फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Shubh Muhurat: 24 घंटे में कितने होते हैं शुभ मुहूर्त ? जानें किस मुहूर्त में क्या करें

Thu, 17 Apr 2025 11:33 AM IST
मेघा कुमारी शैली प्रकाश, ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला

सार

How many Muhurat is in a day: पंचांग काल दिन को नामांकित करने की एक प्रणाली है। पंचांग के चक्र को खगोलकीय तत्वों से जोड़ा जाता है। हिन्दू पंचांग में मुख्य 5 बातों का ध्यान रखा जाता है। 
विज्ञापन
1 of 9
पंचांग काल दिन को नामांकित करने की एक प्रणाली है। पंचांग के चक्र को खगोलकीय तत्वों से जोड़ा जाता है। हिन्दू पंचांग में मुख्य 5 बातों का ध्यान रखा जाता है। इन पांचों के आधार पर ही कैलेंडर विकसित होता है। - फोटो : adobe
How many Muhurat is in a day: पंचांग काल दिन को नामांकित करने की एक प्रणाली है। पंचांग के चक्र को खगोलीय तत्वों से जोड़ा जाता है। हिन्दू पंचांग में मुख्य 5 बातों का ध्यान रखा जाता है। इन पांचों के आधार पर ही कैलेंडर विकसित होता है। ये 5 बातें हैं- 1. तिथि, 2. वार, 3. नक्षत्र, 4. योग और 5. करण।

पंचांग के अनुसार पूर्णिमा माह की 15वीं और शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि है, जिस दिन चन्द्रमा आकाश में पूर्ण रूप से दिखाई देता है। पंचांग के अनुसार अमावस्या माह की 30वीं और कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि है जिस दिन चन्द्रमा आकाश में दिखाई नहीं देता है। तिथि या कहें कि एक दिन में 30 मुहूर्त के साथ ही नक्षत्र, योग, करण, राशि, चौघड़िया, पक्ष, अयन और शुभाशुभ काल होते हैं।

शुक्ल और कृष्ण में से शुक्ल पक्ष शुभ है। दक्षिण और उत्तरायण में से उत्तरायण शुभ है। इसकी को देखकर बाकी मुहूर्त निर्धारित करते हैं। आइए जानते हैं विस्तार से।
विज्ञापन

2 of 9
1 रुद्र, 2 आहि, 3 मित्र, 4 पितॄ, 5 वसु, 6 वाराह, 7 विश्वेदेवा, 8 विधि, 9 सतमुखी, 10 पुरुहूत, 11 वाहिनी, - फोटो : freepik
पूरे दिन में होते हैं 30 मुहूर्त
1 रुद्र, 2 आहि, 3 मित्र, 4 पितॄ, 5 वसु, 6 वाराह, 7 विश्वेदेवा, 8 विधि, 9 सतमुखी, 10 पुरुहूत, 11 वाहिनी, 12 नक्तनकरा, 13 वरुण, 14 अर्यमा, 15 भग, 16 गिरीश, 17 अजपाद, 18 अहिर, 19 बुध्न्य, 20 पुष्य, 21 अश्विनी, 22 यम, 23 अग्नि, 24 विधातॄ, 25 कण्ड, 26 अदिति जीव/अमृत, 27 विष्णु, 28 युमिगद्युति, 29 ब्रह्म और 30 समुद्रम।
विज्ञापन

3 of 9
शुभ मुहूर्त में रुद्र, श्वेत, मित्र, सारभट, सावित्र, वैराज, विश्वावसु, अभिजीत, रोहिण, बल, विजय, - फोटो : adobe stock
15 होते हैं शुभ मुहूर्त
शुभ मुहूर्त में रुद्र, श्वेत, मित्र, सारभट, सावित्र, वैराज, विश्वावसु, अभिजीत, रोहिण, बल, विजय, नैरऋत, वरुण सौम्य और भग ये 15 मुहूर्त हैं। रवि के दिन 14वां, सोमवार के दिन 12वां, मंगलवार के दिन 10वां, बुधवार के दिन 8वां, गुरु के दिन 6टा, शुक्रवार के दिन 4था और शनिवार के दिन दूसरा मुहूर्त कुलिक शुभ कार्यों में वर्जित हैं।

