की तरह हवा में उछाल देतीं और जब वो नीचे गिरने लगते तो उन्हें फिर उछाल देतीं। एक क्षण में हवा में इस तरह सैकड़ों बच्चे उछाल दिए गए। पामेला माउंटबेटन की आखें आश्चर्य से फटी रह गईं और वो सोचने लगीं, 'हे भगवान, यहां तो बच्चों की बरसात हो रही है।''

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लॉर्ड माउंटबेटन - फोटो : सोशल मीडिया
बग्घी से ही तिरंगे को सलाम
उधर अपनी बग्घी में कैद माउंटबेटन उससे नीचे ही नहीं उतर पा रहे थे। उन्होंने वहीं से चिल्ला कर नेहरू से कहा, 'बैंड वाले भीड़ के बीच में खो गए हैं। लेट्स होएस्ट द फ्लैग।' वहां पर मौजूद बैंड के चारों तरफ इतने लोग जमा थे कि वो अपने हाथों तक को नहीं हिला पाए। मंच पर मौजूद लोगों ने सौभाग्य से माउंटबेटन की आवाज सुन ली। तिंरंगा झंडा फ्लैग पोस्ट के ऊपर गया और लाखों लोगों से घिरे माउंटबेटन ने अपनी बग्घी पर ही खड़े खड़े उसे सेल्यूट किया।

लोगों के मुंह से बेसाख्ता आवाज निकली, 'माउंटबेटन की जय....पंडित माउंटबेटन की जय !' भारत के पूरे इतिहास में इससे पहले किसी दूसरे अंग्रेज को ये सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ था कि वो लोगों को इतनी दिली भावना के साथ ये नारा लगाते हुए सुने। उस दिन उन्हें वो चीज मिली जो न तो उनकी परनानी रानी विक्टोरिया को नसीब हुई थी और न ही उनकी किसी और संतान को। भारत के इतिहास में किसी दूसरे अंग्रेज को ये सौभाग्य नहीं प्राप्त हुआ था कि वो लोगों को इतनी शिद्दत के साथ ये नारा लगाते हुए सुने। यह माउंटबेटन की कामयाबी को भारत की जनता का समर्थन था।

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15 अगस्त 1947 - फोटो : सोशल मीडिया
इंद्रधनुष ने किया आजादी का स्वागत
उस मधुर क्षण के उल्लास में भारत के लोग प्लासी की लड़ाई, 1857 के अत्याचार, जालियांवाला बाग की खूनी दास्तान सब भूल गए। जैसे ही झंडा ऊपर गया उसके ठीक पीछे एक इंद्रधनुष उभर आया, मानो प्रकृति ने भी भारत की आजादी के दिन का स्वागत करने और उसे और रंगीन बनाने की ठान रखी हो। वहां से अपनी बग्घी पर गवर्नमेंट हाउज लौटते हुए माउंटबेटन सोच रहे थे सब कुछ ऐसा लग रहा है जैसे लाखों लोग एक साथ पिकनिक मनाने निकले हों और उन में से हर एक को इतना आनंद आ रहा हो जितना जीवन में पहले कभी नहीं आया था। इस बीच माउंटबेटन और एडवीना ने उन तीन औरतों को अपनी बग्घी में चढ़ा लिया जो थक कर निढ़ाल हो चुकी थीं और उनकी बग्घी के पहिए के नीचे आते आते बची थीं। वो औरतें काले चमड़ों से मढ़ी हुई सीट पर बैठ गईं जिसकी गद्दियां इंग्लैंड के राजा और रानी के बैठने के लिए बनाई गई थीं। उसी बग्घी में भारत के प्रधानमंत्री जवाहललाल नेहरू उसके हुड पर बैठे हुए थे क्योंकि उनके लिए बग्घी में बैठने के लिए कोई सीट ही नहीं बची थी।
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15 अगस्त 1947 - फोटो : सोशल मीडिया
पूरी दिल्ली में रोशनी
अगले दिन माउंटबेटन के बेहद करीबी उनके प्रेस अटाशे एलन कैंपबेल जॉन्सन ने अपने एक साथी से हाथ मिलाते हुए कहा था, 'आखिरकार दो सौ सालों के बाद ब्रिटेन ने भारत को जीत ही लिया !' उस दिन पूरी दिल्ली में रोशनी की गई थी। कनॉट प्लेस और लाल किला हरे केसरिया और सफेद रोशनी से नहाये हुए थे। रात को माउंटबेटन ने तब के गवर्नमेंट हाउस और आज के राष्ट्रपति भवन ने 2500 लोगों के लिए भोज दिया।
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