फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

E=mc2: दुनिया की वो ऐतिहासिक थ्योरी, जिसकी मदद से बना था एटम बम

Sun, 27 Sep 2020 05:25 PM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
1 of 5
E=mc2 - फोटो : सोशल मीडिया
गणित और विज्ञान के इतिहास में E=mc2 एक बहुत ही लोकप्रिय और चर्चित इक्वेशन है। 27 सितंबर 1905 को महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन का रिसर्च पेपर “क्या किसी इकाई की जड़ता उसके ऊर्जा कंटेंट पर निर्भर करती है?” दुनिया की मशहूर विज्ञान पत्रिका 'एनालेन डे फिजीक' में प्रकाशित हुई थी। रिसर्च पेपर के माध्यम से इस सूत्र का उद्घाटन हुआ, जिसमें ऊर्जा और द्रव्यमान के संबंध को समझाया गया और उसी समय से यह सूत्र इतिहास बन गया।

2 of 5
अल्बर्ट आइंस्टीन - फोटो : सोशल मीडिया
कपड़ों, फिल्मों और पोस्टरों समेत कई जगहों पर यह सूत्र दिख जाता है। ब्रह्मांड में कई चीजों की गति से जुड़े इस सूत्र को विशेष सापेक्षता के सिद्धांत के तौर पर भी समझा जाता रहा है। लेकिन क्या आपको पता है कि दुनिया के सबसे अधिक चौंकाने वाला अविष्कार 'एटम बम' तक इसी सूत्र की उंगली पकड़कर बना। तो आइए जानते हैं इस सूत्र के बारे में विस्तार से...

3 of 5
अल्बर्ट आइंस्टीन - फोटो : सोशल मीडिया
क्या है E=mc2 का मतलब?
E=mc2 में E का मतलब ऊर्जा होता है, जो किसी भी इकाई में स्थित है। वहीं m का मतलब द्रव्यमान और c का मतलब प्रकाश की गति है। इस सूत्र का अर्थ यह हुआ कि किसी भी इकाई के कुल द्रव्यमान को यदि प्रकाश की गति के वर्ग से गुणा किया जाए तो उस इकाई की कुल ऊर्जा ज्ञात हो सकती है। आइंस्टीन ने इस सूत्र के रूप में यह थ्योरी दी थी कि ऊर्जा को द्रव्यमान और द्रव्यमान को ऊर्जा में बदला जा सकता है।

4 of 5
E=mc2 - फोटो : सोशल मीडिया
हालांकि, इस सूत्र पर सवाल उस समय खड़ा हुआ था कि द्रव्यमान से कितनी ऊर्जा रूपांतरित होगी और यह होगी भी या नहीं। ऐसे में आइंस्टीन खुद ही अपने थ्योरी को सिद्ध नहीं कर सके थे। लेकिन समय के साथ-साथ इस थ्योरी पर शोध और प्रयोग होते गए और 21वीं सदी में वैज्ञानिकों ने इस सूत्र के सिद्ध होने का दावा किया।

आइंस्टीन के थ्योरी देने के करीब 113 साल बाद फ्रेंच, जर्मन और हंगरी के वैज्ञानिकों ने साल 2018 में पुष्टि की थी कि प्रयोगों में यह सूत्र प्रामाणिक सिद्ध हुआ। लेकिन सिद्ध होने से पहले ही इस सूत्र का उपयोग कई आविष्कारों में हो चुका था।
विज्ञापन

5 of 5
अल्बर्ट आइंस्टीन - फोटो : सोशल मीडिया
आइंस्टीन की यह थ्योरी जैसे ही चर्चित हुई, तो कुछ ही समय के बाद अमेरिका के न्यूक्लियर पावर स्टेशनों में इस विचार को अमल में लाने की कोशिशें शुरू हुईं। रिएक्टरों के भीतर सबएटॉमिक कणों यानी न्यूट्रॉन्स के साथ यूरेनियम के परमाणुओं के संघटन संबंधी प्रयोग हुए। अणुओं के विखंडन वाले इस प्रयोग से खासी ऊर्जा रिलीज होना पाया गया। ऐसे में इस सूत्र ने एटम बम बनाने में मदद की।
और पढ़ें...
Next
AU ऐप में पढ़ें