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Viral Video: यहां 2-3 हफ्ते की छुट्टी पर जाना है आम, शख्स ने बताई विदेश में भारतीयों के रुकने की वजह

Wed, 29 Apr 2026 12:56 PM IST
Jyoti Mehra फीचर डेस्क, अमर उजाला

सार

Belgium Work Life Balance: हाल ही में बेल्जियम में काम कर रहे एक भारतीय का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें वह भारत के वर्क कल्चर की तुलना बेल्जियम के वर्क कल्चर से कर रहे हैं। आइए जानते हैं उन्होंने क्या खास बात कही।
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Belgium Work Life Balance - फोटो : AI
Belgium Work Life Balance: कहते हैं घर वही होता है जहां दिल बसता है, लेकिन आज की दुनिया में दिल और दिमाग अक्सर दो अलग दिशाओं में खड़े नजर आते हैं। खासकर तब जब बात विदेश में बसे भारतीयों की होती है। आमतौर पर यह मान लिया जाता है कि बेहतर लाइफस्टाइल, साफ-सुथरा माहौल और आधुनिक सुविधाएं ही उन्हें भारत से दूर रखती हैं। लेकिन हाल ही में बेल्जियम में काम कर रहे भारतीय अलेख श्रीवास्तव के एक वायरल वीडियो ने इस सोच की परतें खोल दी हैं।

वीडियो में अलेख बताते हैं कि असली वजह चमक-दमक भरी लाइफस्टाइल नहीं, बल्कि वर्क कल्चर है। उन्होंने बताया कि भारत में कई ऐसी सुविधाएं हैं, जो विदेशों में आसानी से नहीं मिलतीं। जैसे खाने-पीने की चीजों की तुरंत डिलीवरी या घर के कामों में मदद करने वाले लोग ये सब यहां जिंदगी को काफी सहज बना देते हैं। इसके बावजूद विदेश में रह रहे कई भारतीयों के लिए वापसी का फैसला इतना सीधा नहीं होता।
 
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साझा किए अपने अनुभव (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Adobe Stock
साझा किए अपने अनुभव 
उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि सबसे बड़ा अंतर वर्क-लाइफ बैलेंस में दिखता है। यूरोप में आमतौर पर काम का समय तय होता है, शाम 5 बजे के बाद ऑफिस की जिम्मेदारियां खत्म और निजी जिंदगी शुरू। वहीं भारत में अगर कोई कर्मचारी समय पर ऑफिस छोड़ दे, तो अक्सर उसके काम को लेकर सवाल उठने लगते हैं, जैसे उसने पूरा दिन दिया ही नहीं।
 
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छुट्टी से पहले बैकअप का दबाव (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Adobe Stock
छुट्टी से पहले बैकअप का दबाव
अलेख ने छुट्टियों को लेकर भी एक दिलचस्प तुलना की। उनके अनुसार यूरोप में दो से तीन हफ्तों की छुट्टी लेना एक सामान्य बात है और इससे किसी की प्रोफेशनल छवि पर असर नहीं पड़ता। लेकिन भारत में कुछ दिनों की छुट्टी लेना भी कई बार चुनौती बन जाता है। छुट्टी लेने से पहले बैकअप तैयार करने का दबाव होता है, और कई बार तो ऐसा लगता है कि इंसान खुद ही अपने काम का बैकअप बनकर रह जाता है।
 

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यूरोप में रहने के बाद हुआ एहसास (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Adobe Stock
वीडियो के कैप्शन में उन्होंने लिखा कि यूरोप में रहने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि असली फर्क साफ-सफाई या इंफ्रास्ट्रक्चर में नहीं, बल्कि इस बात में है कि लोग अपने समय को किस नजर से देखते हैं। वहां शाम 5 बजे का मतलब होता है, अपनी जिंदगी जीना शुरू करना। जबकि भारत में काम खत्म होने के बाद भी किसी न किसी रूप में जिम्मेदारियां साथ चलती रहती हैं।

देखें वीडियो-
 
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संतुलित जीवन की सुविधा (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Freepik
संतुलित जीवन की सुविधा
अंत में उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग अपनी जिंदगी के 25-30 साल भारत में बिता चुके होते हैं, वे यहां के माहौल के अभ्यस्त होते हैं। ऐसे में उनके लिए दुविधा बेहतर सुविधाओं को छोड़ने की नहीं, बल्कि उस संतुलित जीवन को पीछे छोड़ने की होती है, जो उन्हें विदेश में मिलता है। शायद यही कारण है कि दिल भारत में बसता है, लेकिन कदम लौटने से पहले ठहर जाते हैं।

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