फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

150 साल से कतर पर हुकूमत करने वाला वो खानदान, जिसकी कहानी कर देगी हैरान

Sat, 09 Jan 2021 09:49 AM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
1 of 8
कतर - फोटो : सोशल मीडिया
कुछ लोग कतर को फारस की खाड़ी की 'बिगड़ी औलाद' करार देते हैं। यहां तक कि पिछले 150 सालों से कतर पर हुकूमत कर रहे अल-थानी खानदान को 'पड़ोस का सबसे मुश्किल परिवार' करार देने वाले लोग भी मिल जाते हैं। कतर अपने पड़ोसी मुल्कों से कूटनीतिक विवाद में उलझा हुआ है। सऊदी अरब, बहरीन और मिस्र को कतर से कुछ शिकायते हैं और उन्होंने कूटनीतिक रिश्ते तोड़ लिए हैं। ये मुल्क कतर पर चरमपंथी गतिविधियों को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हैं, जिससे दोहा इनकार करता है।

लेकिन विशेषज्ञ प्रति व्यक्ति सबसे ज्यादा आमदनी वाले इस छोटे से देश के अतीत में समस्याओं की वजह देखते हैं। उनका कहना है कि बीते कल में कृतर मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामले में बदनाम रहा है। कतर एक मुल्क के तौर पर 1850 में वजूद में आया और तभी से अल-थानी खानदान यहां हुकूमत में है। पीढ़ियों से यहां खानदान के वारिसों को सत्ता मिलती रही, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि कतर इन बदलावों को खामोशी से देखा।
विज्ञापन

2 of 8
कतर - फोटो : सोशल मीडिया
अल-थानी खानदान
लंदन में रॉयल इंस्टीट्यूट्स ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स में मध्य पूर्व मामलों के विशेषज्ञ पीटर सैलिसबरी कहते हैं, "एक परिवार जमीन के एक छोटे से टुकड़े पर हुकूमत कर रहा था। इसकी अपनी कोई खास अहमियत नहीं थी। लंबे समय से इसे सऊदी अरब के एक सूबे के तौर पर भी देखा गया। लेकिन वक्त के साथ-साथ वे बड़े मुल्कों के इस इलाके में अपना वजूद खड़ा करने में कामयाब रहे।" 1980 और 1990 के दशक के दौरान कतर के आमिर खलीफा बिन हमाद अल-थानी और सरकार में बैठे अल-थानी खानदान के दूसरे सदस्यों ने तय किया कि कतर दूसरों के मामलों में दखल नहीं देगा।

शुरू में ये माना गया कि वे जानबूझकर अलग-थलग रहना चाहते हैं लेकिन अल-थानी खानदान की चिंता कतर के भीतर अमन कायम रखने को लेकर ज्यादा थी। लेकिन 1995 में सबकुछ बदल गया। आमिर के शहजादे हमाद बिन खलीफा अल-थानी ने अपने अब्बा की गैरमौजूदगी में बिना किसी खून खराबे के उनकी सल्तनत का तख्तापलट कर दिया।
विज्ञापन

3 of 8
कतर का राष्ट्रीय झंडा - फोटो : सोशल मीडिया
सऊदी अरब से रिश्ते
जब शहजादे हमाद बिन खलीफा अल-थानी हुकूमत पर कब्जा कर रहे थे तो उनके वालिद आमिर खलीफा बिन हमाद अल-थानी स्विट्जरलैंड के दौरे पर थे। पीटर सैलिसबरी के मुताबिक इस वाकये ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को लेकर अल-थानी खानदान के रवैये को ही पूरी तरह से बदल दिया। वे कहते हैं, "अलग-थानी खानदान पिछले 20 सालों में जिस तेजी से बदला है, उसकी वजह से कुछ लोग उन्हें मुसीबत करार देने लगे हैं।"

