किसी निशानेबाज के अचूक बनने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी क्या है, पिस्टल, तेज नजरें और सबसे बढ़कर वो अंगुली जो ट्रिगर दबाकर गोली को लक्ष्य पर भेदती है।
लेकिन, अगर किसी निशानेबाज की अंगुलियां ही छिन चुकी हों फिर भी उसकी पिस्टल से निकलने वाली हर गोली टारगेट के रास्ते से भटकती न हो तो? कुछ ऐसे ही निशानेबाज हैं विशाल गोयल।
बम विस्फोट में कोहनी से नीचे दोनों हाथ गवां चुके विशाल ने अंगुलियों नहीं, अपने जज्बे के बूते खुद को अचूक निशानेबाज साबित किया है।
‘गेंद’ में हुआ था धमाका
दो बार की राज्य स्तरीय शूटिंग में गोल्ड जीतने वाले विशाल विकलांगों सहित सामान्य निशानेबाजों के लिए भी मिसाल बन गए हैं।
मूलत: बिजनौर (यूपी) के चांदपुर निवासी विशाल दून में रायपुर के ईश्वर विहार में रहते हैं। विशाल बताते हैं कि वर्ष 1990 में, जब वह छह वर्ष के थे एक दिन चांदपुर में घर के बाहर खेलते हुए उन्हें दो गेंद मिली।
विशाल ने गेंदें उठा ली और खेलने लगे। खेलते हुए अचानक गेंदों को जोर से जमीन पर पटका तो उनमें विस्फोट हो गया और विशाल के दोनों हाथ क्षतिग्रस्त हो गए।
आखिर विशाल के हाथ काटने पड़े। बाद में पता चला कि गेंदों के भीतर बम रखे गए थे।
ऐसे करते हैं शूटिंग
विशाल ने बताया कि वह पिस्टल को दोनों हाथों से पकड़ते हैं। कड़े अभ्यास के बाद उन्होंने हाथ के अगले छोर को ट्रिगर पर फंसाने का तरीका साध लिया है।
विशाल कहते हैं कि ऐसा करने में उन्हें लंबा वक्त लगा। लगातार कोशिश के बाद साफ हुआ कि बायें हाथ से वह आसानी से शूटिंग कर सकते हैं।
हालांकि, कई मौकों पर दायें हाथ से भी उन्होंने लक्ष्य पर गोली दागी है।
पापा ने दिया हौसला
विशाल बताते हैं कि उनके पिता सुरेश कुमार गोयल आढ़ती थे। पिता ने कभी उन्हें यह अहसास नहीं होने दिया कि हाथ न होने से उनकी जिंदगी मुश्किल हो गई है।
विशाल की चाहत शूटर बनने की थी तो पिता ने इसे पूरा करने की ठान ली। दस साल पूर्व परिवार चांदपुर से देहरादून शिफ्ट हो गया। इसके बाद जसपाल राणा शूटिंग इंस्टीट्यूट में विशाल को दाखिल करा दिया गया।
विशाल बताते हैं कि यहां जसपाल के पिता नारायण सिंह राणा ने प्रशिक्षण के साथ उन्हें हमेशा आगे बढ़ने की सीख दी।
विकलांगों की मदद का सपना
विशाल कहते हैं कि पिता सुरेश कुमार गोयल ने जिस तरह उन्हें कभी खुद को कम न समझने की सीख दी। उसी तरह वह भी विकलांगों का सहारा बनना चाहते हैं।
विशाल ने सामाजिक संगठन मानुष प्रेरणा समिति का गठन किया है। यह संस्था फिजिकली और मेंटली चैलेंज लोगों के लिए काम करती है।
एलएलबी और एमएसडब्लू कर चुके विशाल कहते हैं कि इस संस्था के जरिये वह वर्ष 2010 में दिवंगत हो चुके पिता को श्रद्धांजलि भी दे रहे हैं।
उपलब्धियां
- वर्ष 2009 में स्टेट लेवल पर गोल्ड मेडल
- वर्ष 2010 में स्टेट लेवल पर गोल्ड मेडल
- वर्ष 2007, 08, 09 और 2010 में नेशनल चैंपियनशिप के लिए क्वालीफाई