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जानिए क्यों नहीं करते हैं शिवलिंग की पूरी परिक्रमा, जल स्थान को लांघना क्यों है वर्जित

Wed, 02 Jun 2021 03:43 PM IST
Shashi Shashi ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला

सार

  • शिवलिंग की परिक्रमा करते समय कभी न लांघे जल स्थान
  • भूलकर भी शिवलिंग की नहीं करनी चाहिए पूर्ण परिक्रमा
  • शिव और शक्ति की सम्मिलित ऊर्जा का प्रतीक होता है शिवलिंग
  • परिक्रमा करनेण से प्राप्त होती है देव स्थान की सकारात्मक ऊर्जा
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(प्रतीकात्मक तस्वीर)
ईश्वर की आराधना करने के कई तरीके हैं उन्हीं में से एक है परिक्रमा जिसका अर्थ होता है, अपने इष्ट के चारों ओर गोलाकार घूमते हुए ईश्वर की शरण में जाना। आप जिस भी चीज की परिक्रमा करते हैं वह हमेशा आपकी दांयी ओर होनी चाहिए। सनातन धर्म में परिक्रमा करना का बहुत महत्व माना जाता है। परिक्रमाएं कई तरह से की जाती हैं। मंदिर की परिक्रमा, किसी वृक्ष की परिक्रमा, तीर्थ स्थान की परिक्रमा, देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की परिक्रमा, गिरिराज परिक्रमा आदि। 
 
प्रत्येक देवी-देवता की परिक्रमा करने के अलग नियम होते हैं। इसी तरह से भगवान शिव की परिक्रमा करने के भी नियम बताए गए हैं। जिसके अनुसार शिव जी की प्रतिमा की तो पूरी परिक्रमा कर सकते हैं लेकिन शिवलिंग की केवल आधी परिक्रमा ही की जाती है। यदि इन नियमों का उल्लंघन किया जाए तो परिक्रमा का फल प्राप्त नहीं होता है और आपको समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। जानते हैं कि शिवलिंग की आधी परिक्रमा क्यों की जाती है और क्या हैं शिव परिक्रमा के नियम
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प्रतीकात्मक तस्वीर
शिवलिंग की परिक्रमा को अर्धचंद्राकार करना शास्त्र संवत माना गया है। अर्धचंद्राकार यानी गोल घूमते हुए आधी परिक्रमा करना। शिवलिंग की परिक्रमा करते समय दिशा का ध्यान रखना भी बहुत आवश्यक होता है। शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा बायीं ओर से आरंभ करके जलधारी तक जाकर विपरीत दिशा में लौटकर दूसरी ओर से फिर से परिक्रमा पूर्ण करें। इस बात का ध्यान रखें कि शिवलिंग की परिक्रमा कभी भी दायीं ओर से नहीं करनी चाहिए। शिवलिंग की परिक्रमा करते समय जलस्थान या जलधारी को लांघना वर्जित होता है। जानते हैं जलधारी न लांघने के पीछे का कारण।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
क्यों वर्जित है जलधारी लांघना
शास्त्रों में बताया गया है कि शिवलिंग का ऊपरी हिस्सा पुरूष का प्रतिनिधित्व करता है और नीचले हिस्से को स्त्री का प्रतीक माना गया है। इस तरह से शिवलिंग को शिव और शक्ति दोनों की सम्मिलित ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। शिवलिंग पर अभिषेक करने के बाद जिस स्थान से जल प्रवाहित होता है इसे जलधारी, निर्मली या फिर सोमसूत्र कहा जाता है। माना जाता है कि शिवलिंग से ऊर्जा का प्रवाह होता है, जब उस पर जल चढ़ाया जाता है तो जल में शिव और शक्ति की उर्जा के कुछ अंश समाहित हो जाते हैं, इसलिए जब को परिक्रमा करते समय या फिर अनजाने में जलधारी को लांघ लेता है तो उसके पैरों के मध्य से होते हुए ऊर्जा शरीर में प्रवेश कर जाती है जिसके कारण व्यक्ति को वीर्य या रज संबंधित स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।
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(प्रतीकात्मक तस्वीर) है - फोटो : अमर उजाला
शिवलिंग से निकलने वाली ऊर्जा बहुत ही गर्म और शक्तिशाली होती है यही कारण है कि शिवलिंग के ऊपर सदैव एक कलश लगा होता है जिससे पानी की बूंदे शिवलिंग पर गिरती रहती हैं। यही कारण है कि घर में शिवलिंग रखना भी वर्जित माना जाता है। इसके अलावा यदि आप घर में शिविलंग रखते भी हैं तो उसके कई नियम और मर्यादाएं होती हैं जिनका निर्वहन घर में करना बहुत कठिन होता है।
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