इस महीने कोलंबो में होने वाले राष्ट्रमंडल देशों के शासनाध्यक्षों के सम्मेलन (चोगम) में भाग न लेने का दबाव तो तमिलनाडु के राजनीतिक दल प्रधानमंत्री पर पहले से ही बना रहे हैं। लेकिन ब्रिटेन के चैनल फोर द्वारा हाल ही में जारी एक सनसनीखेज वीडियो के प्रसारण के बाद तो, जिसमें श्रीलंकाई सेना को लिट्टे से जुड़ी एक महिला मीडियाकर्मी की हत्या करते दिखाया गया है, तमिलनाडु के सब्र का बांध ही मानो टूट गया है।
ऐसे में, तमिलनाडु से जुड़े कुछ केंद्रीय मंत्री भी प्रधानमंत्री के आगामी श्रीलंका दौरे का विरोध कर रहे हैं। इस वीडियो की सत्यता पर सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन श्रीलंका में तमिलों पर दशकों से जारी अत्याचार को नहीं झुठलाया जा सकता। इस आरोप में दम लगता है कि लिट्टे के खिलाफ अभियान के आखिरी चरण में श्रीलंका की सेना ने मानवाधिकार को ताक पर रख दिया था।
चूंकि सदियों पूर्व तमिलनाडु से ही तमिल श्रीलंका में जा बसे थे, ऐसे में उनके साथ ऐसे सुलूक से भारतीय तमिलों का क्षुब्ध होना स्वाभाविक है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि प्रधानमंत्री श्रीलंका जाएं ही नहीं। क्षेत्रीय मुद्दों की वजह से विदेश नीति का प्रभावित होना कोई अच्छा उदाहरण नहीं है। फिर अमेरिका और ब्रिटेन तथा उनसे जुड़े कई संगठन श्रीलंका में मानवाधिकार हनन का मुद्दा अपने हित में उठा रहे हैं। जबकि हमारे भौगोलिक हित इसी में हैं कि हम कोलंबो से अपना रिश्ता इतना खराब न करें कि चीन और पाकिस्तान इसका फायदा उठा ले जाएं।
अमेरिकी दबाव में दो बार संयुक्त राष्ट्र में श्रीलंका के खिलाफ मतदान कर हमने कोलंबो की नाराजगी तो मोल ले ही ली है। जबकि श्रीलंका के तमिल बहुल जाफना प्रांत में दशकों बाद हुए चुनाव में तमिल नेशनल एलायंस के सत्ता में आने के बाद अब कोलंबो से क्षुब्ध होने का बहुत औचित्य नहीं है।
जब श्रीलंका के तमिल जाफना में अपनी सरकार बनाकर खुश हैं, और वे स्वतंत्र ईलम के बजाय संप्रभुता के ही आकांक्षी हैं, तब तमिलनाडु के तमिलों के आक्रोश का क्या वाकई कोई औचित्य है? इसलिए बेहतर तो यही होगा कि प्रधानमंत्री कोलंबो जाएं और महिंदा राजपक्षे सरकार पर तमिलों के साथ मानवीय व्यवहार का दबाव बनाएं।