बस्तर की दरभा घाटी में कांग्रेस के काफिले पर किए गए भीषण हमले की जिम्मेदारी लेते हुए नक्सलियों ने जो आरोप लगाए हैं, और जो दावे किए हैं, उनमें कुछ भी नया नहीं है। महेंद्र कर्मा और कांग्रेस के अन्य नेता तो उनके निशाने पर पहले से ही थे और सलवा जुड़ूम को लेकर नक्सली पहले भी हिंसा कर चुके हैं।
दरअसल यह लोकतांत्रिक व्यवस्था को खारिज करने वाली उसी हिंसक मानसिकता को जायज ठहराने का एक तरीका है, जिसने निहत्थे आदिवासियों को अपना सुरक्षा कवच बना रखा है। अपने बयान में उन्होंने कर्मा सहित कुछ नेताओं के नाम लिए हैं, मगर वह सिर्फ छलावा है।
कांग्रेस और भाजपा के साथ ही, नक्सल प्रभावित राज्यों में सक्रिय अन्य राजनीतिक दलों को यह समझने की जरूरत है कि माओवादी भारत की पूरी राज्य व्यवस्था के लिए ही चुनौती बन गए हैं। इस हमले के बाद तय हो गया है कि छत्तीसगढ़ सहित नक्सली हिंसा से जूझ रहे अन्य राज्यों के साथ ही केंद्र को उनसे निपटने के लिए तालमेल के साथ एकीकृत रणनीति बनाने की जरूरत है।
मगर उससे भी पहले एक मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है, जिसका अभाव दिख रहा है। इसके लिए जरूरी है कि आदिवासियों का विश्वास हासिल किया जाए। मगर अनुभव तो यही बताता है कि आदिवासी लगातार हाशिये पर धकेले जा रहे हैं। विकास की हमारी अवधारणा में उनके लिए जगह ही नहीं है, जिसका फायदा नक्सली उठाते हैं।
असल में सलवा जूड़ूम जैसा अभियान भी ऐसी ही आधी-अधूरी समझ का नतीजा था, जिसने न केवल आदिवासियों को आपस में लड़ाने का काम किया, बल्कि इसकी आड़ में नक्सलियों को अपनी जड़ें मजबूत करने का भी मौका मिला। हालांकि यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सलवा जुड़ूम को नक्सलियों के दबाव में नहीं, बल्कि सर्वोच्च अदालत की फटकार के बाद बंद करना पड़ा।
यह बात अब साफ हो चुकी है कि सिर्फ सुरक्षा बलों की सख्ती से नक्सलियों से नहीं निपटा जा सकता। यह अच्छी बात है कि रक्षा मंत्री ए के एंटनी और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने भी बस्तर में सैन्य तैनाती से इनकार किया है। यह बात नक्सलियों के हिमायतियों को भी समझने की जरूरत है कि हिंसा किसी समाधान की ओर नहीं ले जाती।