दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपराज्यपाल नजीब जंग के बीच नौकरशाही पर नियंत्रण को लेकर चल रहा टकराव सांविधानिक अड़चन के मुहाने पर आ गया है। यह विवाद छुट्टी पर गए मुख्य सचिव की जगह उपराज्यपाल द्वारा ऊर्जा सचिव को कार्यवाहक मुख्य सचिव नियुक्त कर देने से उत्पन्न हुआ, जिसका केजरीवाल सरकार ने न केवल विरोध किया, बल्कि उसने प्रमुख सचिव के कार्यालय पर ताला भी जड़ दिया!
बची-खुची कसर जंग ने सरकार के द्वारा तैनात किए गए प्रमुख सचिव की नियुक्ति रद्द करके कर दी। प्रदेश के दो शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्तियों के बीच के टकराव से उत्पन्न दिल्ली की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। वास्तव में तीन महीने पहले विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को बहुमत मिलने के बाद से ही राज्य सरकार और उपराज्यपाल के रिश्ते सहज नहीं रहे हैं।
इसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि दिल्ली एक पूर्ण राज्य नहीं है और यहां के मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल के प्राधिकार ठीक से परिभाषित नहीं हैं। इसे लेकर संविधान विशेषज्ञों तक में मतभेद हैं। मसलन, लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप जहां संविधान के अनुच्छेद 239 एबी का हवाला देकर यह कहते हैं कि उपराज्यपाल चाहें, तो राष्ट्रपति शासन की सिफारिश तक कर सकते हैं, वहीं राजीव धवन जैस वरिष्ठ वकील के मुताबिक केजरीवाल को अपनी पसंद के नौकरशाह की नियुक्ति का अधिकार है।
जाहिर है, यह मामला दो व्यक्तियों के बीच का टकराव नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय राजधानी की व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। फिर भूलना नहीं चाहिए कि दिल्ली पुलिस पर नियंत्रण को लेकर भी अक्सर राज्य सरकार और केंद्र सरकार के बीच टकराव की स्थिति बनी रहती है।
इस पूरे विवाद का एक राजनीतिक पहलू भी है, जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। क्या यह स्थिति इसलिए पैदा हुई, क्योंकि दिल्ली में एक ऐसी पार्टी सरकार में है, जो पारंपरिक राजनीति से अलग हटकर काम करना चाहती है? दिल्ली के इस विवाद में गेंद अब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पाले में है, जिनसे उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री दोनों ही अलग अलग मिलकर अपना पक्ष रख चुके हैं।
स्थिति और न बिगड़े इसके लिए जरूरी है कि मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल के अधिकारों को ठीक से परिभाषित किया जाए, ताकि दोनों एक दूसरे के कार्यक्षेत्र का उल्लंघन न करें।