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आसान नहीं होता है सन्यासी बनना, क्यों दीक्षा पर लगातार उठते हैं सवाल

Thu, 19 Jul 2018 09:44 PM IST
धर्म डेस्क,अमर उजाला
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इन दिनों एक अरबपति पिता की डॉक्टर बेटी के संयास लेने की चर्चा जोरो पर है। 28 साल की हिना जो पेशे से एमबीबीएस गोल्ड मेडलिस्ट है उन्होंने सभी सांसारिक सुखों को त्याग कर जैन भिक्षु बनने का फैसला किया। अहमदनगर यूनिवर्सिटी से गोल्ड मेडलिस्ट हिना पिछले एक दशक से अपने परिवार के सदस्यों को सन्यास लेने के लिए मना रही थीं।
 


 
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सांसारिक जीवन छोड़कर सन्यासी बनना सबके बस की बात नहीं है। सन्यासी बनने के लिए मजबूत इच्छाशक्ति और सन्यासी जीवन जीने की प्रबल इच्छा होनी चाहिए। पिछले कई दशकों से यह देखने का मिलता आ रहा है कि कम उम्र में ही बहुत लोग सन्यास ग्रहण कर रहे हैं। यह कितना सही है और कितना गलत। कुछ लोगों का मानना है कम उम्र में बिना जीवन का अनुभव लिए सन्यास ग्रहण करना सही नहीं है। कम उम्र में सन्यास लेने से न तो उनको जीवन का पूरा अनुभव मिलता है और न ही सन्यासी का। आज हम आपको बताने जा रहे हैं सन्यासी बनने के लिए एक व्यक्ति को किन- किन प्रक्रियाओं से गुजारना पड़ता है।
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आसान नहीं है सन्यास लेना
सन्यास लेना सबके बस की बात नहीं है सन्यासी जीवन बीतना बेहद कठिन और मुश्किलों भरा होता है। सन्यासी बनने के लिए एक व्यक्ति को सभी तरह के मोह माया का त्याग कर अपने आपको अपने इष्ट की आराधना में जीवन समर्पित करना होता है। शून्य की तरफ लगातार बढ़ते जाना सन्यासी की दिनचर्या में शामिल होता है।

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रास्ता बहुत कठिन
सन्यासी बनना आसान नहीं होता है। एक सन्यासी का जीवन बिताने के लिए बहुत से नियमों का पालन करना होता है। परिवार का त्याग, एक समय भोजन करना, ब्रह्राचर्य का पालन करना, जमीन पर सोना, मांगकर भोजन करना, भीड़ भाड़ से अलग रहना जैसे तमाम तरह के कठिन कार्यो को करना पड़ता है।  
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सबको नहीं मिल पाती दीक्षा
सन्यास की दीक्षा हर किसी को नहीं मिल पाती। दीक्षा लेने के लिए कठिन रास्तों से गुजरना पड़ता है। दीक्षा लेने से पहले इस बात की जांच पड़ताल की जाती है वह व्यक्ति सन्यासी बनने लायक या नहीं। इस परीक्षा को पास करने में 6 महीने से 12 साल तक का समय लग जाता है। 
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सबसे पहले पंच गुरू दीक्षा
सन्यासी बनने की सबसे पहले दीक्षा होती है पंच गुरू दीक्षा। इसमें सन्यास लेने वाले व्यक्ति को चोटी, रुद्राक्ष, लंगोटी और भभूत से स्नान करना होता है।
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पिंडदान दीक्षा
सन्यासी बनने से पहले अपने जीवित परिजनों सहित खुद का पिण्डदान करना होता है। खुद का पिण्डदान करने पर वह व्यक्ति सन्यासी जीवन में प्रवेश करता है और सन्यासी कहलाता है।

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तपन संस्कार
सन्यासी जीवन ग्रहण करने वाला व्यक्ति रात में शमशान घाट की धूनी से स्नान करना पड़ता है। फिर सुबह को आचार्य उस सन्यासी को वैदिक मंत्रो से उसे नया नाम देते हैं।
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दिगंबर दीक्षा
एक सन्यासी को दिगम्बर दीक्षा से भी गुजरना पड़ता है। यह दीक्षा धर्म ध्वजा के नीचे दी जाती है। इस प्रक्रिया में सन्यासी को ध्वजा के नीचे 24 घन्टे तक हाथ में दण्ड और मिट्टी का पात्र लेकर खड़ा रहना पड़ता है। फिर एक दूसरा सन्यासी उसका लिंग भंग करता है। इस दीक्षा के बाद न तो वह सन्यासी पलंग में सो सकता है न ही सिले वस्त्र पहन सकता है। इसके बाद साधू की पूजा शिव समान होती है।
किसी सन्यासी के सन्यास ग्रहण के दौरान सारी प्रक्रियाएं गुप्त रखी जाती है। इस दीक्षा में किसी बाहरी सदस्यों का निमंत्रण नहीं दिया जाता अलग-अलग अखाड़ो के नियम अलग-अलग होते हैं।
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