दादाभाई नौरोजी
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बुरे वक्त में नहीं छोड़ी उम्मीद
ये नौरोजी के जीवन का सबसे खराब समय था। 1890 के दशक के अंत और 1900 के शुरुआती दिनों में, ब्रिटिश शासन और क्रूर हो गया। अकाल और महामारी के कारण उपमहाद्वीप में लाखों लोग मारे गए, कई भारतीय राष्ट्रवादियों का मानना था कि उनके प्रयास अंतिम मोड़ पर पहुंच चुके थे। लेकिन नौरोजी उम्मीद नहीं छोड़ी। उन्होंने अपनी मांगो में वृद्धि करते हुए अधिक प्रगतिशील निर्वाचन क्षेत्रों, प्रारंभिक मजदूरों, अमेरिकी साम्राज्यवाद-विरोधी, अफ्रीकी-अमेरिकियों और काले ब्रिटिश आंदोलनकारियों को साथ लिया। उन्होंने ऐलान किया कि भारत को स्वराज की जरूरत थी और यही देश से बाहर जाते धन को रोकने का जरिया था।
ब्रिटिश प्रधानमंत्री हेनरी कैंपबेल-बैनरमैन से उन्होंने कहा कि यही उनके साम्राज्यवाद की गलतियों को सुधारने का तरीका है। ये शब्द और विचार दुनिया भर में घूमने लगे। उन्हें यूरोप के समाजवादियों ने, अफ्रीकी-अमरीकी प्रेस ने, भारतीयों ने और गांधी की अगुवाई में दक्षिण अफ्रीका के लोगों ने हाथों हाथ लिया। स्वराज एक साहसिक मांग थी। मानव इतिहास के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य से कमजोर अपना अधिकार कैसे ले सकते हैं?
नौरोजी अपने आशावाद और कभी पीछे नहीं हटने वाली प्रवृति के साथ बने रहे। 81 साल की उम्र में अपने अंतिम भाषण में उन्होंने अपनी राजनीतिक असफलताओं को स्वीकार किया। उन्होंने कहा "निराशा किसी भी दिल को तोड़ने और मायूस करने के लिए काफी है। यहां तक कि, मुझे डर है, विद्रोह करने से डर लगता है।" हालांकि, विचारों में दृढ़ता, दृढ़ संकल्प और प्रगतिशील विचारों पर विश्वास ही सही विकल्प थे। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्यों से कहा, "जैस-जैसे कि हम आगे बढ़ते हैं, हम ऐसे रास्तों को अपना सकते हैं जो उस मोड़ पर उपयुक्त हों, लेकिन हमें अंत तक टिके रहना होगा।"