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जल्दबाजी में क्यों है सरकार

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सरकार की महत्वाकांक्षी कैश सबसिडी योजना पर प्रश्नचिह्न तो पिछले दिनों तभी लग गया, जब पायलट परियोजना के तहत अलवर जिले के कोटकासिम में अनेक लाभार्थी पिछले करीब एक साल से सबसिडी की राशि से वंचित पाए गए। अब चुनाव आयोग ने इस योजना की घोषणा के समय पर सवाल उठाकर, और गुजरात के चार और हिमाचल प्रदेश के दो जिलों में इसे निरस्त कर सरकार को झटका दिया है।
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प्रश्न यह नहीं है कि सबसिडी की जगह लाभार्थियों को नकद पैसा देना सही है या नहीं; अगर यह सच है कि कैश देने से सबसिडी सिर्फ जरूरतमंदों को ही मिलेगी और सबसिडी का बोझ घटेगा, तो कोटकासिम का सच यह बताता है कि इसका क्रियान्वयन उतना आसान नहीं है। फिलहाल प्रासंगिक मुद्दा यह है कि सरकार इस योजना को लेकर इतनी आत्ममुग्ध और जल्दबाजी में क्यों है। सरकार ने इस योजना के पक्ष में माहौल हिमाचल और गुजरात चुनाव के ठीक पहले ही क्यों बनाया?

यह मानने का कारण है कि आगामी चुनाव में कैश सबसिडी योजना को सरकार तुरूप के पत्ते की तरह इस्तेमाल करना चाहती है। नहीं तो, ऐसा क्यों है कि दूसरे कार्यकाल की करीब आधी अवधि तक निष्क्रिय रहने और आर्थिक अनियमितताओं का अपयश झेलने के बाद सरकार अचानक एफडीआई और कैश सबसिडी जैसे उन्हीं मुद्दों पर तेजी दिखा रही है, जो चुनावी नतीजे को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं!
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आत्ममुग्धता का नमूना यह है कि संवाददाता सम्मेलन में वरिष्ठ मंत्रिगण कैश सबसिडी को 'गेम चेंजर' यानी खेल बदल देने वाला कहने से नहीं चूके। अगर यह मान लिया जाए कि उनका आशय 'चुनावी खेल' से नहीं था, तब भी गरीब तबकों को उसका हक देने, और सबसिडी का बेजा लाभ झटकने वाले बिचौलियों को इसके दायरे से बाहर करने से सरकार को अब तक किसने रोका था! हैरत देखिए कि चुनाव आयोग द्वारा सवाल उठाने पर कुछ केंद्रीय मंत्री फैसले के बचाव में वैसे ही तर्क करते नजर आए, जिस तरह वे 2 जी घोटाले में अपनी सरकार का बचाव करते हुए दे रहे थे। चुनाव आयोग के झटके के बाद कैश सबसिडी पर अब न सिर्फ धैर्य की, बल्कि कोटकासिम के अनुभव के बाद नए सिरे से तैयारी की भी जरूरत है।
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