बिहार के विधानसभा चुनाव की अधिसूचना अभी जारी नहीं हुई है, लेकिन नीतीश-लालू-सोनिया की पटना में हुई रैली के अड़तालीस घंटे के बाद ही भागलपुर में हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की परिवर्तन रैली के साथ ही एनडीए और महागठबंधन के बीच सियासी तकरार का पहला दौर पूरा हो गया है। दरअसल बिहार विधानसभा चुनाव को प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार के लिए अहम माना जा रहा है, वहीं नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव का तो राजनीतिक अस्तित्व ही इससे जुड़ा हुआ है।
अहम सवाल यह है कि बिहार का चुनाव आखिर किन मुद्दों पर लड़ा जाएगा? बिहार में विकास की राजनीति होगी या जातिवाद का सिक्का चलेगा? प्रधानमंत्री मोदी ने मुजफ्फरपुर, गया और सहरसा की रैलियों के विपरीत भागलपुर में नीतीश व लालू को कांग्रेस के साथ गठजोड़ करने की वजह से लोहिया-जेपी-कर्पूरी ठाकुर के नाम पर सैद्धांतिक रूप से घेरा, और विकास के मुद्दे पर खासा जोर दिया। वहीं, पटना की रैली में नीतीश ने मोदी द्वारा बिहार के लिए घोषित किए गए सवा लाख करोड़ रुपये के पैकेज पर सवाल उठाया था। हालांकि मोदी ने इसका न केवल जवाब दिया, बल्कि वित्त आयोग के जरिये बिहार को मिलने वाले पैसे का भी हिसाब मांग डाला।
यदि मोदी और नीतीश के बयानों और भाषणों पर गौर करें, तो दोनों कहीं न कहीं विकास के मुद्दे पर एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। यह अच्छी बात है कि बिहार का चुनावी विमर्श विकास के मुद्दे पर केंद्रित हो रहा है। एक बात तय है कि नीतीश और लालू को मोदी के इस आरोप की काट ढूंढनी पड़ेगी कि आखिर पिछले ढाई दशक के दौरान उनके सर्वाधिक अवधि तक सत्ता में रहने के बावजूद बिहार पिछड़ा क्यों है? क्यों आज भी बिहार का नौजवान दिल्ली, कोलकाता या मुंबई का रुख करने को बाध्य है? वहीं मोदी और उनके प्रबंधकों को व्यावहारिक तौर पर यह बताना पड़ेगा कि प्रधानमंत्री अपनी रैलियों में बिहार को दिए जाने वाले पैकेज की जो दुहाई दे रहे हैं, उनमें आंकड़ों की बाजीगरी कितनी है।
बिहार की दशा सुधारनी है, तो जरूरी यह भी है कि नीतीश की अगुआई वाला महागठबंधन और एनडीए, दोनों ही चुनाव में साफ-सुथरे उम्मीदवारों को टिकट देने का फैसला करें। क्या वे इसके लिए तैयार हैं?