पीटर सैलिसबरी के मुताबिक, "कबायलियों का एक खानदान जिसके रिश्ते सऊदी अरब से हुआ करते थे और जिन्हें नाकाबिलेगौर समझा जाता था, देखते ही देखते अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शिरकत करने वाले नामचीन कद्दावर लोगों का कुनबा बन गया।" वे आगे कहते हैं, और जैसा कि हमने देखा इससे संदेह बढ़े। हमाद बिन खलीफा अल-थानी के अब्बा आमिर खलीफा बिन हमाद अल-थानी के सऊदी अरब के साथ करीबी रिश्ते थे लेकिन शहजादे के हुकूमत में आने के बाद तस्वीर बदली। उनकी नीतियों की वजह से पड़ोसी मुल्कों से कतर के मतभेद बढ़ने लगे। कतर के मामले में जो कुछ हुआ, उसे पड़ोसी मुल्क एक खराब उदाहरण के तौर पर देखते हैं।

4 of 8
कतर (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
एलएनजी का निर्यात
हालांकि कतर के पड़ोसी मुल्कों में भी राजशाही निजाम ही है। शेख हमाद ने सत्ता में आते ही प्राकृति गैस के भंडारों के विकास को नई रफ्तार दी। 1996 में कतर इतिहास में पहली बार एलएनजी का निर्यात करने लगा। इसी साल शेख हमाद की हुकूमत का तख्ता पलटने का इलजाम सऊदी अरब पर लगा। कहा गया कि सऊदी अरब शेख खलीफा को सत्ता में फिर से लाना चाहता है। निर्यात से होने वाली आमदनी के बूते कतर जल्दी ही एक क्षेत्रीय शक्ति बन गया।

आज वो लिक्विफाइड नैचुरल गैस या एलएनजी का सबसे बड़ा निर्यातक देश है। इतना ही नहीं वो सऊदी अरब के सबसे बड़े दुश्मन मुल्क ईरान के साथ मिलकर एलएनजी फील्ड के विकास के लिए काम कर रहा है। पीटर सैलिसबरी कहते हैं, "पड़ोसी मुल्कों को लगा कि कतर में बड़े बदलाव हो रहे हैं। शेख खलीफा की हुकूमत बहुत अलग थी। वे खामोशी से शासन कर रहे थे लेकिन शेख हमाद ताजा हवा के झोंके की तरह थे। जवान, ऊर्जा से लबरेज और खुदमुख्तार शेख हमाद बदलाव चाहते थे।"
विज्ञापन

5 of 8
कतर (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
तमीम बिन हमाद अल-थानी
शेख हमाद और उनके विदेश मंत्री शेख हमान बिन जासिम अल-थानी ने कतर को एक क्षेत्रीय महाशक्ति और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खड़ा करने में अग्रणी भूमिका निभाई। आमिर हमाद की हुकूमत में कतर ने न केवल अपनी अंतरराष्ट्रीय नीति का विस्तार किया बल्कि उन्होंने अल-जजीरा नाम का एक न्यूज चैनल भी शुरू किया। देखते ही देखते अल-जजीरा अरब जगत में एक बड़ी आवाज बनकर उभरा। कतर दुनिया भर में एक बड़ा ग्लोबल इन्वेस्टर भी है।

साल 2013 में आमिर ने सत्ता छोड़ने और अपने चौथे बेटे तमीम बिन हमाद अल-थानी को राजगद्दी सौंपने का फैसला किया। तमीम बिन हमाद उस समय 33 साल के थे। पड़ोसी मुल्कों को लगा कि नए आमिर का रवैया संतुलन बनाने वाला होगा लेकिन इस उम्मीद की उम्र बहुत कम रही। मिस्र में मोहम्मद मुर्सी के सत्ता से बेदखल होने के कुछ महीनों बाद शुरुआती खबरे सामने आईं कि नए आमिर मुस्लिम ब्रदरहुड के सदस्यों को दोहा में फिर से संगठित होने की इजाजत दे रहे हैं।
विज्ञापन