4 of 9
उक्त मुहूर्त में क्या करें? - फोटो : freepik
उक्त मुहूर्त में क्या करें?
  • रुद्र में सभी प्रकार के मारणादि प्रयोग, भयंकर एवं क्रूर कार्य।
  • श्वेत में नए वस्त्र धारण, बगीचा लगाना, कृषि कार्यो का आरंभ आदि।
  • मित्र में मित्रता, मेल-मिलाप और संधि आदि के कार्य करें।
  • सारभट में शत्रुओं के लिए अभिचार कर्म करना।
  • सावित्र में सभी प्रकार के यज्ञ, विवाह, चूडाकर्म, उपनयन, देवकार्य आदि 16 संस्कार।
  • वैराज में पराक्रम के कार्य, शस्त्रों का निर्माण, वस्त्रों का दान आदि।
  • विश्वावसु द्विजाति के स्वाध्याय संबंधी सभी कार्य एवं अर्थ सिद्धि के कार्य करना।
  • अभिजित में सभी वर्ण एवं जाति के मेल-मिलाप संबंधी कार्य, धन संग्रह, यात्रा आदि के कार्य।
  • रोहिणी में पेड़, पौधे, बेल, लताएं आदि लगाना। इससे वे निरोग रहकर उन पर सर्वदा ही सुन्दर फल एवं फूल लगे रहते हैं।
  • बल में सेनाओं का संचालन और आक्रमण करने का कार्य करना, जिसके विजय अवश्य प्राप्त होती है।
  • विजय में स्वस्ति वाचन तथा शांति पाठ आदि मंगलाचार कार्य करना। किसी देश आदि पर आक्रमण करना भी शुभ है।
  • नैऋत में शत्रुओं के राष्ट्रों पर आक्रमण करना शुभ होता है।
  •  वरुण में जल में उत्पन्न होने वाले धान्य, गेंहूं, जौ, धान, कमल आदि के बीज बोना शुभ होता है।
  • सौम्य में सभी तरह के मांगलिक या शुभ कार्य सफल होते हैं।
  • भग में कन्याओं के सौभाग्य कार्य अर्थात पाणिग्रहण संस्कार को करना शुभ होता है।
विज्ञापन

5 of 9
यह सूर्योदय से डेढ़ घंटे पहले प्रारंभ होता है। ब्रह्म मुहूर्त में प्रार्थना, ध्यान या योग सबसे अधिक लाभकारी होते हैं। - फोटो : Freepik
ब्रह्म मुहूर्त
यह सूर्योदय से डेढ़ घंटे पहले प्रारंभ होता है। ब्रह्म मुहूर्त में प्रार्थना, ध्यान या योग सबसे अधिक लाभकारी होते हैं।

अभिजीत मुहूर्त
बुधवार को छोड़कर प्रत्येक वार को अभिजीत मुहूर्त होता है। दिन में 11:30 से 12:30 के बीच यह मुहूर्त होता है। इस मुहूर्त में निवेश करना या मीटिंग करना शुभ होता है।

प्रदोष काल
शास्त्रानुसार प्रदोषकाल सूर्यास्त से 2 घड़ी (48 मिनट) तक रहता है। इसी के साथ संधिकाल प्रारंभ होता है। इस काल में पूजा करना शुभ है। इस काल में सोना, सहवास करना, खाना-पीना, यात्रा करना, असत्य बोलना, क्रोध करना, शाप देना, झगड़े करना, गालियां देना या अभद्र बोलना, शपथ लेना, धन लेना या देना,रोना या जोर-जोर से हंसना, वेद मंत्रों का पाठ करना, कोई शुभ कार्य करना, चौखट पर खड़े होना और किसी भी प्रकार का शोर-शराब करना अशुभ है।
विज्ञापन

6 of 9
सूर्यास्त के बाद अस्त के बीच तक का समय गोधूलि बेला या गोधूलि काल कहा जाता है। - फोटो : freepik
गोधूलि मुहूर्त
सूर्यास्त के बाद अस्त के बीच तक का समय गोधूलि बेला या गोधूलि काल कहा जाता है। इस काल में लग्न या पूजा का कार्य किया जा सकता है। गोधूलि अर्थात जब गाय माता घर लौट रही होती है।

निशीथ काल
यह काल मध्यरात्रि के 12 बजे के आसपास प्रारंभ होता है। यह करीब 2 घड़ी तक रहता है। इसमें साधना, विशेष पूजा और तंत्र कर्म करते हैं।

विशेष मुहूर्त योग
सर्वार्थसिद्धि, अमृतसिद्धि, गुरुपुष्यामृत, रविपुष्यामृत योग, पुष्कर योग, द्विपुष्कर, त्रिपुष्कर योग, अक्षय मुहूर्त आदि।
विज्ञापन

7 of 9
दिन और रात के दौरान 8-8 चौघड़िया होते हैं। एक घटी लगभग 24 मिनट की होती है तथा एक चौघड़िया 4 घटी (लगभग 96 मिनट) का होता है। - फोटो : freepik
चौघड़िया
दिन और रात के दौरान 8-8 चौघड़िया होते हैं। एक घटी लगभग 24 मिनट की होती है तथा एक चौघड़िया 4 घटी (लगभग 96 मिनट) का होता है। प्रत्येक चौघड़िया मुहूर्त लगभग 4 घटी का होता है, इसलिए इसे चौघड़िया= चौ (चार) + घड़िया (घटी) के नाम से जाना जाता है। इसे चतुर्श्तिका मुहूर्त भी कहते हैं।

चौघड़िया के नाम
1.अमृत, 2.रोग, 3.लाभ, 4.शुभ, 5.चर, 6.काल, 7.उद्वेग 8.अमृत। शुभ, लाभ, चर और अमृत शुभ है। वहीं रोग, काल और उद्वेग अशुभ मुहूर्त हैं।
 
