इंटरनेशनल क्रिकेट मैच के लिए पिच बनाने में अहम काली मिट्टी के संकट से जूझ रही बीसीसीआई की पिच और मैदान समिति की बड़ी मुश्किल आसान हो गई है।
उत्तरप्रदेश के सहारनपुर क्षेत्र के ग्रामसभा पिलखनी में बड़े पैमाने पर दुर्लभ काली मिट्टी मिली है। इस मिट्टी के बिना इंटरनेशनल क्रिकेट मैच के लिए पिच निर्माण की कल्पना नहीं की जा सकती है। अभी तक उत्तरप्रदेश में काली मिट्टी का स्रोत उन्नाव जिले का दरोगाखेड़ा क्षेत्र था। यहां की मिट्टी से शारजाह से लेकर दिल्ली के फिरोजशाह कोटला और ग्रीनपार्क स्टेडियम की पिच बनाई गई है।
निजी दौरे पर देहरादून आए कानपुर ग्रीनपार्क स्टेडियम के चीफ पिच क्यूरेटर शिवकुमार ने अमर उजाला से बातचीत में बताया कि 29 दिसंबर को सहारनपुर से मिली मिट्टी को जांच के लिए आईआईटी कानपुर भेजा गया है। वहां से रिपोर्ट आते ही इसकी जानकारी आधिकारिक तौर पर बीसीसीआई को दी जाएगी।
पिच क्यूरेटर शिवकुमार की देखरेख में सहारनपुर जिला क्रिकेट एसोसिएशन का मैदान और पिच का निर्माण किया जा रहा है। इसी सिलसिले में वह पिछले दिनों सहारनपुर आए थे। उन्होंने बताया कि काफी समय से वह इस क्षेत्र में आते जाते हुए लोगों से संपर्क में थे। इसी बीच उन्हें पता चला कि पिलखनी में काली मिट्टी है।
मौके पर जाकर पड़ताल की तो बात सही निकली। गौर करने वाली बात यह है कि यह मिट्टी उन्नाव की मिट्टी की तरह ही इंटरनेशनल पिच के लिए मुफीद है। इस मिट्टी की खासियत के बारे में उन्होंने बताया कि काली मिट्टी में क्ले की मात्रा 70 फीसदी से अधिक होती है, जबकि सैंड की मात्रा नाममात्र होती है।
जिस मिट्टी में क्ले की मात्रा जितनी ज्यादा होगी, वह उतनी ठोस होती है और उसमें कसावट बाकी मिट्टियों से ज्यादा होती है। ऐसी मिट्टी से बनी क्रिकेट पिच जल्दी टूटती नहीं है। क्रिकेट की एक पिच बनाने के लिए करीब 3600 क्यूबिक फीट मिट्टी की जरूरत पड़ती है।
उन्होंने बताया कि काली मिट्टी की क्राइसेस देखते हुए मोहाली समेत कई इंटरनेशनल क्रिकेट सेंटर ने तीन से पांच साल तक के लिए काली मिट्टी का स्टाक कर लिया है। अब भी बड़ी मात्रा में इसकी जरूरत है, क्योंकि देश में तेजी से जहां इंटरनेशनल स्टेडियम बन रहे हैं, वहीं पिच निर्माण से लेकर रेनोवेशन का काम भी हो रहा है।
ऐसे बनती है पिच
शिवकुमार ने बताया कि बीसीसीआई की नई गाइड लाइंस के मुताबिक पिच बनाने में थ्री लेयर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाता है। सबसे पहले 4 इंच की लेयर ग्रेवल (स्टोन पार्टिकल्स/गिट्टी) की बिछाई जाती है। इसके बाद इतने ही इंच की पीले रंग की लोमी सॉयल (छनी हुई मिट्टी) की लेयर डाली जाती है।
शिवकुमार के मुताबिक वो लोमी सॉयल की लेयर बिछाने के बाद ग्रास प्लांट कर देते हैं। ऐसा करने से विकेट जल्दी ड्राई होता है। इस पर 8 इंच की मोटी ब्लैक सॉयल (काली मिट्टी) की लेयर डाली जाती है। तीनों लेयर डालने के बाद वॉटरिंग और रोलिंग का काम किया जाता है।