6 of 8
कतर (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : सोशल मीडिया
मुस्लिम ब्रदरहुड
इस सु्न्नी चरमपंथी गुट के अरब जगत में चाहने वाले बढ़ रहे थे। मुस्लिम ब्रदरहुड पर जल्द ही बहरीन, मिस्र, रूस, सीरिया और सऊदी अरब की हुकूमत ने चरमपंथी गुट करार दे दिया। मार्च, 2014 में सऊदी अरब, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात ने दोहा से अपने राजदूत वपास बुला लिए। आज ऐसा ही कुछ फिर से दोहराया जा रहा है। 
आखिरकार कतर मुस्लिम ब्रदरहुड के सदस्यों को मुल्कबदर कर तुर्की भेजने के लिए तैयार हो गया और उसी साल नवंबर होते होते विवाद थम गया। इस बीच कतर दुनिया भर में अपनी दौलत का निवेश करता रहा। अकेले ब्रिटेन में अल-थानी खानदान ने 50 अरब डॉलर का निवेश कर रखा है। लग्जरी स्टोरी, यूरोप की सबसे ऊंची गगनचुंबी इमारत, बिजनेस कॉम्प्लेक्स से लेकर ओलम्पिक विलेज तक कतर ने अपने अकूत दौलत से क्या कुछ नहीं खरीदा।
विज्ञापन

7 of 8
कतर (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : सोशल मीडिया
ब्रेक्सिट से पहले
अब कतर की दिलचस्पी वेल्स के नैचुरल गैस फील्ड्स में भी है। लंदन की सबसे महंगी इमारतों में आधी, लंदन स्टॉक एक्सचेंज में 8 फीसदी हिस्सा, बार्कलेज बैंक में इतनी ही हिस्सेदारी और सुपरमार्केट चेन सेंसबरी में 25 फीसदी शेयर कतर का है। पुराने सुल्तान आमिर हमाद की तीन बीवियों में से एक मोजाह बिंत नासिर अल-मिसनेद की रिहाइशगाह को लंदन का सबसे महंगा घर करार दिया गया है। कहा जाता है कि अल-थानी ने 2013 में इस घर के लिए 150 मिलियन पाउंड चुकाए थे।

कुल मिलाकर कहा जाए तो लंदन में अल-थानी खानदान के पास महारानी एलिजाबेथ द्वितीय से ज्यादा दौलत है। और इतना सब कुछ काफी नहीं था तो कतर ने ब्रेक्सिट से पहले ब्रिटेन में और छह अरब डॉलर के निवेश की घोषणा कर दी।
विज्ञापन

8 of 8
कतर (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
पश्चिमी मुल्कों की दिक्कत
पीटर सैलिसबरी कहते हैं, "शायद यही वजह है कि कतर और उसके पड़ोसी मुल्कों की उठा-पटक को लेकर ब्रिटेन संदिग्ध रूप से खामोश है। कतर को लेकर पश्चिमी मुल्क की स्थिति जटिल हो गई है। ब्रिटेन को लगता है कि वो दो पाटों के बीच कहीं फंस गया है।"

वे आगे कहते हैं, "ब्रेक्सिट की तैयारियों के वक्त ब्रिटेन ने खाड़ी देशों की हैसियत के मुताबिक अपनी प्राथमिकता सूची बनाई। ये वो देश थे जो ब्रिटेन में निवेश कर सकते थे। अब उसके सामने कतर और सऊदी अरब के बीच किसी को एक चुनने की दिक्कत है। कतर ने अपना पैसा ब्रिटेन में लगा रखा है और ब्रितानी सरकार सऊदी अरब के साथ अच्छे रिश्ते बरकरार रखना चाहती है।"

पीटर सैलिसबरी के मुताबिक, "फिलहाल किसी को नहीं पता कि संकट कैसे सुलझेगा लेकिन ब्रिटेन समेत दूसरे पश्चिमी मुल्क शायद ये उम्मीद कर रहे हैं कि समस्या जल्दी ही गायब हो जाएगी।"
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें