ज्यादातर लोगों को केवल पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण इन चार दिशाओं के बारे में ही पता होता है लेकिन इसके अलावा भी उत्तर-पश्चिम के मध्य का स्थान (वायव्य कोण) उत्तर और पूर्व के मध्य का स्थान (ईशान कोण) दक्षिण-पूर्व के मध्य का स्थान (आग्नेय कोण) दक्षिण-पश्चिम के मध्य का स्थान (नैऋत्य कोण) होती है, इस तरह से आठ दिशाएं हो जाती हैं साथ ही में आकाश और पाताल को दो दिशाएं माना गया है। इस प्रकार कुल मिलाकर दस दिशाएं मानी गई हैं। वास्तु शास्त्र में हर दिशा अपना एक अलग महत्व माना गया है, क्योंकि हर दिशा के अलग दिग्पाल और स्वामी ग्रह होते हैं। इसी कारण हर दिशा का अलग प्रभाव होता है। आइए जानते हैं कि किस दिशा का क्या महत्व होता है और किस दिशा के कौन हैं दिग्पाल।