राहु काल
यह अशुभ समय होता है प्रत्येक वार अनुसार इसका समय अलग अलग होता है। इस काल में किसी भी प्रकार का शुभ कार्य नहीं करना चाहिए। हालांकि, राहु काल में आप जो काम पहले से कर रहे थे, उसे जारी रख सकते हैं। अशुभ काल में राहु काल के अलावा गुलिक काल, यमगंड काल, विडाल योग, वर्ज्य, दुर्मुहूर्त, गंड मूल, शूल योग, बाण और विंछुड़ो नाम में अलग अलग दिनों में अशुभ काल भी होते हैं। इसी के साथ ही दिशा शूल भी होता है जो वार अनुसार होता है।

8 of 9
पंचकों में ये कार्य निषेध माने गए हैं- श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तरा भाद्रप्रद तथा रेवती नक्षत्रों में पड़ने वाले पंचकों में दक्षिण की यात्रा - फोटो : freepik
पंचक
पंचकों में ये कार्य निषेध माने गए हैं- श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तरा भाद्रप्रद तथा रेवती नक्षत्रों में पड़ने वाले पंचकों में दक्षिण की यात्रा, मकान निर्माण, मकान छत डालना, पलंग खरीदना-बनवाना, लकड़ी और घास का संग्रह करना, रस्सी कसना और अन्य मंगल कार्य नहीं करना चाहिए। किसी का पंचकों में मरण होने से पंचकों की विधिपूर्वक शांति अवश्य करवानी चाहिए।

बुधवार और शुक्रवार के दिन पड़ने वाले पुष्य नक्षत्र उत्पातकारी भी माने गए है। ऐसे में शुभ कार्यों से बचना चाहिए। जैसे विवाह करना, मकान खरीदना, गृह प्रवेश आदि। रवि तथा गुरु पुष्य योग सर्वार्थ सिद्धिकारक माना गया है। रविवार, मंगलवार, संक्राति का दिन, वृद्धि योग, द्विपुष्कर योग, त्रिपुष्कर योग, हस्त नक्षत्र में लिया गया ऋण कभी नहीं चुकाया जाता। अंत: उक्त दिन में ऋण का लेना-देना भी निषेध माना गया है।

भद्रा काल
किसी भी मांगलिक कार्य में भद्रा योग का विशेष ध्यान रखा जाता है, क्योंकि भद्रा काल में मंगल-उत्सव की शुरुआत या समाप्ति अशुभ मानी जाती है। 11 करणों में 7वें करण विष्टि का नाम ही भद्रा है। यह सदैव गतिशील होती है। यह पाताल लोक, धरती लोग और स्वर्ग में विचरण करती रहती है।

पंचांग शुद्धि में भद्रा का खास महत्व होता है। जब चन्द्रमा कर्क, सिंह, कुंभ व मीन राशि में विचरण करता है और भद्रा विष्टि करण का योग होता है, तब भद्रा पृथ्वीलोक में रहती है। इस समय सभी कार्य शुभ कार्य वर्जित होते हैं। इसके दोष निवारण के लिए भद्रा व्रत का विधान भी धर्मग्रंथों में बताया गया है।

शुभ होरा
इसे दिन का शुभ समय माना जाता है। प्रार्थना, अनुष्ठान और विवाह आदि करने के लिए यह सबसे शुभ माना गया है।
विज्ञापन

9 of 9
करण क्या है जानिए - फोटो : adobe stock
27 योग
सूर्य-चन्द्र की विशेष दूरियों की स्थितियों को योग कहते हैं। योग 27 प्रकार के होते हैं। दूरियों के आधार पर बनने वाले 27 योगों के नाम क्रमश: इस प्रकार हैं- 1.विष्कुम्भ, 2.प्रीति, 3.आयुष्मान, 4.सौभाग्य, 5.शोभन, 6.अतिगण्ड, 7.सुकर्मा, 8.धृति, 9.शूल, 10.गण्ड, 11.वृद्धि, 12.ध्रुव, 13.व्याघात, 14.हर्षण, 15.वज्र, 16.सिद्धि, 17.व्यतिपात, 18.वरीयान, 19.परिध, 20.शिव, 21.सिद्ध, 22.साध्य, 23.शुभ, 24.शुक्ल, 25.ब्रह्म, 26.इन्द्र और 27.वैधृति।

अशुभ योग
27 योगों में से कुल 9 योगों को अशुभ माना जाता है। ये 9 अशुभ योग हैं- विष्कुम्भ, अतिगण्ड, शूल, गण्ड, व्याघात, वज्र, व्यतिपात, परिध और वैधृति।

करण क्या है जानिए
एक तिथि में 2 करण होते हैं- एक पूर्वार्द्ध में तथा एक उत्तरार्द्ध में। कुल 11 करण होते हैं- बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि, शकुनि, चतुष्पाद, नाग और किंस्तुघ्न। कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (14) के उत्तरार्द्ध में शकुनि, अमावस्या के पूर्वार्द्ध में चतुष्पाद, अमावस्या के उत्तरार्द्ध में नाग और शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के पूर्वार्द्ध में किंस्तुघ्न करण होता है। विष्टि करण को भद्रा कहते हैं। भद्रा में शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं। विष्टि को भद्रा काल कहते हैं। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें