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ज्ञान की बात: जब मास्क में सुगंधित चीज रखने लगे थे चिकित्सक, महामारी को मानते थे गंध से फैलने वाली बीमारी

Mon, 12 Apr 2021 09:23 AM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्लेग महामारी के दौरान पहने जाना वाला मास्क - फोटो : सोशल मीडिया
देशभर में कोरोना की नई लहर ने आतंक मचा रखा है। वैक्सीन की दोनों डोज ले चुकें लोग भी इस घातक वायरस से संक्रमित हो रहे हैं। ऐसे में विशेषज्ञ चेताने लगे हैं कि अगले दो साल तक मास्क पहनने की जरूरत पड़ सकती है। हालांकि, इससे पहले भी कई महामारियों के फैलने पर मास्क की जरूरत पर जोर दिया गया था। साल 1347 में प्लेग महामारी फैलने पर डॉक्टरों ने मास्क की तरह काम करने वाली चीज बनाई, जो चिड़िया की चोंच की तरह मिलती-जुलती थी।
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प्लेग महामारी के दौरान पहने जाना वाला मास्क - फोटो : सोशल मीडिया
अक्तूबर 1347 में फैला ब्यूबॉनिक प्लेग इतिहास की सबसे अधिक संक्रामक बीमारी मानी जाती है। इस महामारी ने 20 मिलियन लोगों की जान ले ली थी। उस समय ब्यूबॉनिक प्लेग के बारे में स्वास्थ्य विशेषज्ञों के पास कोई खास जानकारी नहीं थी, सिवाय इसके की ये काफी संक्रामक है। मरते हुए लोगों को बचाने के लिए डॉक्टरों के पास मास्क भी नहीं था। ऐसे में उन्होंने काफी दिलचस्प दिखने वाला मास्क की तरह एक चीज तैयार किया।
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प्लेग महामारी के दौरान पहने जाना वाला मास्क - फोटो : सोशल मीडिया
प्लेग महामारी से बचने के लिए डॉक्टरों ने एक खास तरह का ड्रेस तैयार किया था। इसमें सिर से पैर तक काले कपड़े होते थे, सिर पर गोल हैट होती और नोंकदार ग्लव्स होते थे। इसके साथ ही मुंह पर चिड़िया के चेहरे की तरह मास्क लगाते थे, जिसमें चोंच भी निकली होती थी।

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प्लेग महामारी के दौरान पहने जाना वाला मास्क - फोटो : सोशल मीडिया
प्लेग महामारी को लेकर जानकारी के अभाव में डॉक्टर मानते थे कि ये मरीज से निकलने वाली दूषित हवा के कारण होता है। इससे बचाव के लिए ही वो लंबी चोंच वाला मास्क पहनते थे। इतना ही नहीं चोंच के भीतर वे खुशबूदार चीजें, जैसे दालचीनी, लोबान, शहद या परफ्यूम आदि रख लेते और तब मरीज के कमरे में जाते थे। डॉक्टरों का ऐसा मानना था कि खुशबू सूंघते रहने पर गंदी हवा उनकी नाक तक नहीं जा सकेगी और वे बीमारी से बच जाएंगे।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
चोंचदार मास्क बनाने का श्रेय 17वीं शताब्दी में फ्रांस के काफी ख्यात डॉक्टर Charles de Lorme को जाता है। हालांकि, जिस गंदी हवा से बचने के लिए इतने तरीके आजमाए गए, वो बीमारी हवा से नहीं, बल्कि येर्सिनिया पेस्टिस बैक्टीरिया से होती थी। चूहों में पाया जाने वाला ये बैक्टीरिया मक्खियों के जरिए ये इंसानों में फैलता था।
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